मज़हबी पोंगापंथी से ऊपर उठकर फरमानी नाज़ के भजनों को सुनें और सराहें मौलाना

Farmani Naaz
Prabhasakshi
देवबंद के उलेमाओं के वाग्बाणों के बाद कोई आश्चर्य नहीं कि अब नाज़ के भजनों, गजलों और गीतों को सुनने वालों की संख्या करोड़ों तक पहुंच जाए। हमारे पोंगापंथी मौलानाओं की फरमानी नाज़ पर यह बड़ी कृपा बरसेगी। मैंने भी फरमानी नाज़ को सुनने की कोशिश की।

भारत में मजहब के नाम पर किस कदर पोंगापंथी लोग कोहराम मचाकर खुश होते हैं? अब ताजा क़िस्सा सामने आया है, मुजफ्फरनगर की युवा गायिका फरमानी नाज़ का! यह एक घरेलू मुस्लिम महिला है। इस तीस वर्षीय मुस्लिम महिला के खिलाफ कुछ मुस्लिम मौलानाओं ने अपने तोप और तमंचे दागने शुरु कर दिए हैं, क्योंकि उसका गाया हुआ एक भजन ‘हर हर शंभू’ बहुत लोकप्रिय हो रहा है। उस भजन को इंटरनेट पर अभी तक लगभग 10 लाख लोग सुन चुके हैं।

देवबंद के उलेमाओं के वाग्बाणों के बाद कोई आश्चर्य नहीं कि अब नाज़ के भजनों, गजलों और गीतों को सुनने वालों की संख्या करोड़ों तक पहुंच जाए। हमारे पोंगापंथी मौलानाओं की फरमानी नाज़ पर यह बड़ी कृपा बरसेगी। मैंने भी फरमानी नाज़ को सुनने की कोशिश की। उसके शिव भजन में तो मुझे कोई खास रस नहीं आया लेकिन उसकी गजलें सुनकर मैं दंग रह गया। अपने चूल्हे पर गोबर लीपती हुई नाज़ जो गजल गा रही है, बिना तबला और बांसुरी के, वह भी सीधे दिल में उतर रही थी। देवबंद के एक मौलाना और मुफ्ती ने फरमानी नाज़ के शिव भजन गाने पर घोर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यदि आप मुसलमान हैं तो आपको किसी अन्य मजहब के देवी-देवताओं के भजन बिल्कुल नहीं गाने चाहिए। इस्लाम इसकी इज़ाजत कतई नहीं देता। उनके इस एतराज़ का फरमानी और उसकी माँ, दोनों ने साफ़-साफ़ लफ्जों में जवाब दिया है। उनका कहना है कि फरमानी नाज़ पक्की मुसलमान है और वह नियमित नमाज़ भी अदा करती है। लेकिन उसकी शादी के दो साल बाद ही उसका तलाक हो गया। उसे मुंबई के ‘इंडियन आइडोल’ में गोल्डन टिकिट भी मिल गया था लेकिन उसे छोड़कर उसे फिर मुजफ्फरनगर आना पड़ा, क्योंकि उसके दो साल के बेटे के गले का गंभीर आपरेशन जरूरी था। उसके लिए वह पैसा कहां से लाती? सो, उसने गाना शुरू कर दिया। उसके पास कोई कमी नहीं रही। उसकी माँ फातिमा बेगम ने कहा कि उसके गायन ने ही बच्चे के जान बचाई! 

इसे भी पढ़ें: फरमानी ने गाया 'हर-हर शंभू' गाना, मौलानाओं को हुई परेशानी, गायिका बोली- मैं कलाकार हूं मेरा कोई धर्म नहीं!

उन दोनों का कहना है कि संगीत का कोई मजहब नहीं होता। उनकी यह बात गलत होती तो मोहम्मद रफी, ए़.आर. रहमान, जावेद अख्तर, लता मंगेशकर, शकील बदायूंनी जैसे दर्जनों बड़े नाम मैं गिना सकता हूं कि जिन्होंने एक-दूसरे के धार्मिक भजनों और गीतों को गाया और लिखा है। मुसलमान और ईसाई अभिनेताओं ने हिंदू देवी-देवताओं के रोल किए हैं और हिंदू अभिनेताओं ने मुस्लिम बादशाहों के रोल अदा किए हैं। क्या देवबंद के मौलानाओं को पता नहीं है कि रसखान ने कृष्णभक्ति में जो अदभुत काव्य लिखा है, क्या वैसा किसी हिंदू कवि ने भी लिखा है? अगर फरमानी नाज़ के खिलाफ आप फतवा जारी करेंगे तो आपको रहीम, रसखान, कबीर, मलिक मुहम्मद जायसी जैसे भारतीय महाकवियों के खिलाफ भी फतवा जारी करना पड़ेगा। मुझे तो कई बार पाकिस्तान के कई प्रसिद्ध गायकों के घर पर हिंदू भजन सुनकर चकित हो जाना पड़ा है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के अनेक शास्त्रीय संगीत महारथियों को मैंने काबुल, कराची, लाहौर और दिल्ली में पक्के शास्त्रीय गायन में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख करते हुए सुना है। मीर, गालिब, इकबाल जैसे महान शायरों की कविताओं में मजहबी पोंगापंथियों की जो मज़ाक उड़ाई गई है, उसे मैं यहां दोहराना नहीं चाहता हूं। देवबंद के मुल्ला-मौलवियों से मेरा अनुरोध है कि वे थोड़ी उदारता अपनाएं ताकि भारतीय इस्लाम दुनिया भर के इस्लाम से बेहतर बनकर उभरे और जिनकी नकल आप करना चाह रहे हैं, वे आपकी नकल करने लगें।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अन्य न्यूज़