Prabhasakshi
बुधवार, अगस्त 22 2018 | समय 12:40 Hrs(IST)

स्तंभ

ऑपरेशन ब्लूस्टार गैर-जरूरी था, इसके कागजात सार्वजनिक होने चाहिए

By कुलदीप नैय्यर | Publish Date: Mar 21 2018 10:30AM

ऑपरेशन ब्लूस्टार गैर-जरूरी था, इसके कागजात सार्वजनिक होने चाहिए
Image Source: Google

ब्रिटेन की सरकार ने आपरेशन ब्लूस्टार से संबंधित कागजातों को सार्वजनिक करने की लंदन के सिख समुदाय की एक अर्जी खारिज कर दी है। ब्रिटेन की उस समय की प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफी करीब थीं और कहा जाता है कि उग्रवादी धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरवाले और उसके समर्थकों को हरमंदिर साहिब परिसर से बाहर निकालने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर 1 जून से आठ जून, 1884 के बीच हुई सैनिक कारवाई की योजना बनाने में उन्होंने मदद की।

यह जानकारी अब आई है कि एक ब्रिटिश अफसर खुफिया जानकारी के लिए अमृतसर आया था और उसने सारी जानकारी इकट्ठा की जो स्वर्ण मंदिर में छिपे उग्रवादियों पर हमला करने में काम आई। अब यह महसूस किया जा रहा है कि आपरेशन गैर−जरूरी था और भिंडरवाले को अकाल तख्त से दूसरे तरीकों से बाहर निकाला जा सकता था।
 
लेकिन 34 साल के बाद भी, लोग यह नहीं जानते कि यह आपरेशन क्यों किया गया? बेशक, भिंडरवाले ने अकाल तख्त समेत स्वर्ण मंदिर परिसर को राज्य के रूप में बदल दिया था और इसकी किलेबंदी कर दी थी। वह एक सत्ता बन गया था और उसने सिख समुदाय को आदेश जारी किए। इसके बाद जो आपरेशन हुआ था उसमें टैंक का इस्तेमाल भी करना पड़ा। मुझे याद है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मध्य रात्रि में जगाना पड़ा था क्योंकि भिंडरवाले और उसके मानने वालों की योजनाबद्ध गोलीबारी के कारण भारतीय सेना के पहले जत्थे को पीछे हटना पड़ा।
 
आज भी, लोग हरमंदिर साहिब में गोलियों के निशान देख सकते हैं। भारत सरकार की सैन्य कार्रवाई ने उदार सिखों को नाराज किया क्योंकि स्वर्ण मंदिर को अपना वेटिकन समझते हैं। ब्रिटिश सरकार के पास जो जानकारी है उसे पाए बगैर यह जानना कठिन है कि भारतीय सेना को अव्वल तो हरमंदिर साहिब में दाखिल क्यों होना पड़ा।
 
सैनिक कार्रवाई के कारण पूरी दुनिया के सिख समुदाय में कुहराम मच गया। इस कार्रवाई के बाद पैदा हुए तनाव के कारण भारत में सिख समुदाय के लोगों पर हमले शुरू हो गए। कई सिख सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और कई सिख अधिकारियों ने सैनिक तथा नागरिक प्रशासन की सेवा से इस्तीफा दे दिया। कुछ सिखों ने तो सरकार से मिले पुरस्कार और सम्मान भी लौटा दिए।
 
श्रीमती गांधी इस बारे में सचेत थीं कि सिख समुदाय बदले की कार्रवाई करेगा। उन्होंने भुवनेश्वर की एक जनसभा में कहा था कि उन्हें अंदर से लग रहा है कि उनकी उनकी हत्या कर दी जाएगी। लेकिन उन्होंने जो सोचा वह सरकार का रौब बनाए रखने के लिए था। चार महीने के बाद उनके साथ जो हुआ वह दुखद है। सिख सुरक्षा गार्डों ने उनकी हत्या कर दी जिसे एक बदले की कार्रवाई के रूप में देखा गया। यह यहीं नहीं रूका। सरकारी बयान के मुताबिक इसके बाद हुए सिख दंगों में सिर्फ दिल्ली में तीन हजार सिख मारे गए।
 
मैं उस टीम का सदस्य था जिसमें जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, एयरमार्शल अर्जुन सिंह तथा इंदर गुजराल, जो बाद में प्रधानमंत्री बने, थे। हमारा निष्कर्ष था कि सैनिक अभियान जरूरी नहीं था और भिडंरवाले से दूसरे तरीके से निपटा जा सकता था। यह हमने पंजाबी ग्रुप को दी गई रिपोर्ट में बताया। ग्रुप ने हमें सिख विरोधी दंगे की जांच के लिए नियुक्त किया था।
 
उस समय पीवी नरसिंहाराव गृहमंत्री थे और जब सरकार की कार्रवाई की समीक्षा के लिए हमारी टीम उनसे मिली तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया। बाकी जिन लोगों, जिनमें गवाह भी शामिल थे, से हम लोग मिले उन्होंने इसे सरकार की ओर से जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया का मामला बताया। दिल्ली और आसपास के इलाकों में हुए सिख विरोधी दंगों को तुरंत रोका जा सकता था, लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जानबूझ कर पुलिस या सेना को दखल देने के लिए नहीं बुलाया। कहा जाता है कि उन्होंने दंगों को सहज प्रतिक्रिया बताया। कहा जाता है कि उन्होंने यह कहकर अपनी प्रतिक्रिया भी जाहिर की कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती ही है।
 
आज स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश करने के तीन दशक बाद, हाल में सार्वजनिक हुए ब्रिटिश दस्तावेजों ने यह दिखा कर कि सिखों के ऐतिहासिक स्थल को फिर से अधिकार में लेने के लिए ब्रिटेन ने भारत को सैनिक सलाह दी थी, दिल्ली तथा लंदन में एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। ब्रिटिश सरकार ने इन खुलासों की जांच करने के आदेश दिए हैं तथा भाजपा ने इसकी सफाई मांगी है।
 
लेकिन सिख उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई में लगे खुफिया अधिकारियों और आपरेशन ब्लूस्टार का नेतृत्व करने वाले सैनिक अधिकारियों ने किसी ब्रिटिश योजना का इस्तेमाल करने की बात से इंकार किया है। उन्होंने कहा है कि जहां तक उनका संबंध है, सारे आपरेशन की योजना बनाने और अंजाम देने का काम भारतीय सेना ने किया था।
 
खुलासे ब्रिटेन के राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से 30 साल की गोपनीयता के नियम के तहत सार्वजनिक किए गए पत्रों की एक श्रृंखला में दिए गए हैं। तारीख 23 फरवरी, 1984 के एक सरकारी पत्राचार, जिसका शीर्षक 'सिख समुदाय' है, ने विदेश मंत्री के एक अधिकारी ने गृहमंत्री के एक निजी सचिव को कुछ पृष्ठभूमि से अवगत कराने की इच्छा जाहिर की है जो देश के सिख समुदायों पर होने वाले परिणाम की संभावना बढ़ा सकती है।
 
''भारतीय अधिकारियों ने हाल ही में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से सिख उग्रवादियों को बाहर निकालने की योजना को लेकर ब्रिटिश सलाह मांगी है। विदेश मंत्री ने भारत के आग्रह का सकारात्मक जवाब देने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री की सहमति से स्पेशल एयर सर्विस के एक अधिकारी ने भारत की यात्रा की है और एक योजना बनाई है जिसे श्रीमती गांधी ने स्वीकृति दे दी है। विदेश मंत्री का मानना है कि भारत की सरकार इस योजना के अनुसार जल्द ही आपरेशन करेगी'' पत्र ने कहा है।
 
पत्र आगे कहता है कि अगर ब्रिटेन की सलाह की जानकारी लोगों के बीच गई तो ब्रिटेन के भारतीय समुदाय में तनाव पैदा होगा। किसी भी पत्र में इसका कोई सबूत नहीं है कि ब्रिटिश योजना को आखिरकार जून 1984 के आपरेशन के लिए इस्तेमाल में लाया गया।
 
ब्रिटिश सरकार ने लंदन में कहा कि वह इस मामले से अपने संबंधों की जांच कराएगी। ''इन घटनाओं के कारण दुखद रूप से लोगों की जानें गई हैं और इन पत्रों से उठने वाली एकदम जायज चिंताओं को हम समझते हैं। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट सचिव को इस मामले की तत्काल जांच करने तथा असलियत ठहराने का आदेश किया है'' ब्रिटिश सरकार के एक प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा। आपरेशन ब्लूस्टार के कागजातों को सार्वजनिक करना होगा क्योंकि समय बीतने के साथ यह महसूस होता है कि यह एक ऐसा आपरेशन था जिसे नहीं होना चाहिए था।
 
-कुलदीप नायर

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

शेयर करें: