श्वेतवाद को दोबारा यूरोप में स्थापित करने के लिए हुआ न्यूजीलैंड में हमला

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Mar 23 2019 2:40PM
श्वेतवाद को दोबारा यूरोप में स्थापित करने के लिए हुआ न्यूजीलैंड में हमला
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ये लोग श्वेतवाद को दोबारा से यूरोप में स्थापित करना चाहते हैं और एशियाई और अफ्रीकी लोगों के यूरोप में बसने के खिलाफ हैं। देखा जाये तो न्यूजीलैंड की घटना ''अति दक्षिणपंथी विचारधारा’ के दुनिया भर में पांव पसारने का सबसे पुख्ता सबूत है।

न्यूजीलैंड में दो मस्जिदों पर हुई गोलीबारी में 50 लोगों के मारे जाने के बाद से दुनिया भर में श्वेत श्रेष्ठता ग्रंथि और इस्लामोफोबिया शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है। न्यूजीलैंड में गोलीबारी के आरोपी ब्रिटिश मूल के ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रैंटन टैरेंट जैसी मानसिकता वाले आज बहुत से लोग हैं जोकि मानते हैं कि यूरोप में मुसलमानों के बस जाने से कई तरह की सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं। ये लोग श्वेतवाद को दोबारा से यूरोप में स्थापित करना चाहते हैं और एशियाई और अफ्रीकी लोगों के यूरोप में बसने के खिलाफ हैं। देखा जाये तो न्यूजीलैंड की घटना 'अति दक्षिणपंथी विचारधारा’ के दुनिया भर में पांव पसारने का सबसे पुख्ता सबूत है।

मुस्लिमों के साथ खड़ा हुआ पूरा न्यूजीलैंड


 
न्यूजीलैंड सहित जहाँ पूरा विश्व इस घटना के बाद से दहला हुआ है वहीं यह देखना सुखद लगा कि मुस्लिम समुदाय के साथ पूरे न्यूजीलैंड ने एकजुटता दिखाई। शुरुआत न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने की। उन्होंने गत सप्ताह हिजाब पहन कर दो मस्जिदों पर हुए आतंकवादी हमले के पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के साथ एकजुटता दिखाते हुए कहा कि यह वह न्यूजीलैंड नहीं है, जिसे लोग जानते हैं। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री के हिजाब पहनने की पहल को देश की महिलाओं ने जबरदस्त रूप से सराहा। समूचे देश की महिलाओं ने हिजाब पहनकर मुस्लिमों के प्रति एकजुटता दिखायी। महिलाओं ने कहा कि इस्लाम की विचारधारा को प्रदर्शित करने वाले प्रतीक को पहनकर हमें इसके मायने पता चले और खुद को अल्पसंख्यक वर्ग का हिस्सा महसूस किया। महिला पुलिसकर्मियों और गैर मुस्लिम महिलाओं ने भी हिजाब पहना था। इनमें से कई महिलाओं ने पहली बार हिजाब पहना था। महिलाओं ने ट्विटर, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया साइट पर अपनी तस्वीरें पोस्ट कीं। क्राइस्टचर्च में अल नूर मस्जिद के इमाम ने भी कहा है कि न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों पर हुए भयानक हमले ने देशवासियों का दिल भले ही तोड़ दिया है लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा है। हमले के पीड़ितों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए शुक्रवार को अजान का सीधा प्रसारण किया गया।


उधर, मुस्लिम देशों ने भी इस्लाम को लेकर फैलाए जा रहे डर के खिलाफ ‘‘वास्तविक’’ कदम उठाए जाने की अपील की है। ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन’ (ओआईसी) के मंत्रियों ने इस्तांबुल में एक बैठक के बाद कहा कि इस्लामोफोबिया (इस्लाम को लेकर डर) से उत्पन्न हिंसा के खिलाफ ‘‘वास्तविक, व्यापक और व्यवस्थित उपाय की आवश्यकता है ताकि इस समस्या से निपटा जा सके।’’ ओआईसी ने कहा कि मस्जिदों पर हमले और मुस्लिमों की हत्याएं इस्लाम के खिलाफ घृणा के "क्रूर, अमानवीय और भयानक परिणाम" दर्शाती है। ओआईसी ने कहा कि मुस्लिम समुदायों, अल्पसंख्यकों या प्रवासियों वाले देशों को ऐसे "बयानों और प्रथाओं से बचना चाहिये जो इस्लाम को आतंक, उग्रवाद और खतरे से जोड़ते हैं।
 
असाल्ट राइफलों और सेमी-ऑटोमेटिक हथियारों पर प्रतिबंध
 


अब चर्चा कर लेते हैं न्यूजीलैंड में हो रही कार्रवाइयों के बारे में। देश की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने बृहस्पतिवार को कहा कि क्राइस्टचर्च आतंकी हमले के मद्देनजर देश में असाल्ट राइफलों और सेमी-ऑटोमेटिक हथियारों की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह घोषणा कर रही हूं कि न्यूजीलैंड सभी सेमी ऑटोमेटिक हथियारों की बिक्री पर रोक होगी। हम सभी असॉल्ट राइफलों पर भी प्रतिबंध लगाते हैं।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि उच्च क्षमता वाली मैगजीन और राइफल से की जाने वाली गोलीबारी को तीव्र बनाने वाले सभी डिवाइस को बेचने पर भी प्रतिबंध होगा।
सोशल मीडिया पर भी उठे सवाल
 
न्यूजीलैंड की घटना ने सोशल मीडिया को लेकर भी कई तरह की चिंताएं पैदा की हैं। दरअसल इंटरनेट की दुनिया जहां राहत देती है वहीं आफत भी देती है। आज सोशल मीडिया पर ऐसे कई समूह देखे जा सकते हैं जहां आप्रवासियों, इस्लाम, नस्ल और वर्ण आदि के खिलाफ विरोधी बातें कही जाती हैं और इस बात का प्रचार प्रसार किया जाता है कि श्वेत आबादी ही श्रेष्ठ है। ब्रैंटन टैरेंट ने हमले के पहले ‘दि ग्रेट रिप्लेसमेंट’ शीर्षक से एक सनसनीखेज मैनिफेस्टो लिखा जिसमें उसने हजारों यूरोपीय नागरिकों की आतंकी हमलों में गई जान का बदला लेने के साथ श्वेत वर्चस्व कायम करने के लिए आप्रवासियों को बाहर निकालने की बात कही थी। यही नहीं उसने गोलीबारी की घटना का लाइवस्ट्रीम भी किया था। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने सोशल मीडिया के खतरे से निपटने के लिए भी वैश्विक स्तर पर कदम उठाए जाने की अपील की है। फेसबुक के मुताबिक गोलीबारी की घटना के लाइवस्ट्रीम को 200 से कम बार ही देखा गया लेकिन उसे इस नरसंहार के फुटेज के तौर पर वायरल हुए करीब 15 लाख वीडियो हटाने पड़े। प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह केवल न्यूजीलैंड का मुद्दा नहीं है, सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल हिंसा और हिंसा को भड़काने वाली चीजों के प्रसार के लिए किया जा रहा है। हम सबको एकजुट होने की जरूरत है।
 
ब्रेंटन टैरेंट का क्या होगा ?
 
हत्यारे ब्रेंटन टैरेंट ने की बात करें तो वह अल-नूर और लिनवुड मस्जिदों में 50 लोगों की हत्या करने और दसियों अन्य को घायल करने के सिलसिले में एक मामले में आरोपित है। मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि वह नॉर्वे के हत्यारे एंडर्स ब्रेविक के संपर्क में भी रह चुका है, जिसने जुलाई 2011 में अंधाधुंध गोलियां चलाते हुए 75 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। अब माना जा रहा है कि ब्रेंटन टैरेंट को दोषी करार दिए जाने पर उसे अपनी बाकी जिंदगी जेल में गुजारनी पड़ेगी और उसकी सुरक्षा के मद्देनजर उसे जेल में सबसे अलग-थलग रखा जा सकता है। न्यूजीलैंड में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है और हमलावर टैरेंट यदि जनसंहार का दोषी करार दे दिया जाता है तो उसे जेल की रिकॉर्ड सजा का सामना करना पड़ सकता है। फौजदारी मामलों के वकील साइमन कलेन ने भी बताया कि दोषी करार दिए जाने पर उसे पैरोल के बगैर उम्रकैद हो सकती है। ऐसी सजा न्यूजीलैंड में ‘‘अभूतपूर्व’’ होगी।
 
-नीरज कुमार दुबे
 

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