जम्मू-कश्मीर में ''राजनीतिक'' राज्यपाल के पीछे कहीं राजनीति तो नहीं?

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मोदी सरकार ने तीन राज्यों में नये राज्यपालों की नियुक्ति करने के साथ ही कुछ राज्यों के राज्यपालों का स्थानांतरण भी किया है। अगर हम इन नियुक्तियों पर गौर करें तो पाएंगे कि भाजपा का पूरी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के जातीय समीकरण को साधने पर ध्यान रहा है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन राज्यों में नये राज्यपालों की नियुक्ति करने के साथ ही कुछ राज्यों के राज्यपालों का स्थानांतरण भी किया है। अगर हम इन नियुक्तियों पर गौर करें तो पाएंगे कि भाजपा का पूरी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के जातीय समीकरण को साधने पर ध्यान रहा है। साथ ही जम्मू-कश्मीर को भी तवज्जो दी गयी है। सबसे पहले बात करें बिहार के नये राज्यपाल की तो लालजी टंडन को यह जिम्मेदारी देना चौंकाता इसलिए भी नहीं है क्योंकि यह पद देने का उनसे वादा 2014 में ही तब किया गया था जब उनसे उनकी लखनऊ संसदीय सीट राजनाथ सिंह के लिए मांगी गयी थी। लालजी टंडन साढ़े चार साल से इस इंतजार में थे कि उन्हें कब राज्यपाल बनाया जायेगा। हालांकि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने पर उनके बेटे गोपाल टंडन को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। पर अब 83 वर्षीय वरिष्ठ नेता टंडन को इसलिए भी राजभवन भेजा गया है क्योंकि 2018 के लोकसभा चुनावों में जब राजनाथ सिंह लखनऊ में दोबारा वोट मांगने जाएंगे तो उन्हें उन सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा जिनमें पूछा जा सकता था कि टंडन से किया गया वादा क्यों नहीं निभाया।

इसके अलावा लालजी टंडन का लखनऊ में अच्छा खासा प्रभाव है क्योंकि वह लंबे अरसे तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के यहां सांसद प्रतिनिधि के नाते कार्य करते रहे। अटलजी जब प्रधानमंत्री थे तब लालजी टंडन भाजपा के समर्थन वाली मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद वाजपेयी के सांसद प्रतिनिधि के तौर पर कार्य करते रहे थे। इसके अलावा लालजी टंडन उन लोगों में भी शुमार हैं जिन्होंने बसपा के साथ भाजपा का गठबंधन करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। बसपा प्रमुख मायावती ने किसी राजनेता को आज तक राखी बांधी है या भाई माना है तो लालजी टंडन ही हैं। इसके अलावा लालजी टंडन को राज्यपाल बनाकर वैश्य समुदाय को खुश करने का प्रयास भी किया गया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाले बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर उनका कद और बढ़ा दिया गया है। सत्यपाल मलिक को आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त कर उनके कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इस नयी नियुक्ति से दस वर्षों तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे एनएन वोहरा का कार्यकाल खत्म हो गया है। इसके साथ ही पांच दशक बाद इस महत्वपूर्ण पद पर किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेता को राज्यपाल बनाया गया है। सत्यपाल मलिक की नियुक्ति की घोषणा मोदी सरकार की कश्मीर रणनीति में बदलाव का भी संकेत लेकर आयी है। केंद्र ने 1967 से जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद के लिए सेवानिवृत्त नौकरशाहों, राजनयिकों, पुलिस अधिकारियों और सैन्य जनरलों को चुना। सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर में कर्ण सिंह के बाद पहले ऐसे राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेता हैं जिन्हें राज्यपाल नियुक्त किया गया है। कर्ण सिंह 1965 से 1967 तक प्रदेश के राज्यपाल थे। खास बात यह भी है कि सत्यपाल मलिक की नियुक्ति ऐसे समय हुयी है जब राज्य में राजनीतिक स्थितियां भी बदल रही हैं। चर्चा यह भी चल रही है कि महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी के कुछ असंतुष्ट विधायक भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। 

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के आगरा से भाजपा नेता बेबी रानी मौर्य को उत्तराखंड की राज्यपाल नियुक्त किया गया है। उत्तराखंड में दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त और राज्यपाल डॉ. के.के. पॉल का कार्यकाल पूरा हो गया है। बेबी रानी मौर्य वर्ष 1995 से 2000 के बीच आगरा की मेयर रह चुकी हैं। उन्होंने 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एत्मादपुर सीट से चुनाव लड़ा था लेकिन हार गईं थी। बेबी रानी मौर्य गैर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं और परिवार की इजाजत लेकर वह राजनीति में आईं और सर्वप्रथम भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित मोर्चा के साथ जुड़ीं। वह मोर्चा की उस समय राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष थीं जब वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। वह पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के अलावा कई अन्य पदों पर रहने के अलावा प्रदेश के सामाजिक कल्याण बोर्ड और राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य रह चुकी हैं। मौर्य की राज्यपाल पद पर नियुक्ति कर भाजपा ने पिछड़ा समाज को लुभाने का कदम उठाया है।

इसके अलावा बिहार के नालंदा की राजगीर विधानसभा सीट से आठ बार भाजपा के विधायक रहे सत्यदेव नारायण आर्य को हरियाणा का राज्यपाल बनाकर पार्टी के प्रति निष्ठा रखने का तोहफा दिया गया है। सत्यदेव नारायण आर्य बिहार में दो बार मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। पहली बार वह रामसुंदर दास मंत्रिमंडल में और फिर दूसरी बार 2012 में नीतीश मंत्रिमंडल में मंत्री रहे। हालांकि आर्य पिछला विधानसभा चुनाव हार गये थे लेकिन पार्टी के भीतर उनकी छवि सरल और सहृदय व्यक्तित्व वाले राजनेता की रही है।

इसके अलावा हरियाणा के निवर्तमान राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी को त्रिपुरा भेज दिया गया है। सोलंकी संघ के प्रचारक रहे हैं और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें वहां भेजा जाना अहम निर्णय माना जा रहा है। त्रिपुरा के अभी तक राज्यपाल रहे तथागत राय को मेघालय भेज दिया गया है। मेघालय राजनीतिक रूप से काफी अहम राज्य इसलिए है क्योंकि वहां विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद से राज्यपाल की भूमिका काफी अहम हो गयी है। उत्तर प्रदेश से ही संबंध रखने वाले गंगाप्रसाद का तबादला सिक्किम कर दिया गया है, संभव है इसके पीछे भी भाजपा का कोई राजनीतिक कदम हो। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्यपाल का पद संवैधानिक होता है लेकिन सभी पार्टियां इसके जरिये राजनीति करती रही हैं। भाजपा भी ऐसा कर रही है तो इसमें कोई नयी बात नहीं है। फिलहाल तो कई और नाम राज्यपाल बनाये जाने की प्रतीक्षा सूची में हैं देखना होगा उनका नंबर कब आता है। इन नामों में दिल्ली से विजय कुमार मल्होत्रा और उत्तर प्रदेश से कलराज मिश्रा का नाम प्रमुख है।

-नीरज कुमार दुबे

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