बंगाल और केरल की तरह पंजाब में भी बढ़ती जा रही है राजनीतिक हिंसा

Farmers Protest
राकेश सैन । Mar 30, 2021 12:36PM
अकाली दल बादल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, वामपंथियों सहित अन्य दल तीनों कृषि कानूनों के नाम पर प्रदेश की राजनीति में हावी होने का प्रयास कर रहे हैं और इन्होंने किसान आन्दोलन का शिखर से नख तक राजनीतिकरण कर दिया है।

राजनीतिक हिंसा के लिए पश्चिम बंगाल सुर्खियों में है परन्तु देश का एक अन्य राज्य पंजाब शनै-शनै किसान आन्दोलन की आड़ में इसी तरह की हिंसा की ओर अग्रसर होता दिखाई दे रहा है। 27 मार्च को मुक्तसर जिले के मलोट कस्बे में कथित किसान आन्दोलनकारियों ने अबोहर के भाजपा विधायक अरुण नारंग के साथ न केवल मारपीट की बल्कि उनके कपड़े भी फाड़ डाले। गुण्डा तत्वों ने उनके साथ गाली गलौच भी किया और गाड़ी पर स्याही फेंक दी। पुलिस ने बड़ी मुश्किल के नारंग को इन प्रदर्शनकारी गुण्डों से मुक्त करवाया और एक दुकान में ले जा कर शटर बन्द कर दिया। बाद में विधायक नारंग ने मीडिया को बताया कि प्रदर्शकारी उनकी हत्या कर सकते थे क्योंकि इसी इरादे से उन पर हमला किया गया था।

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पंजाब में किसान आन्दोलन के नाम पर जुट रही असामाजिक शक्तियों ने जो कुछ मलोट में लाखों लोगों के प्रतिनिधि के साथ किया वह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी पंजाब में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा के साथ टाण्डा उड़मुड़ के पास, पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व मंत्री तीक्ष्ण सूद, पूर्व मन्त्री विनोद कुमार ज्याणी, तरुण चुघ सहित नेताओं पर हमले हो चुके हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपाईयों को चुनाव प्रचार तक नहीं करने दिया गया। लेकिन मलोट में विधायक अरुण नारंग के साथ जो कुछ हुआ उसे किसान आन्दोलनकारियों की हताशा व निराशा की चरम सीमा कहा जा सकता है। इसका कारण है कि मौजूदा समय में देश के जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें भाजपा का विरोध करने गए किसान नेताओं को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया। दूसरा, भारत बंद, चक्का जाम जैसे किसानों के हथकण्डे पंजाब व हरियाणा को छोड़ देश में पूरी तरह से बेअसर रहे हैं। इस असफलता ने किसान आन्दोलनकारियों की हताशा को बढ़ाया और उसका परिणाम मलोट कांड के रूप में प्रदेश व देश वासियों के सामने आया।

पंजाब में ऐसे कांड भविष्य में और भी देखने को मिल सकते हैं क्योंकि भाजपा पर दबाव डालने के लिए राज्य के करीब-करीब सभी राजनीतिक दल एक ही नीति पर काम कर रहे हैं। अकाली दल बादल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, वामपंथियों सहित अन्य दल तीनों कृषि कानूनों के नाम पर प्रदेश की राजनीति में हावी होने का प्रयास कर रहे हैं और इन्होंने किसान आन्दोलन का शिखर से नख तक राजनीतिकरण कर दिया है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र की मर्यादा के अनुसार कृषि कानूनों का विरोध करने का हक अगर किसान संगठनों व भाजपा विरोधी दलों को है तो ठीक इसी तरह भाजपा सहित इन कानूनों के समर्थकों को भी अपनी बात रखने का अधिकार है। लोकतन्त्र की सफलता ही इसी बात में है कि पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी बात सार्वजनिक रूप से रख सकते हैं। कृषि कानून देश की संसद में पास हुए हैं। देश को चलाने में संविधान और संसद दो महत्वपूर्ण केन्द्र हैं। इनके साथ है कार्यपालिका और न्यायपालिका। सरकार द्वारा पारित किसी भी कानून का विरोध लोकतान्त्रिक ढंग से ही हो सकता है। दूसरा न्यायपालिका में कानून को चुनौती दी जा सकती है। कानून को अपने हाथ में लेने का तो किसी को अधिकार नहीं है।

मलोट में जो कुछ हुआ वह अलोकतान्त्रिक, अशोभनीय ही है। अगर पंजाब में इसी तरह की घटनाएं होती रहीं या भाजपा का विरोध जिस ढंग से किया जा रहा है, जारी रहा तो, एक दिन पंजाब एक बार फिर अराजकता की ओर बढ़ जाएगा। सवाल पैदा होता है कि देश के जिन-जिन हिस्सों जैसे पश्चिम बंगाल, केरल आदि इलाकों में वामपन्थियों का जनाधार है वहीं ही राजनीतिक हिंसा क्यों होती है। किसान आन्दोलन की आड़ में राज्य में नक्सली व खालिस्तानी गठजोड़ सिर उठा रहा है और सामयिक लाभ के लिए इस अपवित्र गठजोड़ को मूक समर्थन मिल रहा है कांग्रेस का। इसी का परिणाम है राज्य में राजनीतिक हिंसा बढ़ रही है।

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अरुण नारंग सहित अनेक भाजपा नेताओं पर हो रहे हमले तो बड़ी घटनाए हैं, पंजाब में भाजपा के साधारण कार्यकर्ताओं को किस हालत से गुजरना पड़ रहा है उसकी तो कल्पना करना भी मुश्किल है। भाजपा के हर छोटे-बड़े कार्यक्रमों में किसान प्रदर्शनकारियों के रूप में गुण्डा तत्वों का घुस जाना, तोड़फोड़ व मारपीट करना साधारण-सी बात होता जा रहा है। दुखद तो यह है कि इस तरह की अलोकतान्त्रिक घटनाओं के बाद राज्य के मुख्यधारा के दल इन घटनाओं के लिए भाजपाईयों को ही जिम्मेवार ठहराते हैं।

किसानों के नाम पर गुण्डा तत्वों ने किस तरह यहां के उद्योगपतियों व व्यवसाईयों को आतंकित किया उसका उदाहरण राज्य में तोड़े गए एक कंपनी के 1600 से अधिक मोबाइल टावर हैं। प्रदर्शनकारी गुण्डागर्दी करते रहे और राज्य की पुलिस मूकदर्शक बन देखती रही। कार्रवाई के नाम पर पुलिस केस तो दर्ज करती है, जैसे कि मलोट की घटना के बाद भी केस दर्ज किया गया है परन्तु वास्तविक कार्रवाई के नाम पर मौन-सा साध लिया जाता है या फिर मामले पर बर्फ जमने की प्रतीक्षा की जाती है। पुलिस कार्रवाई की गम्भीरता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कथित किसानों द्वारा अभी तक मचाए गए उत्पात की कई दर्जन घटनाओं के मामले में अभी तक आरोपियों को गिरफ्तार करने की जहमत तक नहीं उठाई गई है। लाल किले की घटना का मुख्य आरोपी गैंगस्टर लक्खा सिधाना जैसा गुण्डा सरेआम मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के पैतृक गांव महिराज में किसानों की रैली को सम्बोधित कर जाता है और पुलिस देखते रहने के अतिरिक्त कोई कार्रवाई नहीं कर पाती।

पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में केवल यही घटनाएं चिंता पैदा नहीं करतीं बल्कि यहां गैंगवार की घटनाएं भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं। राज्य चाहे आतंकवाद से ग्रस्त रहा हो परंतु यहां गुण्डों के गैंग होने की बात पिछले कुछ सालों से ही सुनने को मिल रही हैं। गुण्डों को किस तरह राजनीतिक प्रश्रय मिलता है उसका उदाहरण है कि हत्या जैसे संगीन आरोप में फंसे उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर मुख्तार अंसारी को पंजाब की जेल से मुक्त करवाने के लिए यूपी सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। इन्हीं गुण्डा तत्वों के चलते खालिस्तानी आतंकवाद के संचालकों ने भी अपनी रणनीति बदली है। अब वे आतंकियों की भर्ती करने की बजाय इन्हीं गुण्डों को सुपारी देकर अपने विरोधियों की हत्याएं करवा रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह को समझना चाहिए कि भस्मासुरों को पालना न तो राज्य के हित में है और न ही खुद उनके अपने, क्योंकि भस्मासुर कभी अपने परायों की पहचान नहीं किया करते।

-राकेश सैन

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