फीफा विश्वकप में जाकिर नाइक को बुलाकर कतर ने खेल संस्कृति को बदनाम किया है

Zakir Naik
Prabhasakshi
ललित गर्ग । Nov 23, 2022 12:03PM
फीफा जैसे खेल आयोजनों का उद्देश्य विश्व को जोड़ना है न कि तोड़ना। फिर इस विश्वकप में नाइक के द्वारा दिये जाने वाले विषैले उपदेशों के इस भटकाव का लक्ष्य क्या है? इस विषवमन का उद्देश्य क्या है? दुनिया को जोड़ने की बजाय तोड़ने की मानसिकता का अंत क्या है?

कतर में फुटबॉल के ‘महाकुंभ’ फीफा विश्वकप 2022 का आयोजन प्रारंभ हो चुका है। अल खोर शहर के 60 हजार क्षमता वाले भव्य अल वायत स्टेडियम में दुनियाभर से फुटबाल प्रेमी पहुंचे हैं, जिनमें भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अरब देश में आयोजित यह पहला विश्वकप आयोजन है, जो भव्यतम खेल आयोजनों की दृष्टि से नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इस आयोजन की अनेकानेक विलक्षण, आश्चर्यकारी घटनाओं एवं व्यवस्थाओं के बीच विवादित धर्मगुरु जाकिर नाइक को आमंत्रित कर खेल परम्पराओं पर साम्प्रदायिक विषता का रंग देने की कुचेष्टा हुई है, निश्चित ही इससे अनेक प्रश्न खड़े हुए हैं, विवाद का वातावरण बना है, खेल की सौहार्द एवं सद्भावनामूलक भावनाओं को आहत किया गया है। क्योंकि जाकिर खेल देखने नहीं, बल्कि बाकायदा एक षड्यंत्र एवं सोची समझी नीति के तहत फीफा विश्व कप के दौरान धार्मिक व्याख्यान देने के लिए कतर में पहुंचा है। जाकिर पर धार्मिक समुदायों के बीच नफरत, द्वेष, घृणा फैलाने, युवाओं को कट्टर बनाने, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकियों की खुली वकालत करने जैसे आरोप हैं। वह भारत में मोस्ट वांटेड है, ऐसे में इस दुनिया के इस सबसे बड़े खेल आयोजन में उसे आमंत्रित करना विवादास्पद होने के साथ अनेक सवाल खड़े करता है।

भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द एवं आपसी भाईचारें की तस्वीर को रौंदने वाले, हमेशा ही विवादों को अपने साथ लेकर चलने वाले एवं खुद को धर्मोपदेशक कहने वाला जाकिर नाइक फीफा के आयोजन में उपस्थित होकर खिलाड़ियों को धार्मिक कट्टरता का प्रशिक्षण एवं उपदेश देगा। भारी विवादों से घिरे नाइक पर भारत में सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने और गैरकानूनी गतिविधियां चलाने को लेकर जांच चल रही है, वह भारत की सुरक्षा एजेन्सियों के लिय भगौड़ा है। इसकी पृष्ठभूमि में गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि “जाकिर नाइक देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए खतरा है। नाइक की गतिविधियां सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करके लोगों के दिमाग को प्रदूषित करके देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को खराब करेंगी। इससे देश विरोधी भावनाएं बढ़ेंगी। देश में अलगाववाद और ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा जो देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करेगी। इस्लामिक रिसर्च फाउण्डेशन की गतिविधियों के संबंध में उसको तत्काल बैन करना जरूरी है।” जरूरत तो फीफा जैसे आयोजनों में उसकी उपस्थिति पर बैन की भी है। प्रश्न है कि भारत सरकार फीफा में उसके आमंत्रण को लेकर क्या कदम उठायेगी?

भले ही मलेशिया ने उसे स्थाई निवास की इजाजत दी थी पर अब वह वहां भी उन्हीं आरोपों में घिर गया है जिसके लिए वह जाना जाता है। विष उगलने वाले उसके जैसे लोग पूरी दुनिया के लिये गंभीर खतरा हैं, अब खेलों पर भी उनकी काली छाया पड़ना गंभीर चिन्ता का विषय है। लेकिन विडम्बना है कि साम्प्रदायिक आग्रहों एवं स्वार्थों के कारण दुनिया ऐसे खतरों को पहचान नहीं पा रही है और जब ऐसे लोग अपना जहर फैलाने एवं विध्वंस करने में सफल हो जाते हैं, तब तक काफी देर हो चुकी होती है, इस फीफा में उसके जहर उगलने के क्या दुष्परिणाम होंगे, यह भविष्य के गर्भ है। लेकिन इतना तय है कि फीफा विश्व कप पर वह एक काला दाग बनेंगे।

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जाकिर नाइक एक नासूर है, दीमक की तरह है, जो न केवल लोगों के आपसी सौहार्द एवं अमन चैन को छीन लेता है बल्कि सम्पूर्ण मानवता को तहस-नहस कर देता है। ऐसा ही उसने भारत में लम्बे समय तक विषवमन किया, जब यहां की सरकार सचेत हुई और उसके खिलाफ कार्रवाई करने को तत्पर हुई तो उसने मलेशिया में पनाह ली। वहां भी इस्लाम को बचाने के नाम पर उसने वहां रह रहे चीनी समुदाय के खिलाफ विष वमन करते हुए कहा था कि चीनी समुदाय के लोगों को मलेशिया छोड़कर चले जाना चाहिए, क्योंकि वे इस देश के नागरिक नहीं, बल्कि मेहमान हैं। पिछले दिनों उन्होंने उन हिंदुओं के खिलाफ बयान दे डाला, जो सदियों से मलेशिया के नागरिक हैं और वहां की स्थानीय संस्कृति व राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। इस तरह उसने मलेशिया की शांति एवं अमन को खण्डित कर दिया। उसने न केवल भारत बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी अपने कट्टरपंथी भाषणों, विषवमन, उन्मादी अभियानों से मजहबी कट्टरता को बढ़ाया है और आतंकवादी घटनाओं के लिये भी प्रेरित किया। इस्लाम में अनेक ऐसे धर्मगुरु हैं, जिनकी प्रतिष्ठा विश्वव्यापी होने के साथ मुसलमानों के बीच भी है, उनसे इतर आखिर नाइक को फीफा में इतनी प्रमुखता देने की आवश्यकता क्यों हुई?

जाकिर नाइक जैसे उन्मादी एवं कट्टरवादी लोग केवल भारत के लिए ही खतरनाक नहीं हैं, बल्कि वह पूरी दुनिया के लगभग सभी देशों के लिए भी खतरनाक हैं। एक दूसरा सच यह भी है कि दुनिया अभी तक इस तरह के खतरों से निपटने के रास्ते तलाश नहीं सकी है। और यह भी कि दुनिया के कुछ देश तो उसे शायद खतरा मानने के लिए तैयार भी न हों। आतंकवादियों के खिलाफ तो फिर भी एक तरह की आम सहमति दुनिया में दिख रही है, पर उन लोगों के खिलाफ कुछ नहीं हो रहा, जो समाज में वैमनस्य फैलाने, इंसानों को आपस में बांटने, साम्प्रदायिक सौहार्द को खण्डित करने के लिए जाने जाते हैं। गौरतलब है कि दुनिया भर में ऐसे करोड़ों लोग हैं जो विश्व प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान डॉ. जाकिर नाईक को मुस्लिम कट्टरता के लिये पसंद करते हैं। उसका भाषण सुनते और देखते हैं। फेसबुक एवं ट्विटर पर उसके करोड़ों फॉलोअर्स हैं। उर्दू, बंगला और अंग्रेजी भाषाओं में प्रसारित होने वाला उसका पीस टीवी चैनल दुनिया भर में दो करोड़ से भी अधिक लोग देखते हैं। जाकिर नाईक ढाका आतंकवादी हमलों को लेकर विवाद की चपेट में आया। समूची दुनिया में इस्लाम को संगठित करने एवं इस्लाम के खतरे में होने की बात कहते हुए जाकिर जैसे कट्टरवादी एवं जहरीले लोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिये अपनी कौम को भी खतरे में डाल रहे हैं। किसी एक वर्ग के प्रति द्वेष और किसी एक के प्रति श्रेष्ठ भाव एक मानसिकता है और ऐसी मानसिकता विचारधारा नहीं बन सकती/नहीं बननी चाहिए। लेकिन राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित यह मानसिकता जिस ट्रैक पर चल पड़ी है, क्या वह दुनिया को अखण्डता की ओर ले जा रही है? क्या भटकाव एवं बिखराव की यह मानसिकता सम्पूर्ण मानवता के लिये एक गंभीर खतरा नहीं है? क्या विश्व खेलों के सौहार्द एवं सद्भावना के दृश्यों को इससे नुकसान नहीं पहुंचेगा?

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फीफा जैसे खेल आयोजनों का उद्देश्य विश्व को जोड़ना है न कि तोड़ना। फिर इस विश्वकप में नाइक के द्वारा दिये जाने वाले विषैले उपदेशों के इस भटकाव का लक्ष्य क्या है? इस विषवमन का उद्देश्य क्या है? दुनिया को जोड़ने की बजाय तोड़ने की मानसिकता का अंत क्या है? जबकि कोई भी साध्य शुद्ध साधन के बिना प्राप्त नहीं होता। जाकिर से जो मानसिकता पनपी है, उससे राजनैतिक दल एवं साम्प्रदायिक संगठन एवं शक्तियां अपना स्वार्थ भले सिद्ध करें, लेकिन इंसानियत खतरे में आ जाती है। भारत में उन पर, उनकी संस्थाओं पर सांप्रदायिकता भड़काने से लेकर विदेशी मदद लेने जैसे कई मामले चल रहे हैं, जिनसे बचने के लिए वह दुनिया भर में घूमते रहे हैं।

जाकिर ने मलेशिया के मुसलमानों को भड़काने के लिये कहा कि मलेशिया के हिंदुओं की मलेशियाई प्रधानमंत्री के मुकाबले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में ज्यादा आस्था है। इस बयान एवं विषवमन के बाद मलेशिया की राजनीति में तूफान आ गया है। चीनी और हिंदू, दोनों समुदायों के लोगों और नेताओं ने जाकिर नाइक का विरोध शुरू कर दिया है। इस बीच यह भी पता चला है कि मामले सिर्फ दो ही नहीं हैं। मलेशियाई सरकार को जाकिर नाइक के खिलाफ सैंकड़ों शिकायतें मिल चुकी हैं। इन तमाम शिकायतों का नतीजा यह हुआ है कि मलेशिया सरकार जाकिर नाइक से पूछताछ एवं जांच करने को तत्पर हुई है। नाइक सिर्फ उपदेशक ही नहीं, मलेशिया में चलाए जा रहे धर्मांतरण अभियान का भी हिस्सा है। उसने मलेशिया की साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी स्थितियों को आघात लगाया है, जबकि इन्हीं कारण मलेशिया की गिनती विश्व के उन देशों में होती है जो दक्षिण-पूर्व एशिया के महत्वपूर्ण कारोबारी केंद्र हैं, जो अपने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जाने जाते हैं।

जाकिर जैसे संकीर्ण, कट्टरपंथी एवं बिखरावमूलक लोग गांव से लेकर शहर तक, पहाड़ से लेकर सागर तक, देश से लेकर दुनिया तक, राजनीति से लेकर खेलों तक के साम्प्रदायिक सौहार्द को खण्डित करने पर तुले हैं। जाकिर जैसे लोग सौहार्द एवं सद्भावना की सहज संवेदना को पक्षाघात पहुंचाने एवं लहूलुहान करने पर आमदा हैं, इससे पूर्व कि यह धुआं-धुआं हो, इसमें रक्त संचार करना होगा। विषवमन तो वे करते हैं जिनकी करुणा सूख जाती है। जबकि करुणा, सौहार्द एवं संवेदना के बिना खेलों के सौहार्द की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

-ललित गर्ग

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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