चीन की चतुराई उसे ही भारी पड़ेगी, इतिहास गवाह है भस्मासुर पालने वालों का क्या हुआ

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Mar 15 2019 2:29PM
चीन की चतुराई उसे ही भारी पड़ेगी, इतिहास गवाह है भस्मासुर पालने वालों का क्या हुआ
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चीन ने कभी आतंकवाद की पीड़ा वैसी नहीं झेली जैसी भारत या अन्य देशों ने झेली है इसलिए उसे इस दर्द का अहसास नहीं है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों में यकीन नहीं रखने वाला चीन पीठ में छुरा घोंपने वाला देश बन गया है।

चीन ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने की राह में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तकनीकी रोक लगाकर साफ कर दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ जब लड़ाई में पूरा विश्व एकजुट होकर खड़ा है ऐसे में वह आतंकवादी देश पाकिस्तान और वहां के आतंकवादियों के साथ खड़ा है। चीन ने कभी आतंकवाद की पीड़ा वैसी नहीं झेली जैसी भारत या अन्य देशों ने झेली है इसलिए उसे इस दर्द का अहसास नहीं है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों में यकीन नहीं रखने वाला चीन पीठ में छुरा घोंपने वाला देश बन गया है।
भाजपा को जिताए
 
दादागिरी की चाहत पर जवाबदेही नहीं चाहता चीन
 


चीन को अब इस बात की परवाह नहीं कि दुनिया उसके बारे में क्या सोचेगी। संयुक्त राष्ट्र हो या कोई और अंतरराष्ट्रीय संस्था, चीन वहां अपनी दादागिरी तो बनाये रखना चाहता है लेकिन इन संस्थाओं का कोई फैसला अगर उस पर लागू करने की बात आये या उसे वह अपने हित में नहीं लगे तो उसके विरोध में उतर जाता है। कौन भूला है दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का जुलाई 2016 में आया वह फैसला, तब न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर सिर्फ चीन के अधिकार को नहीं माना था। उसने सागर के एक हिस्से पर फिलीपींस के दावे की पुष्टि की थी लेकिन चीन की हेकड़ी देखिये कि उसने तब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के इस फैसले को मानने से न सिर्फ इन्कार कर दिया था बल्कि संप्रभुता की रक्षा के लिए सेना तैयार होने की धमकी भी दे डाली थी।
चीन को आखिर कितने सुबूत चाहिए


 
अब जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के मामले में ही देखिये भारत सहित पूरी दुनिया दस सालों से कोशिश कर रही है कि इसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जाये लेकिन चीन मांग रहा है सुबूत। 2009 में 26/11 के मुंबई हमले सहित विभिन्न आतंकी हमलों में जैश सरगना की भूमिका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाया गया कि अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जाये। उस प्रस्ताव को 13 देशों ने समर्थन दिया लेकिन चीन ने लगा दिया वीटो क्योंकि उसे चाहिए सुबूत। शायद उसे मुंबई हमलों की वह भयावह तसवीरें नहीं दिखाई दीं जहां निर्दोषों की लाशें बिखरी हुई थीं। शायद उसे पाकिस्तान में बैठे आतंकी हैंडलरों की वह वॉइस कॉल्स नहीं सुनाई दीं जिसमें वह आतंकवादियों को निर्देश देते सुनाई दे रहे थे, शायद उसे डेविड हेडली की उन गवाहियों पर भरोसा नहीं जो उसने अमेरकी अदालतों में दीं।
 
मसूद अजहर पर प्रतिबंध का प्रस्ताव 2016 में भी आया। पठानकोट वायुसेना हवाई अड्डे पर हुए हमले के मास्टरमाइंड अजहर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाये गये प्रस्ताव को 14 वोट मिले लेकिन चीन ने 2016 के मार्च और अक्तूबर में दो बार इस प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगा दी क्योंकि उसे चाहिए थे सुबूत।


 
2017 में पी-3 देश खुद अजहर मसूद के खिलाफ प्रस्ताव लेकर आये क्योंकि जम्मू-कश्मीर के उरी में सैन्य शिविर पर हुए आतंकी हमले के पीछे जैश सरगना मसूद अजहर का ही हाथ था। पी-3 देशों के इस प्रस्ताव का अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने खुलकर समर्थन किया लेकिन चीन ने इस प्रस्ताव पर आम सहमति न होने का तर्क पेश करते हुए विरोध कर दिया क्योंकि उसे एक बार फिर चाहिए थे सुबूत।
 
14 फरवरी, 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ की बस पर हुए आतंकी हमले में हमारे 40 जवान शहीद हो गये। इस हमले के पीछे भी जैश सरगना मसूद अजहर ही था। दुख के समय जब पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा था तब चीन इसी उधेड़बुन में लगा था कि पाकिस्तान को कैसे बचाया जाये। मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए इस बार खुद अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पहल की और संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव लेकर आये। इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए और आपत्ति दर्ज कराने के लिए 10 दिन का समय मिला। लेकिन चीन के लिए यह 10 दिन कम थे क्योंकि उसे इस प्रस्ताव को समझने के लिए और वक्त चाहिए इसलिए उसने तकनीकी रोक लगा दी। तकनीकी रोक का अर्थ है संबंधित देश किसी प्रस्ताव पर विचार करने के लिए और समय चाहता है। इसकी अवधि अधिकतम नौ माह होती है।
 
 
आग से खेल रहा है ड्रैगन
 
तो इस तरह चीन को 2009 में भी चाहिए थे सुबूत, 2016 में भी चाहिए थे सुबूत, 2017 में भी चाहिए थे सुबूत और 2019 में भी चाहिए सुबूत। चीन समझ नहीं रहा है वो आग से खेल रहा है। ये वही आग है जिसे पाकिस्तान भी कभी-कभी झेलता है। भस्मासुर को पालोगे तो खुद भी मिट जाओगे। मसूद अजहर को बचा कर चीन भले खुश हो रहा हो लेकिन उसका चेहरा अब पूरी दुनिया के समक्ष उजागर हो चुका है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के राजनयिकों ने चीन को चेतावनी दी है कि यदि वह मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के मार्ग को बाधित करना जारी रखता है तो जिम्मेदार सदस्य देश सुरक्षा परिषद में ‘अन्य कदम उठाने पर मजबूर हो सकते हैं। दूसरी ओर अमेरिका का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता तथा शांति हासिल करने के मामले में उसके चीन के साथ साझा हित हैं, लेकिन जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी नामित करने में "विफलता" इस लक्ष्य को हासिल करने में बाधक है। फ्रांस ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगा दिया है और उसकी संपत्तियों को जब्त करने का ऐलान भी कर दिया है।
 
मसूद अजहर को क्यों बचाना चाहता है चीन ?
 
दरअसल चीन का CPEC प्रोजेक्ट गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से होता हुआ PoK और पाकिस्तान के मानसेहरा से भी गुजरता है। यह इलाका खैबर पख्तूनख्वा में पड़ता है और यह वही राज्य है जहां बालाकोट स्थित है। बालाकोट में ही जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैम्प पर भारतीय वायुसेना ने स्ट्राइक कर उसे उड़ा दिया था। CPEC प्रोजेक्ट पर चीन के लगभग 12 हजार नागरिक काम कर रहे हैं और चीन को इस बात का भय है कि यदि उसने मसूद अजहर का साथ नहीं दिया तो उस इलाके में प्रभावी जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी कहीं उसके प्रोजेक्ट को या वहां काम कर रहे उसके कर्मचारियों को नुकसान न पहुँचा दें।

चीन पर बरसने की बजाय मोदी पर हमलावर है विपक्ष
 
अब मसूद अजहर पर हो रही घेरलू राजनीति की भी चर्चा कर लेते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं क्योंकि वह चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से 'डरे' हुए हैं। उनके इस आरोप के बाद भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि भारत को जब भी 'पीड़ा' होती है तो राहुल क्यों 'खुश' होते हैं ? वाकई निराशाजनक है कि जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों में सिर्फ चीन को छोड़कर बाकी सभी भारत के साथ खड़े हैं ऐसे में इस विषय पर भारत के राजनीतिक दल भारत सरकार का साथ देने की बजाय अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं।
 
चीन को सुरक्षा परिषद तक किसने पहुँचाया ?
 
अब बात जब चली है तो दूर तलक जायेगी ही। राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाया तो वित्त मंत्री अरुण जेटली देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू तक जा पहुँचे। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए जेटली ने कहा कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मूल रूप से दोषी हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिये भारत की बजाय चीन का पक्ष लिया था। जेटली ने दो अगस्त 1955 को नेहरू द्वारा मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र का हवाला देते हुए कहा, ''कश्मीर और चीन, दोनों पर मूल गलती एक ही व्यक्ति द्वारा की गई।’’ वित्त मंत्री ने कहा कि नेहरू द्वारा दो अगस्त 1955 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र से स्पष्ट होता है कि अनौपचारिक रूप से अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए लेकिन उसे सुरक्षा परिषद में नहीं लिया जाए तथा भारत को सुरक्षा परिषद में लिया जाए। जेटली ने अपने ट्वीट में नेहरू के पत्र के हवाले से कहा कि हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते और यह चीन जैसे महान देश के साथ उचित नहीं होगा कि वह सुरक्षा परिषद में नहीं हो। 
बहरहाल, चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के मार्ग में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तकनीकी रोक लगाने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि इससे ‘‘स्थायी समाधान’’ तलाशने के लिए संबंधित पक्षों के बीच वार्ता में मदद मिलेगी। चीन ने कहा है कि वह आवेदनों की पूर्ण और गहन जांच करता है और उसे अब भी और समय चाहिए इसीलिए उसने तकनीकी रोक लगाई है। जहां तक भारत सरकार का सवाल है तो देश ने चीन के कदम पर निराशा जताते हुए सहयोग प्रदान करने वाले देशों का आभार जताया है। खैर अब चीन के पास अधिकतम नौ माह का समय है यदि उसे और सुबूत चाहिए तो भारत सरकार उसे दे सकती है लेकिन उम्मीद यही है कि वह इस समय का उपयोग आवेदन पर गौर करने में नहीं बल्कि पाकिस्तान और उसके आतंकी आकाओं को कैसे बचाया जाये इसका हल खोजने में लगायेगा।
 
-नीरज कुमार दुबे
 

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