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पहले मुलायम-कांशीराम की जोड़ी हिट थी अब बुआ-भतीजे का कमाल

By अजय कुमार | Publish Date: Mar 14 2018 3:44PM

पहले मुलायम-कांशीराम की जोड़ी हिट थी अब बुआ-भतीजे का कमाल
Image Source: Google

उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर उप−चुनाव के नतीजे बीजेपी से अधिक बड़ा झटका सीएम आदित्यनाथ योगी के लिये रहा। गोरखपुर से पांच बार सांसद रह चुके योगी के इस्तीफा देने के बाद ही यह सीट रिक्त हुई थी। बीजेपी आलाकमान फूलपुर लोकसभा सीट को लेकर तो आशंकित था, परंतु गोरखपुर में उसे कोई संदेह नजर नहीं आ रहा था। कहने को तो इन नतीजों को लेकर काफी कुछ कहा और लिखा जा रहा है, मगर इन नतीजों के पीछे तमाम किन्तु−परंतु छिपे हुए हैं। कट्टर प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी−बसपा का गठबंधन, वोटिंग का कम प्रतिशत अगर बीजेपी की हार का कारण बना तो सच्चाई यह भी है कि बीजेपी बूथ मैनेजमेंट में चूक गई। अन्यथा ज्यादातर मौकों पर उप−चुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही जाते हैं। उप−चुनावों के नतीजों से यह भी साफ हो गया है कि चाहे कोई भी नेता अपने आप को कितना ही बड़ा समझे लेकिन मोदी के बिना बीजेपी की मजबूती की कल्पना नहीं की जा सकती है। मोदी जहां जाते हैं वहां बीजेपी की जीत काफी हद तक पक्की हो जाती है।

इन नतीजों को लेकर सपा−बसपा का उत्साहित होना तो बनता है, मगर यह नहीं कहा जा सकता है कि इससे अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव के बारे में कोई बड़ा निष्कर्ष निकल आया है। यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि गोरखपुर और फूलपूर दोनों ही जगह बसपा−सपा गठबंधन के प्रत्याशी हाथ मिलाने के बाद भी बहुत बड़े अंतर से नहीं जीत सके हैं। एक−दो चुनाव साथ मिलकर लड़ लेना आसान है, परंतु गठबंधन धर्म को लम्बे समय तक चलाने का बसपा सुप्रीमो मायावती का रिकार्ड अच्छा नहीं है। वह कब बिदक जायें और गठबंधन तोड़ दें कोई नहीं जानता है।
 
बात बीएसपी की कि जाये तो आम तौर पर बीएसपी उप−चुनाव नहीं लड़ती है, इसीलिये उसने सपा प्रत्याशी को समर्थन दे दिया, लेकिन जब मुकाबला 80 सीटों पर एक साथ होगा तो चुनाव की राह इतनी आसान नहीं होगी, उस समय वोट प्रतिशत अगर बढ़ेगा तो इसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा, जैसा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देखने में आया था। उप−चुनाव के नतीजों का विश्लेषण किया जाये तो यह साफ नजर आता है कि बीएसपी−एसपी की जीत का बड़ा कारण बीजेपी के मतदाताओं का मतदान स्थल तक नहीं पहुंचना था, न कि योगी सरकार के कामकाज से जनता की नाराजगी।
 
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद खाली हुई गोरखपुर सीट और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर सीट पर शुरुआती दौर में कांटे की टक्कर देखने को मिली लेकिन बाद में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों ने बड़ा उलटफेर कर दिया। इन दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बीच गठजोड़ और कम वोटिंग का साफ असर देखने को मिला। बता दें कि सीएम योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर में 47.45 फीसदी वोटिंग हुई, वहीं फूलपुर में 37.39 फीसदी मतदान हुआ है। 2014 के आम चुनाव में इन दोनों सीटों पर बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। यहां तक कि एसपी, बीएसपी और कांग्रेस को मिले सभी वोट भी बीजेपी के विजयी उम्मीदवार से कम थे। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान फूलपुर में 50.20 फीसदी मतदान हुआ था, जबकि गोरखपुर में 54.64 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। यानी उप−चुनाव के मतदान में पिछले चुनाव के मुकाबले 12 फीसदी तक की गिरावट दर्ज आई थी।
 
बहरहाल, दो लोकसभा सीटों के नतीजे न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि केंद्र की राजनीति के सियासी समीकरणों में भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। गोरखपुर और फूलपुर उप−चुनाव को राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और सपा−बसपा की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था, अगर दोनों सीटों पर बीजेपी जीत जाती तो सपा−बसपा गठबंधन शायद आगे नहीं बढ़ पाता। गौरतलब हो गोरखपुर−फूलपुर उप−चुनाव से ठीक पहले यूपी की राजनीति ने उस समय नई करवट ली थी, जब मतदान से ठीक पहले चिर प्रतिद्वंद्वी सपा−बसपा ने हाथ मिला लिया था और मायावती ने अपने वोटरों से समाजवादी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी। उप−चुनाव के नतीजे सपा के पक्ष में रहे तो अब बसपा के साथ कांग्रेस के भी लोकसभा चुनाव से पूर्व एक मंच पर आने की संभावना और मजबूत हो गई है। ऐसा इसलिये भी कहा जा रहा है कि उप−चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा। चूंकि ये दोनों सीटें सीएम योगी और डिप्टी सीएम मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई थीं, इसलिए इसे न सिर्फ भाजपा बल्कि योगी−मौर्य की प्रतिष्ठा से भी जोड़ कर देखा जा रहा था। अगर सत्तारुढ़ दल अपनी दोनों सीटें जीतने में कामयाब हो जाता तो सपा−बसपा−कांग्रेस के एक मंच पर आने की संभावनाओं पर ग्रहण लगने के आसार काफी बढ़ जाते।
 
उत्तर प्रदेश लोकसभा उपचुनाव के परिणाम पर पूरे देश के तमाम राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हुई थीं। ये चुनाव बीजेपी के साथ ही यूपी में प्रमुख विपक्षी दल सपा और बसपा के लिए खासा महत्वपूर्ण था। इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि मतदान के दिन खुद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ट्वीट कर कहा था कि आज का दिन इतिहास बदलने का भी है और नया इतिहास बनाने का भी। सबको साथ लेकर निकलें और दिखा दें कि हमारी एकजुटता में कितनी ताकत है। इसके नतीजे देश−प्रदेश के भविष्य के लिए क्रांतिकारी और निर्णायक साबित होंगे।
 
उधर ये उप−चुनाव देश की राजनीति के लिए गैर कांग्रेसी गठजोड़ का लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा था। कारण ये है कि उत्तर प्रदेश की सियासत के दो प्रमुख दल सपा और बसपा में यहां 23 साल बाद नजदीकी देखने को मिली थी। बसपा ने इस उप−चुनाव में सपा को समर्थन जरूर दिया था, लेकिन इस समर्थन को वह गठबंधन की संज्ञा देने से बचती रही थी। मायावती का कहना था कि यह सिर्फ बीजेपी को हराने के​ लिए उठाया गया कदम था। उप−चुनाव में एसपी−बीएसपी की जीत के बाद माया−अखिलेश के बीच की निकटता और गहरा सकती है। इसमें कोई शक नहीं है। मगर अभी भी यह नहीं कहा जा सकता है कि सपा−बसपा के लिये सब कुछ आसान हो गया है। दोनों ही दलों के नेताओं की महत्वाकांक्षा किसी भी गठबंधन को आगे बढ़ाने और साथ चुनाव लड़ने के आड़े आ सकती है। कारण ये है कि प्रदेश में कई लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां सपा और बसपा में दशकों से सीधी लड़ाई चली आ रही है।
 
इसी प्रकार से सपा का यादव−मुस्लिम वोट बैंक मजबूत माना जाता है तो बसपा की जाटव वोट बैंक में अच्छी पकड़ है। लेकिन इसके अलावा दलित वर्ग की अन्य जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग में बीजेपी ने अच्छी खासी सेंध लगाई है। भले ही उप−चुनावों में ऐसा नहीं देखने को मिला हो, परंतु 2014 में ये साफ देखने को भी मिला था। गोरखपुर और फूलपूर में सपा को मिली जीत ने पुरानी यादें भी ताजा कर दीं हैं। 90 के दशक में मुलायम और कांशीराम की जुगलबंदी ने जो कमाल दिखाया, अब माया और अखिलेश से भी ऐसी उम्मीदें की जा रही हैं। लब्बोलुआब यह है कि इस जीत ने बीएसपी−एसपी को 'सियासी वेंटिलेटर' से तो हटा दिया है, लेकिन उसकी सांसें अभी भी आक्सीजन के सहारे चल रही हैं। उसे इस जीत से इतराने की बजाये अपने लिये जमीन मजबूत करने पर ज्यादा जोर देना चाहिए।
 
-अजय कुमार

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