साक्षात्कारः अख्तरुल वासे ने कहा- कोरोना वैक्सीन के प्रति भ्रम फैलाना गलत

Akhtarul Wasey
डॉ. रमेश ठाकुर । Mar 22, 2021 12:10PM
बेफकूफ किस्म के लोग करते हैं ऐसा। इंसान की जान बचाना सबसे बड़ा धर्म है। वैसे, आपकी जानकारी में होगा भी कि इस्लाम में इंसानी जान को काफी महत्व दिया गया है। कुरान व हदीस में आया कि तीन दिन बाद भूख से कोई बेताब हो जाए तो मुर्दा (मृत) या हराम चीज भी खाना जायज है।

मुस्लिम जगत में कोरोना वैक्सीनेशन को लेकर शुरू से भ्रम फैलाया गया। लेकिन जब से बुद्धिजीवी पद्मश्री अख्तरुल वासे जैसे लोग फैले भ्रम को दूर करने के लिए आगे आए हैं, तभी से अल्पसंख्यकों में भी माहौल सुगम हुआ है। वैक्सीनेशन पर मंडराए बादल अब छंट गए हैं। इसी मसले पर आधारित कई मसलों पर मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी जोधपुर के कुलपति अख्तरुल वासे से डॉ. रमेश ठाकुर ने विस्तृत बातचीत की।

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प्रश्न- कोविड वैक्सीन को लेकर फैलाई गई हराम-हलाल वाली बात से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं? 

उत्तर- रत्ती भर भी नहीं, इस भ्रम में सच्चाई नहीं, असल में यह कोई मुद्दा है ही नहीं। कुछ लोगों के जरिए खासकर सोशल मीडिया पर मुसलमानों की घेराबंदी करने के लिए इस तरह की अफवाह फैलाई गई। बगैर किसी तथ्य के यह बात उछाली गई कि कोरोना के टीकों को बनाने के लिए सूअर की चर्बी अथवा जिलेटिन का इस्तेमाल किया जा रहा है। चूंकि इस्लाम धर्म में सूअर को हराम बताया है, इसलिए कहा गया कि मुसलमानों के लिए कोरोना टीकाकरण जायज नहीं है। हालांकि कोरोना वैक्सीन बनाने वाली किसी संस्था या कंपनी के जरिए इसकी पुष्टि नहीं की गई। इस्लाम में तो वैसे ही हिकमत (बेहतरीन युक्ति) पर बल दिया गया है।

  

प्रश्न- दवाई को धर्म से जोड़ना कितना जायज है?

उत्तर- बेफकूफ किस्म के लोग करते हैं ऐसा। इंसान की जान बचाना सबसे बड़ा धर्म है। वैसे, आपकी जानकारी में होगा भी कि इस्लाम में इंसानी जान को काफी महत्व दिया गया है। कुरान व हदीस में आया कि तीन दिन बाद भूख से कोई बेताब हो जाए तो मुर्दा (मृत) या हराम चीज भी खाना जायज है। इसके साथ ही अगर किसी हराम चीज का इस्तेमाल किसी वस्तु में किया गया और इस प्रक्रिया में उसका मूल स्वरूप बदल जाता है तो भी इस्लाम में दवा इत्यादि जैसी विशेष परिस्थितियों में इसके सेवन की अनुमति है। अर्थात् शरीयत के अनुसार जान बचाने के लिए हराम चीजें खाने की भी अनुमति है।

  

प्रश्न- पोलियो की खुराक के समय भी अल्पसंख्यकों में भ्रम पैदा किया गया था?

उत्तर- जी बिल्कुल! पोलियो वैक्सीन की तरह ही कोरोना टीकों के जरिए भी नपुंसक बनाने की साजिश रचने की अफवाह फैलाई गई। देश व दुनिया के मुसलमानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान, संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान तक कोरोना का टीका लगवा चुके हैं। इन नेताओं के जरिए आगे बढ़कर टीका लगवाने का उद्देश्य भी लोगों का भ्रम दूर करना और उन्हें टीकाकरण के लिए प्रेरित करना था। इसके बावजूद दुनिया के मुसलमानों में वैक्सीन को लेकर इस तरह का भ्रम फैलाने की कोशिश की गई जोकि पूरी तरह से बेबुनियाद है।

  

प्रश्न- सामूहिक कोशिशों के चलते ही आज भारत पोलियो से तकरीबन आजाद है?

उत्तर- बिल्कुल इसमें कोई दो राय नहीं? पोलियो उन्मूलन के लिए चलाए गए पल्स पोलियो अभियान के दौरान पिलाई जाने वाली वैक्सीन को लेकर भी इसी तरह की मिथ्या बातें फैलाई गई थीं जिसके बाद भारत के उलेमा और मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने सामने आकर मुसलमानों को समझाया। अगर सरकार देश को पोलियो मुक्त बनाने में सफल हुई तो उसमें इन उलेमाओं और बुद्धिजीवियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके बरक्स हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण अभियान के प्रति पाई जाने वाली भ्रांतियों के चलते अब भी इस काम में लगे कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो रहे हैं। धार्मिक अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़े पाकिस्तानी समाज में आज भी लाखों बच्चे पोलियो ग्रस्त हैं।

प्रश्न- आप जैसे लोगों के आगे आने से भ्रम के मंडराए बादल छट पाए?

उत्तर- दारुल उलूम देवबंद, जामिया सलफिया, जामिया अशरफिया समेत देश के सभी प्रतिष्ठित मदरसों और धार्मिक संस्थानों ने तुरंत इसको लेकर कुरान व हदीस की रौशनी में स्पष्टीकरण दिया और कोरोना टीकाकरण को जायज करार दिया। जमात-ए-इस्लामी हिंद और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जरिए तो बाकायदा कोरोना टीकाकरण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने और सरकार की मदद करने तक का आह्वान किया गया। इस तरह देखा जाए तो मुसलमानों में इसको लेकर कोई भ्रम नहीं है। फिर भी इसको उछाला जा रहा है। असल में मीडिया का एक तबका है जो इस तरह के मामलों की टोह में रहता है। उन्हें तो बस इस तरह का कोई मुद्दा चाहिए।

प्रश्न- कोरोना जब हिंदुस्तान में पैर पसार रहा था, तब तबलीगी जमात को इसका जिम्मेदार बताया गया था?

उत्तर- वह मीडिया का फैलाया प्रोगेंडा मात्र था। मुझे लगता है तब खबरिया चैनलों ने काफी भड़काऊ रिपोर्टिंग की थी। साथ ही सोशल मीडिया ने भी आग में घी डालने का काम किया था। उस समय दिल्ली समेत कई जगहों एक विशेष समुदाय पर हमले हुए। लोगों को फल-सब्जी तक भेजने के लिए मना कर दिया गया। इससे उन लोगों की रोजी-रोटी तक पर भी संकट आ गया था। गत दिनों इसी तरह कोरोना टीकाकरण अभियान को लेकर मुसलमानों में भ्रम की आधारहीन बातें फैलाई गईं।

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प्रश्न- कौन-सी ताकतें थी जो कोरोना टीकाकरण को लेकर भड़का रही थीं?

उत्तर- सोशल मीडिया ने गलत रोल प्ले किया है। सरकार बंदिश लगा रही है बहुत अच्छी बात है। वैसे, पोलियो अभियान के दौरान मिली सीख से ऐसे लोगों को सबक लेना चाहिए। यह मामला इंसानियत को कोरोना जैसी भयानक महामारी से बचाने का है। इसलिए न तो किसी को अनर्गल अफवाह फैलाने की अनुमति दी जानी चाहिए और न ही किसी को उसमें फंसना चाहिए। कोरोना से बचाव ही वक्त का तकाजा है और सबसे बड़ी मानव सेवा है।

  

-बातचीत में कुलपति ने जैसा डॉ. रमेश ठाकुर से कहा।

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