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क्रिकेट के इस देश में अब बास्केटबॉल भी हो रहा है लोकप्रिय

By दीपक कुमार | Publish Date: Jun 1 2018 2:09PM

क्रिकेट के इस देश में अब बास्केटबॉल भी हो रहा है लोकप्रिय
Image Source: Google

हम सभी जानते हैं भारत एक ऐसा देश है जहां क्रिकेट की दिवानगी लोगों के सर चढ़ कर बोलती है। क्रिकेट का खेल भारत में एक मंदिर की तरह है और इसके खिलाड़ी लोगों के लिए भगवान। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कई खेलों ने भारत की पहचान पूरे विश्व में काबिज की है। आप अगर इन खेलों को जानने की कोशिश करें तो इसमें बैडमिंटन, निशानेबाजी और एथलेटिक्स जैसे खेल शामिल हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में एक ऐसा खेल भी है जिसका खुमार भारतीयों के दिलों पर जरूर चढ़ा है हालांकि इस खेल में कामयाबी की बात की जाए तो यह ओलंपिक में पदक या फिर विश्व चैंपियन जैसा खिताब तो नहीं हासिल कर सका है। लेकिन करीब 10 फुट ऊंचे घेरे में गेंद डालकर गोल करने वाले इस खेल ने भारत में अपने अस्तित्व को एक शानदार भविष्य में बदलने का दमखम जरूर दिखा दिया है। इस खेल की शुरुआत कागजों पर 1950 में हुई। इसी साल भारतीय बास्केटबॅाल संघ की स्थापना हुई जो नियमित रूप से विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन कराता आ रहा है। और 1951 में इंडिया में एशियम गेम्स का आयोजन हुआ। जहां भारत के पहले कप्तान रनबीर सिंह कि अगुवाई में इस टीम ने हिस्सा लिया। ये टीम भले ही इस साल मेडल नहीं जीत पायी। लेकिन बिना सुविधा और इंडोर स्टेडियम के मौजूद रहते इस टीम ने एशिया में चौथा स्थान प्राप्त किया। आप ही बताइए ये किसी लिहाज से किसी उपलब्धि से कम है? 

बुनियादी जरूरतों ने पीछे छोड़ा
 
1950 से 1990 के दौरान भारत के पास ऐसी टीम थी जो एशिया के अच्छे-अच्छे देश को हराने का दम-खम रखती थी। आज ईरान एशियाड में नंबर-1 पर काबिज है। कभी इंडिया के उससे टक्कर के मुकाबले होते थे। लेकिन उन देशों कि तरक्की ने भारत को काफी पीछे छोड़ दिया। और उसकी वजह थी बुनियादी जरूरतें। हमारे खिलाड़ियों के पास इतने साधन ही नहीं थे। जिससे वो अपना घर चला पाएं। हमारे खिलाड़ी खाली सरकारी नौकरी के सहारे अपना गुजर-बसर करते थे। हालात ऐसे थे कि खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दौरे पर अपना खर्चा खुद उठाते थे। 2015 में हमारे देश से पहले एनबीए खिलाड़ी निकले हैं। दरअसल ये काफी पहले होने वाला था। 1980 की बात है जब एशिया के सबसे बेस्ट शूटिंग गार्ड को विश्व बास्केटबॅाल की सबसे अमीर लीग यानी एनबीए में खेलने का मौका मिला था। लेकिन पैसों की तंगी के वजह से वो अमेरिका ट्राइआउट तक के लिए नहीं जा पाए थे। वहीं अन्य देशों की टीमों ने अपने बेहतर खेल, सरकार और प्राइवेट घरानों की मदद से हमेशा पहले इस लीग में हिस्सा लिया। आपकी जानकारी के लिए बता दें की ये ऐसी प्रतियोगिता है जहां खेल के साथ काफी पैसा शुमार है। लेकिन हमारे खिलाड़ी इन सब सुविधाओं से वंचित रह गये।
 
भारत को मिला एनबीए के साथ
 
दरअसल भारत में एनबीए का प्रवेश बास्केटबॅाल विदआउट बॉडर्स से 2008 में हुआ। ये नेशनल बास्केटबॅाल आफ अमेरिका की ऐसी पहल है जिससे कई देश के खिलाड़ी एक मंच पर आकर दिग्गज खिलाड़ियों से इस खेल के गुण सीखते हैं। दिल्ली में आयोजित इस शिविर ने एनबीए खिलाड़ीयों को इतना प्रेरित किया कि इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए एमओयू पर दस्तखत तक करने को राजी हो गये। इस दस्तावेज में लिखा गया था कि एनबीए भारत को विदेशी कोच के साथ प्रत्येक वर्ष इस लीग के फ्रेंचाइजी से एक खिलाड़ी ऐसा भेजेगा जो इस देश में खेल के स्तर को बढ़ाने में काफी मदद करेगा। और ऐसा हुआ। अब तक भारत में विभिन्न फ्रेंचाइजी के 20 से ज्यादा खिलाड़ी भारत का दौरा कर चुके हैं। जिसमें पाउ गसोल से लेकर डवाइट हावर्ड तक शामिल हैं। और सबका ऐसा कहना है कि इंडिया में ये खेल आने वाले साल में काफी ऊपर जाने वाला है। एनबीए रिलायंस-एसीजी जैसे कई संस्थानों के साथ मिलकर साल भर कई कोचिंग कैंपों का आयोजन करता है। यहीं नहीं बल्कि ग्रेटर नोएडा अपनी अकादमी चला रहा है। जहां कई खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के साथ उनके पढ़ाई का खर्चा उठा रहा है। पूर्व एनबीए कमिश्नर डेविड स्टर्न ने यहां तक कह दिया है कि भारत में बास्केटबॅाल का विकास चीन से भी बेहतर है।
              
2010 में इंडियन बास्केटबॅाल को मिला रिलाइंस का साथ
 
2010 में अमेरिका कि आईमजी और रिलायंस ने इस देश में खेल को बढ़ावा देने के लिए 30 साल में 3000 करोड़ खर्च करने का करार किया है। जहां बास्केटबॅाल के स्टेडियम से लेकर खिलाड़ियों के सालाना खर्च तक वो उठाएगा। रिलायंस ने खिलाड़ियों को तीन कैटगरी में बांटा हैं जहां ए ग्रेड खिलाड़ी को 30, बी ग्रेड खिलाड़ी को 20 और सी ग्रेड खिलाड़ियों को 10 हजार रूपये दिए जाएंगे। इसी साल आईमजी रिलायंस ने स्कॅालरशिप का भी आयोजन किया था। जहां भारत के 16 साल के 8 खिलाड़ियों को इस कार्यक्रम के तहत अमेरिका भेजा गया जिसमें सतनाम सिंह जैसे खिलाड़ी भी शामिल थे।
          
एनबीए में भारतीय खिलाड़ियों ने मनवाया अपना लोहा
 
भारतीय बास्केटबॅाल में कई सालों तक ऐसे खिलाड़ी कि तलाश हो रही थी जो आईपीएल जैसी इस लीग में अपना डंका बजवाए और एनबीए के 8 साल की मेहनत रंग लायी और 2015 में पंजाब के सतनाम सिंह को डैलेस मैव्रीक्स ने अपनी टीम में शामिल किया। यह खबर क्रिकेट के इस देश में बास्केटबॅाल को अखबारों की फ्रंट पेज की स्टोरी से लेकर टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज बन गई। जाहिर है इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब भारत में इस खेल को तवज्जो दी गयी। हालांकि सिंह कुछ खास इस लीग में कर नहीं पाए लेकिन उन्होंने तमाम खिलाड़ियों के लिए किस्मत के दरवाजे खोल दिए। इसके बाद पलप्रीत सिंह को ट्राइआउट के लिए बुलाया गया। लेकिन उनका चयन नहीं हुआ। लेकिन सिंह के बाद सुल्तान ऑफ स्वात अमजोत सिंह गिल इस लीग में अपना जलवा बिखेर रहे हैं। हालांकि वो अभी जी लीग में खेल में सक्रोमेटो किंग्स के लिए खेल रहे हैं। लेकिन जल्द ही वो इस लीग में अपना जलवा बिखरते जरूर दिखेंगे।
                 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम का प्रदर्शन
 
1951 में अच्छी शुरुआत के बाद भारत इस खेल में कुछ ज्यादा प्रदर्शन नहीं कर पाया और इस टीम का प्रदर्शन लगातार गिरता रहा। उसकी वजह ये थी कि इस देश की अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में कम भागीदारी। जहां अन्य देश हर साल कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिता खेलते थे। वहां भारत साल में एक या दो वर्ष में एक प्रतियोगिता में हिस्सा लेता था। लेकिन इसके बावजूद भारत में खुशी राम जैसे ऐसे खिलाड़ी निकले जिन्हें एशिया की शूटिंग मशीन कहा जाता था। 1970 के दौरान भारत की बास्केटबॅाल टीम ने फिलीपींस के मनीला में निमंत्रण प्रतियोगिता में भाग लिया था। जहां उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी, शूटर और प्रतियोगिता के सबसे बेहतर सेंटर पोजिशन के खिलाड़ी के साथ नवाजा गया। इसी तरह से इनके भाई और बेटे राम कुमार ने भी देश का नाम ऊपर किया। भारत से भले ही कई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाए लेकिन टीम कभी उस बुलंदियों पर नहीं पहुंच पायी जिसकी उम्मीद थी। हर दो साल में होने वाली एशियन बास्केटबॅाल प्रतियोगिता में भारत की सर्वश्रेष्ठ रैंकिग 6 है, जो आज के मौजूदा समय में सबसे नीचे है। 2003 में जब भारत ने 8वां स्थान हासिल किया तो ऐसी उम्मीद जगी ये खेल फिर से वापसी कर रहा है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। लगातार 11 साल कभी 10, 11 या 12 स्थान पर ही भारत काबिज रहा। 2015 में जब भारतीय बास्केटबॅाल संघ के दो टुकड़े हो गये थे तब खिलाड़ियों ने अपने हौसलों की उड़ान से टीम को इस प्रतियोगिता में 8वां स्थान दिलाया। अमजोत सिंह गिल, विशेष भृगवंशी और यादविंदर जैसे अनुभवी खिलाड़ियों से सजी इस टीम ने विश्व को ये दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं। वहीं फिबा ने गिल के अविश्वसनीय खेल को देखते हुए बास्केटबॅाल के सुल्तान का खिताब दिया।                  
 
बास्केटबॉल का भारत में भविष्य
 
सही मायने में देखा जाए तो इस देश में ये खेल काफी आगे जा रहा है और एनबीए जैसी संस्था ने प्रोफेशनल बास्केटबॅाल लीग की भी शुरूआत कर दी है जो आने वाले दिनों में इंडिया में बास्केटबॅाल का पूरी तरह से मतलब बदल देगा। जाहिर है देश में खेल की परिभाषा दिन प्रतिदिन बदल रही है और सभी खेलों के साथ बास्केटबॉल से भी उम्मीदें काफी बढ़ चली हैं। भारत विश्व जगत में खेलों के नजरिए से विश्व शक्ति बनने की कतार में है।
 
-दीपक कुमार 

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