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गोरखपुर के लोगों ने ही 'योगी योगी' कहना छोड़ दिया, अब क्या होगा?

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Mar 15 2018 12:38PM

गोरखपुर के लोगों ने ही 'योगी योगी' कहना छोड़ दिया, अब क्या होगा?
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कहा जाता है कि दिल्ली की गद्दी तक का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है और 2014 में सबने देखा भी कि किस तरह से उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें भाजपा को मिलीं जिससे केंद्र में आसानी से उसकी स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बन गयी थी। यही नहीं इसी उत्तर प्रदेश ने 2017 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को मजबूती प्रदान की और दो तिहाई बहुमत से यहां उसकी सरकार बनी। लेकिन भाजपा की प्रदेश सरकार के कार्यकाल का एक साल भी पूरा नहीं हुआ कि जनता ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के गढ़ में सत्तारुढ़ पार्टी को करारी हार दे दी। यह वाकई चौंकाने वाली हार है। गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीटों पर भाजपा की हार के बाद अब सवाल उठने लगा है कि क्या उत्तर प्रदेश में भाजपा का ग्राफ उतार पर है? 

विपक्षी गठबंधन की संभावनाएं हुईं प्रबल
 
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव परिणामों ने कम से कम उत्तर प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव के लिये भाजपा विरोधी गठबंधन की सम्भावनाओं को मजबूती दे दी है और इससे राष्ट्रीय फलक पर विपक्ष की एकजुटता के प्रयासों को बल मिल सकता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के राज्य विधान परिषद के लिये चुने जाने के बाद उनके इस्तीफे के कारण रिक्त हुई क्रमशः गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा की पराजय का संदेश बहुत दूरगामी माना जा रहा है। राजनीतिक लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील राज्य उत्तर प्रदेश में हुआ यह घटनाक्रम विपक्षी दलों को एकजुट करने की कवायद के बीच खासा महत्वपूर्ण है। हालांकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार में हुए उपचुनावों के नतीजे भी भाजपा के पक्ष में नहीं रहे थे, लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच तालमेल की वजह से उपचुनाव नतीजों को व्यापक तौर पर देखा जा रहा है।
 
मायावती ने किया था प्रयोग जो सफल रहा
 
इन चुनावों में भले सपा के उम्मीदवार जीते हों लेकिन असली विजेता बसपा मुखिया मायावती रहीं। राज्य विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद से मायावती संगठन को दुरुस्त करने में लगी हुई हैं और तरह-तरह के प्रयोग भी कर रही हैं। पहले उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और फिर कभी निकाय चुनाव नहीं लड़ने वाली बसपा को निकाय चुनाव लड़वाया। इन चुनावों में पार्टी का अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन रहा। इसके बाद बसपा ने अपनी सबसे कट्टर दुश्मन माने जाने वाली समाजवादी पार्टी से समझौता किया। हालांकि मायावती ने इसे 'समझौता' नहीं बताते हुए कहा कि यह 'एक हाथ ले और एक हाथ दे' के लिए किया गया करार है। दरअसल मायावती यह जाँचना चाहती थीं कि इस 'समझौते' को कैसी प्रतिक्रिया मिलती है? इसके अलावा उनका जो मूल वोटर उनसे छिटक गया था क्या वह अब भी उनके एक आदेश पर वोट देने या वोट ट्रांसफर करने के लिए तैयार है? मायावती का यह प्रयोग भी सफल रहा और चुनावी मैदान में नहीं होते हुए भी उनकी पार्टी जीत गयी। बसपा से मिले समर्थन से सपा उम्मीदवारों की ताकत बढ़ गयी। और इस बढ़ी ताकत को देखते हुए मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच सपा या बसपा में से किसका चयन करें का संशय भी खत्म हो गया और उन्होंने सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार का समर्थन कर भाजपा को चारों खाने चित कर दिया।
 
इसके अलावा मायावती ने अपने मूल वोटरों को यह संदेश देने के लिए कि उनके लिए पद ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है और उनकी पार्टी में भाई-भतीजावाद के लिए जगह नहीं है, राज्यसभा चुनाव में अपने भाई आनंद कुमार की उम्मीदवारी को दरकिनार करते हुए पार्टी के पूर्व विधायक भीमराव अंबेडकर को उम्मीदवार बनाया। अब माना जा रहा है कि सपा के समर्थन से बसपा का उम्मीदवार राज्यसभा आसानी से पहुँच जायेगा। तो इस तरह सपा-बसपा के साथ आने से यह लोग अपने तीन सांसद बनवाने में सफल रहे।
 
अब अखिलेश बुआजी को देंगे रिटर्न गिफ्ट
 
चुनाव नतीजों से अखिलेश यादव अगर गदगद हैं तो इसके कारण भी हैं। उन्होंने अपने पिता मुलायम सिंह यादव और बसपा संस्थापक कांशीराम की जुगलबंदी का पार्ट-2 पेश किया और उसमें सफल रहे। अखिलेश मुख्यमंत्री रहते हुए कभी भी मायावती के खिलाफ आक्रामक नहीं रहे और उन्हें बुआजी कह कर ही संबोधित करते रहे। यही कारण रहा कि गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव परिणाम आने के बाद जब अखिलेश ने मायावती से मिलने के लिए उन्हें फोन किया तो बुआजी ने भतीजे को लाने के लिए अपनी मर्सिडीज गाड़ी भेज दी। अब अखिलेश यादव 23 मार्च को राज्यसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार को जितवा कर बुआजी को रिटर्न गिफ्ट देंगे।
 
मुलायम और शिवपाल भी खुश
 
इस जीत से पहले अखिलेश के सपा का नेतृत्व करने पर जो सवाल उठ रहे थे वह भी अब बंद हो गये हैं क्योंकि पार्टी और परिवार में उनके सबसे बड़े आलोचक शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि अखिलेश मेहनती हैं और पार्टी को ठीक तरह से चला रहे हैं। पिता मुलायम सिंह यादव भी बेटे की इस कामयाबी से खुश हैं। मुलायम भी शायद बसपा का साथ चाहते थे इसीलिए उन्होंने बसपा से 'समझौते' का विरोध नहीं किया जबकि विधानसभा चुनावों में जब अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था तब मुलायम ने इसका खुल कर विरोध किया था।
 
महागठबंधन में मायावती शर्तें क्या रखेंगी?
 
अब आगामी लोकसभा चुनावों के लिए बसपा, सपा, कांग्रेस और रालोद के महागठबंधन की बात शुरू हो गयी है लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि मायावती क्या शर्तें रखती हैं और वे दूसरे दलों को कितनी मान्य होती हैं? साथ ही इस महागठबंधन का चेहरा कौन होगा? उत्तर प्रदेश में 40 से 50 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिनमें बसपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है तो ऐसे में यह भी देखना होगा कि जब सीट समझौते पर बात आएगी तब कौन दल बड़ा दिल दिखाते हुए ज्यादा सीटें दूसरे के लिए छोड़ने पर राजी होगा? 
 
जातीय समीकरण रहेंगे महत्वपूर्ण
 
देखा जाये तो उत्तर प्रदेश की राजनीति मुख्य रूप से जातीय समीकरणों के इर्द गिर्द ही घूमती रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी सपा और बसपा का कुल वोट प्रतिशत 44 के आसपास था। अगर ये दोनों मिल गये तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के नतीजों पर निर्णायक असर पड़ सकता है। हम गोरखपुर की ही बात करें तो भाजपा की हार में जातीय समीकरणों की अहम भूमिका रही है। गोरखपुर में 19 लाख से अधिक मतदाता हैं इनमें निषाद, दलित, मुस्लिम और यादव मतदाताओं की कुल संख्या 8 लाख है। और इनमें भी अकेले निषाद मतदाताओं की संख्या ही 3 लाख है। जब समाजवादी पार्टी ने निषाद समुदाय से उम्मीदवार बनाया तो तीन लाख लोग गोलबंद हो गये। इन तीन लाख निषाद वोटरों को बसपा के साथ आने से दलितों का भी एकतरफा समर्थन मिल गया। इसके साथ ही सपा उम्मीदवार की मजबूती देखते हुए मुस्लिम समुदाय भी उसके साथ खड़ा हो गया और आखिरकार सपा उम्मीदवार इस सोशल इंजीनियरिंग के चलते भाजपा का पुराना किला ढहाने में सफल हो गये।
 
भाजपा का ब्रैंड योगी फेल?
 
इन चुनाव परिणामों से सबसे बड़ा धक्का ब्रैंड योगी को पहुँचा है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने एकदम से राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा पाल ली। वह केरल, त्रिपुरा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भाजपा के प्रमुख स्टार प्रचारकों में शामिल हो गये। विभिन्न राज्यों के दौरे तो योगी ने बढ़ा दिये लेकिन अपने गढ़ में अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबा। हालांकि वह नियमित गोरखपुर में जनता दरबार लगाते रहे लेकिन उनके सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि जिस गोरखपुर में यह नारा प्रचलित था कि ''गोरखपुर में रहना है तो योगी योगी कहना है'' से लोगों ने पल्ला क्यों झाड़ लिया। योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा की यह गोरखपुर में पहली नहीं दूसरी हार है। इससे पहले हाल ही में संपन्न नगर निगम चुनावों में भी योगी के वार्ड में भाजपा प्रत्याशी की हार हुई थी और अब जिस संसदीय सीट से योगी खुद पांच बार और उनसे पहले उनके गुरु तीन बार सांसद रहे वह सीट उनके हाथ से चली गयी। यहां योगी की 16 सभाएं और उनकी सरकार के 12 मंत्रियों की पदयात्राएं काम नहीं आईं। 
 
मुख्यमंत्री का शहर होने के बावजूद गोरखपुर का बुरा हाल
 
हाल ही में बीआरडी मेडिकल कालेज में जिस तरह बच्चों की लगातार मृत्यु होने के बावजूद सरकार कुछ नहीं कर सकी, सड़कों और बिजली की हालत में ज्यादा सुधार नहीं हुआ, रोजगार को लेकर जो वादे किये गये थे वह पूरे नहीं होते दिख रहे तो लोगों में गुस्सा पनपेगा ही। हिन्दुत्व के सहारे लोगों को ज्यादा समय तक गोलबंद नहीं किया जा सकता। जब विकास के वादे पर आये हैं तो विकास करना ही होगा। अब तक के चुनावों में गोरक्षनाथ पीठ के प्रति गहरी आस्था होने के चलते जातीय प्रभाव फीके पड़ जाते थे लेकिन इस बार जैसे ही पीठ चुनावों से दूर हुई लोगों ने अपनी 'पीठ' फेर ली। 
 
योगी को आगे सतर्क रहना होगा
 
योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस की वजह से मिली है यदि योगी 2019 में डिलीवर नहीं कर पाये तो उन्हें वापस अपने मठ में जाना पड़ सकता है। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि बड़े से बड़े नेता का चुनाव हारने पर क्या हश्र होता है। अभी हाल ही में हिमाचल प्रदेश में भले प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली हो लेकिन अपनी सीट हार जाने के चलते उन्हें घर बैठना पड़ गया।
 
केशव प्रसाद मौर्य का क्या होगा?
 
2017 के विधानसभा चुनावों में जब भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिला तब केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। उन्हें लगा कि यह उनके नेतृत्व और सांगठनिक कौशल की जीत है। इससे पहले जब 2014 में उन्होंने फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव जीता था तब भी उन्हें खुद के बड़ा नेता होने का अहसास हुआ था क्योंकि आजादी के बाद पहली बार यह सीट भाजपा की झोली में आई थी। देखा जाये तो केशव प्रसाद ने हर बार खुद को ज्यादा बड़ा नेता आंक लिया। दरअसल 2014 में सिर्फ मोदी लहर ने ही उनकी नैया पार लगायी और 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह चुनाव मैदान में खुद कूद पड़े थे उसने काफी हद तक भाजपा की जीत में बड़ा योगदान दिया। चुनावों के बाद वह मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से संतोष करना पड़ा। कहा जाता है कि वह मुख्यमंत्री के लिये नित नई परेशानी खड़ी करते रहते हैं लेकिन पहले निगम चुनावों में अपने गढ़ में भाजपा की हार और अब फूलपुर संसदीय सीट नहीं बचा पाना उन्हें उनका असल राजनीतिक कद बता गया है।
 
मोदी-शाह की जोड़ी के लिए आराम नहीं
 
इन चुनाव परिणामों ने मोदी और शाह की जोड़ी की चिंता बढ़ा दी है। यह जोड़ी राज्यों में नया नेतृत्व खड़ा कर रही है ताकि उनका बोझ कुछ कम हो लेकिन कुछ समय पहले राजस्थान, फिर मध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश के नतीजों ने दिखा दिया है कि मोदी और शाह को फिर से खुद ही सब कुछ देखना होगा। साथ ही उत्तर प्रदेश में तो अब राजनीतिक बिसात संभावित नये महागठबंधन को देख कर बिछानी होगी।
 
कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं
 
उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर में भले कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी हो और बिहार में भी संसदीय और विधानसभा सीटों के उपचुनाव में कांग्रेस को कुछ हाथ नहीं लगा हो लेकिन फिर भी पार्टी बहुत खुश है। वह खुश इसलिए है क्योंकि इन चुनाव परिणामों से क्षेत्रीय दलों और अन्य विपक्षी दलों को यह बात साफ तौर पर समझ आ गयी है कि एक होकर भाजपा को हराया जा सकता है। अभी तक कांग्रेस संप्रग से और दलों के जुड़ने का आह्वान करती रही थी लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा था पर अब माहौल बदल सकता है। यही नहीं माकपा में भी जो कांग्रेस के साथ आने या नहीं आने पर संशय है वह भी दूर हो सकता है।
 
बहरहाल, लोकसभा चुनाव में अभी करीब एक साल का समय बाकी है और सियासत में कल क्या होगा, कोई नहीं कह सकता, लेकिन गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा विरोधी गठबंधन के लिये अहम संदेश जरूर दे दिया है।
 
-नीरज कुमार दुबे
 

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