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लगता है बांग्लादेश की राजनीति से खालिदा जिया का युग समाप्त

By कुलदीप नैय्यर | Publish Date: Feb 28 2018 12:29PM

लगता है बांग्लादेश की राजनीति से खालिदा जिया का युग समाप्त
Image Source: Google

बांग्लादेश की न्यायपालिका इतना दबाव में है कि यह विश्वास करना कठिन है कि पूर्व प्रधानमंत्री तथा विपक्ष की नेता खालिदा जिया को दी गई पांच साल की सजा में ईमानदारी बरती गई है। प्रधानमंत्री शेख हसीना की कथित नाराजगी से बचने के लिए जज भागे फिर रहे हैं। एक जज विदेश चले गए और शायद नहीं लौटेंगे क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि प्रधानमंत्री उनसे नाराज हैं। जाहिर है कि जज को भय है कि अगर वह ढाका में कदम रखेंगे तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी। वास्तव में, पूरी न्यायपालिका इस स्थिति से बचने की कोशिश में है।

 
मैं बेगम जिया का बचाव नहीं कर रहा हूं। लेकिन फैसले के पीछे शेख हसीना के हाथ होने को लेकर भावना इतनी मजबूत है कि लोग अदालती फैसले की सच्चाई पर संदेह कर रहे हैं। सजा सुनाते हुए, विशेष अदालत के जस्टिस अख्तरउज्जमां ने कहा कि उनकी ''सेहत और सामाजिक हैसियत'' को ध्यान में रख कर छोटी अवधि की कैद की सजा सुनाई गई है। इसका मतलब है कि बेगम दिसंबर में होने वाले चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगी। उन पर विदेश के दानकर्ताओं से परिवार की ओर से संचालित जिया अनाथालय ट्रस्ट को मिले करीब एक करोड़ 80 लाख रूपयों के गबन का आरोप है।
 
वास्तव में, उनके बेटे तारिक रहमान समेत पांच अन्य लोगों को 10 साल की सजा मिली है। वादी पक्ष की दलील है की उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के नाम पर बने जिया आरफेनेज ट्रस्ट और जिया चैरिटेबल ट्रस्ट सिर्फ कागज पर ही अपना वजूद रखते हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष तथा तीन सहयोगियों को भी जिया चैरिटेबल ट्रस्ट के करीब ढाई लाख रूपयों के गबन का दोषी पाया गया है।
 
अदालती फैसले के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में बेगम जिया ने दावा किया कि उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाया गया और उन्होंने सरकार पर आतंक पैदा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ''मुझे विश्वास है कि अदालत मुझे सभी आरोपों से मुक्त कर देगी। यह एक झूठा मुकदमा है और मुझे और मेरे परिवार को परेशान करने का एक औजार।'' उन्होंने कहा कि अदालती फैसले अगर सत्ता में बैठे लोगों को खुश करने के लिए होंगे तो यह कलंक का इतिहास बनाएगा।
 
खालिदा जिया ने आगे कहा कि यह उन्हें राजनीति और चुनाव से अलग रखने और लोगों से दूर हटाने के लिए अदालत के इस्तेमाल की एक कोशिश है। ''मैं हर नतीजे का सामना करने के लिए तैयार हूं। मैं जेल या सजा से नहीं डरती हूं। मैं सिर झुकाने नहीं जा रही हूं।'' लेकिन कानून के जानकारों का कहना है कि अगर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से एक अलग निर्देश नहीं हासिल किया तो अदालती फैसला उनके राजनीतिक कैरियर को जोखिम में डाल सकता है।
 
सुनवाई अदालत से फैसले की कापी लेने के एक दिन बाद उनके वकीलों में से एक ने इसे चुनौती देने की अपील हाई कोर्ट में दायर की। एक हजार दो सौ तेईस पन्नों की फाइल, जिसमें अब्दुल रज्जाक खान का नाम वकील के रूप में दिया गया है, में जिया को 25 वजहों के आधार पर बरी करने के लिए कहा गया है और आरोप लगाया है कि फैसला रानीनीति से प्रेरित है और उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दिया गया है। शेख हसीना की सरकार इस आरोप का खंडन करती है।
 
उनके बचाव वकीलों में से एक सागीर हुसैन ने मीडिया से कहा कि सुनवाई तय होते ही वे जमानत की अर्जी दायर करेंगे। उन्होंने कहा कि सप्ताह के अंत में दो जजों की बेंच में इसकी सुनवाई की संभावना है। दशकों से प्रधानमंत्री हसीना की प्रतिस्पर्धी रहीं बेगम के खिलाफ भ्रष्टाचार का यह आरोप उनके खिलाफ लंबित कई मुकदमों में से एक है। उन पर लगे आरोपों का ही नतीजा है कि उन्होंने 2014 के चुनावों का बहिष्कार किया था जिसकी वजह से देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे।
 
लेकिन ऐसा लगता है जिया इस साल चुनाव लड़ना चाहती हैं। विरोध की एक रैली में बीएनपी की मुख्य महासचिव मिर्जा आलमगीर ने कहा था, ''पार्टी बेगम जिया के बगैर चुनावों में हिस्सा नहीं लेगी। कोई भी राष्ट्रीय चुनाव बीएनपी अध्यक्ष जिया के बगैर नहीं लड़ा जाएगा।'' लेकिन हसीना ने कहा कि उनकी सराकर कुछ नहीं कर सकती अगर बीएनपी चुनावों के बहिष्कार का फैसला करती है। उन्होंने कहा कि चुनाव दिसंबर में तय कार्यक्रम के अनुसार होंगे, चाहे बीएनपी इसमें हिस्सा ले या नहीं।
 
मीडिया में हो रही आलोचना के जवाब में, शेख हसीना ने कहा कि मुकदमे 2008 में जिया के विश्वासपात्रों की सेना समर्थित सरकार के समय दाखिल किए गए थे जब स्वतंत्र काम करने वाले भ्रष्टाचार विरोधी आयोग ने जांच की थी। ''हम क्या कर सकते हैं अगर वे चुनावों से बाहर रहना चाहते हैं.... अदालत ने उन्हें जेल की सजा सुनाई है।'' हसीना ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा।
 
बेगम जिया जो 1991 से तीन बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं, इस केस के अलावा 30 और अभियोगों का सामना कर रही हैं जो भ्रष्टाचार से लेकर राजद्रोह से संबंधित हैं। बीएनपी की प्रतिक्रिया तुरंत आई और उसने जिया के बेटे रहमान को पार्टी कार्याध्यक्ष के पद पर बिठा दिया। जाहिर है सरकार ने इसकी खिल्ली उड़ाई। हसीना ने यह टिप्पणी भी कर डाली कि यह पार्टी की ''नैतिक गरीबी'' दिखाती है।
 
यह प्रशंसा की बात है कि तीसरी दुनिया में न्यायपालिका स्वतंत्र बनी रही है। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की वजह से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पद छोड़ना पड़ा जब उन्हें इसने दोषी करार दिया। कोर्ट ने कहा कि हटाए गए प्रधानमंत्री ने अदालत और लोगों, संसद से बाहर तथा भीतर दोनों, को मूर्ख बनाने की कोशिश की और कभी भी पूरे सच के साथ अदालत के सामने नहीं आए। नवाज शरीफ ने अदालत के फैसले को यह कह कर स्वीकार किया कि वह लोगों के पास वापस जाएंगे।
 
यही मामला राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के साथ है जिन्हें रांची हाईकोर्ट ने चारा घोटाले में सजा सुनाई है। इसके कई उदाहरण हैं जिसमें राजनेताओं को पद छोड़ना पड़ा। इसके भी कई उदाहरण हैं कि नेताओं ने वापसी की और अदालती फैसले को चुनौती दी ताकि वे लोगों के बीच प्रासंगिक रह सकें।
 
व्यवस्था में पूरी मरम्मत की जरूरत है ताकि भ्रष्ट राजनेताओं को जीवन भर के लिए अयोग्य किया जा सके। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर इसके संकेत दिए हैं कि ''अपराधी नेताओं'' को सरकार में नहीं होना चाहिए। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने इसके लिए व्यवस्था में जरूरी बदलाव को कार्यपलिका पर छोड़ दिया है। यह अभी तक कारगर साबित नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट इसकी उम्मीद कैसे करता है कि भविष्य में ऐसा होगा?
 
- कुलदीप नायर

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