बैंकों को मजबूत करने के लिए विलय का ही रास्ता क्यों अपना रही है सरकार?

By दीपक गिरकर | Publish Date: Jul 13 2019 1:00PM
बैंकों को मजबूत करने के लिए विलय का ही रास्ता क्यों अपना रही है सरकार?
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वित्त मंत्रालय के अनुसार बैंकों के विलय से बैंकों की दक्षता और संचालन में सुधार होगा। एसोचैम, फिक्की, सीआईआई सहित कई उद्योग संगठनों ने सरकारी बैंकों के निजीकरण का सुझाव दिया है। लेकिन क्या समस्या का यह सही हल है?

बैंकों का बढ़ता एनपीए गंभीर चिंता का विषय है जो कि बैंकों को विलय करने के लिए प्रेरित कर रहा है। एनपीए के नुकसान की भरपाई के लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी डाल कर थक चुकी है। अब वह कमजोर बैंक को दूसरी मजबूत बैंकों में मर्जर के शॉर्टकट का मार्ग अपना रही है। यह बात सही है कि देश में बैंकों की संख्या कम होनी चाहिए। देश में सिर्फ़ 3 से 4 सरकारी बैंक, 3 से 4 प्राइवेट सेक्टर बैंक और एक या दो विदेशी बैंक होने चाहिए। अधिक बैंक होने से बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा का फ़ायदा चूककर्ता आसानी से उठा लेते है। वे एक बैंक के अपने अनियमित खातों को नियमित करने के लिए दूसरे बैंक से अपनी नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं और फिर दूसरे बैंक के ऋण खातों को ठीक करने के लिए तीसरे बैंक से एक और नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं। इस प्रकार ऐसे चूककर्ता ऋणी कई सालों तक इस प्रकार की फर्जी कंपनियां खड़ी करके कई बैंकों को चूना लगाते रहते हैं और जब किसी कारण से इनकी और ऋण लेने की चेन टूट जाती है तो इनका भांडा फूट जाता है।


इतने अधिक पब्लिक सेक्टर बैंकों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी करने के स्थान पर कुछ ही बैंकों की स्थापना की जानी चाहिए थी जिससे उन्हीं कम बैंकों का प्रबंधन आसानी से किया जा सकता था एवं उन पर निगरानी और नियंत्रण भी आसानी से रखी जा सकती थी। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा होने से बैंकों द्वारा ग्राहक की आर्थिक हैसियत और क्रेडिट रेटिंग का उचित विश्लेषण किए बिना ही अनसिक्योर्ड लोन बांट दिए जाते हैं। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण बैंक ऋण देने में सही व्यक्ति और सही परियोजना का चयन नहीं कर पाता है और जल्दबाजी में ऐसे ऋण स्वीकृत व वितरित कर देते हैं जो कि एक या दो वर्षों में ही एनपीए में परिवर्तित हो जाते हैं। सरकार के अनुसार बैंकों को घाटे से उबारने एवं फंसे कर्ज़ की समस्या को दूर करने के ठोस उपायों में सरकार चाहती है कि बैंकों के विलय की प्रक्रिया को तेज गति से आगे बढ़ाया जाए।
 
सरकार के मतानुसार बैंकों के अच्छे नियमन और नियंत्रण के लिए बैंकों का विलय ज़रूरी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार बैंकों के विलय से बैंकों की दक्षता और संचालन में सुधार होगा। एसोचैम, फिक्की, सीआईआई सहित कई उद्योग संगठनों ने सरकारी बैंकों के निजीकरण का सुझाव दिया है। हमारे देश में बैंकों के विलय का पुराना रिकॉर्ड ठीक नहीं रहा है। न्यू बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक का विलय, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का विलय, भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का विलय हमारे सामने उदाहरण है। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण किया गया है। सरकार ने 1 अप्रैल, 2019 को विजया बैंक और देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय कर दिया है। इन बैंकों में फंसे हुए कर्ज़ की समस्या अन्य बैंकों के समान और अधिक बढ़ती गई। राष्ट्रीयकृत बैंकों के विलय से कॉर्पोरेट घरानों और पूंजीपतियों की लूट का रास्ता और आसान होता जा रहा हैं। वित्तीय संस्थाओं, बैंकों का विलय तो बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के अनुसार ही होना चाहिए न की सरकार के हस्तक्षेप से। 
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों के गठजोड़ और विलीनीकरण करने से पहले मर्जर होने वाली बैंकों की बैलेंसशीट को स्वच्छ (एनपीए मुक्त) करने की सलाह दी थी। अब सरकार अन्य सार्वजनिक बैंकों के विलय पर विचार कर रही है। बैंकों का विलय एक पेचीदा मुद्दा है। बैंकों का विलय करने से फंसे कर्ज की वसूली नहीं हो पायेगी और बैंक प्रबंधन का पूरा ध्यान विलय के मुद्दे पर चला जाएगा। सरकार को इसमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विलय की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इस प्रक्रिया में सभी हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए। यदि बड़ा बैंक, छोटे बैंकों का अधिग्रहण करता है तो बड़े बैंक को छोटे बैंकों पर हावी नहीं होना चाहिए।
 
सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण करना भी समस्या का समाधान नहीं है यह तो वैसा ही हुआ कि हम हाथ में लगी चोट का बेहतर इलाज करने के बजाय हाथ को ही कटवा डालने का विकल्प चुनना चाहते हैं। क्योंकि किसी भी सूरत में काम करने वाला स्टाफ तो वही रहेगा जो आज है। विलय से वास्तविक समस्या छिप जायेगी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी निजी क्षेत्र के बैंक दीवालिया हुए थे और उनका सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विलय किया गया था। सार्वजनिक बैंकों की समस्या केवल प्रभावी व कठोर विनियमन की कमी की है। इन पर वित्तीय समावेशन की ज़िम्मेदारी भी है। सरकार को जब भी कोई सरकारी योजना लागू करनी होती है जैसे जनधन खाते, किसानों के क्रेडिट कार्ड, कमजोर वर्ग को सरकारी योजनाओं के ऋण, शिक्षा ऋण, मुद्रा लोन तो उसे ये सरकारी बैंक ही दिखाई देते हैं। आज बैंकिंग उद्योग को निजीकरण और विलय की नहीं बल्कि सार्वजनिक बैंकों के कामकाज की पारदर्शिता, प्रभावी विनिमयन और सुपरविजन की ज़रूरत है।  


 
-दीपक गिरकर
 

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