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सरकारी बैंकों के बोर्ड में रिजर्व बैंक के प्रतिनिधित्व के पक्ष में नहीं है राजन

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Sep 12 2018 3:21PM

सरकारी बैंकों के बोर्ड में रिजर्व बैंक के प्रतिनिधित्व के पक्ष में नहीं है राजन
Image Source: Google

नयी दिल्ली। भारतीय रिवर्ज बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशक मंडल में आरबीआई के प्रतिनिधि को रखने की व्यवस्था के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि इस व्यवस्था से यह भ्रम पैदा होता कि सब कुछ केंद्रीय बैंक की नजर में है।

उन्होंने आकलन समिति के चेयरमैन मुरली मनोहर जोशी को दिये पत्र में कहा, ‘‘प्राथमिक रूप से आरबीआई रेफरी है न कि वाणिज्यकि कर्ज देने की प्रक्रिया में भूमिका निभाने वाला खिलाड़ी। बैंकों के निदेशक मंडलों में आरबीआई के प्रतिनिधि के पास वाणिज्यिक कर्ज देने का कोई अनुभव नहीं होता है और वह केवल यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर सकता है कि इस काम में प्रक्रियाओं का पालन हो।’’ राजन ने कहा, ‘‘उनके (आरबीआई के प्रतिनिधियों के) होने से एक भ्रम पैदा करेगा कि नियामक का चीजों पर पूरा नियंत्रण है। यही कारण है कि आरबीआई के गवर्नर सरकार से बैंकों के निदेशक मंडलों से अपने प्रतिनिधि को हटाने की मंजूरी मांगते रहे हैं।’’

आकलन पर संसद की स्थायी समिति ने पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमणियम के बयान के बाद राजन को आमंत्रित किया था। सुब्रमणियम ने अपने बयान एनपीए (फंसे कर्ज) की समस्या की पहचान करने और उसके समाधान की कोशिश को लेकर पूर्व गवर्नर की सराहना की थी। राजन के उत्तराधिकारी और आरबीआई के मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल ने भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशक मंडल से केंद्रीय बैंक के प्रतिनिधि को हटाने का सुझाव दिया था ताकि हितों का कोई टकराव नहीं हो।

पटेल ने वित्त पर संसद की स्थायी समिति के समक्ष कहा था कि केंद्रीय बैंक आरबीआई के नामित निदेशक के बारे में वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा कर रहा है। राजन ने यह भी कहा कि बैंक अधिकारी, कंपनियों के प्रवर्तक या सरकार में बैठे उनके समर्थक कभी-कभी मुड़ कर नियामकों पर आरोप लगा देते हैं कि फंसे कर्ज की समस्या उनकी पैदा की हुई है।लेकिन सचाई यह है कि यह समस्या बैंकों के अधिकारियों, कंपनियों के प्रवर्तकों और परिस्थितियां की देन होती है। उन्होंने कहा कि नियामक का महत्वपूर्ण कार्य समय पर एनपीए की पहचान करना और उसका निपटान करना है। इसके बाद आरबीआई बैंकों की नियमित निगरानी के जरिये उनको पूंजी का पर्याप्त प्रावधान कराता है।

 

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