कंपनियां छंटनी किये जा रही हैं और सरकार मौन है

विजय शर्मा । May 29, 2017 12:43PM
सरकार की ढुलमुल नीतियों के चलते कम्पनियां मनमाने तरीके से छंटनी कर रही हैं और हायर एण्ड फॉयर जैसी नीतियां अपना कर कर्मचारी वर्ग का शोषण कर रही हैं लेकिन सरकार मौन है।

भाजपा ने जब देश की सत्ता संभाली थी उस समय 2013-14 में देश में बेरोजगारी की दर 4.9 फीसदी थी, जो अगले एक साल में 2015-16 में थोड़ा-सा बढ़कर 5.0 फीसदी हो गई और अब लगातार बढ़ रही है। भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव-2014 के अपने घोषणा-पत्र में कहा था कि 'कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार बीते 10 वर्षों के दौरान कोई रोजगार पैदा नहीं कर सकी, जिसके कारण बेरोजगारी और गरीबी बढ़ी है।

मोदी जी प्रधानमंत्री बनने से पूर्व अपनी सभाओं में कहते थे, 'अगर भाजपा सत्ता में आती है तो हम दो करोड़ रोजगारों का सृजन करेंगे, लेकिन उनके इस वादे का क्या हुआ? कहीं यह भी 15 लाख वाले जुमले की तरह ही न निकले और नौजवान हाथ मलते रह जाएं। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर तैयार आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) में कहा गया है कि रोजगार वृद्धि दर घटी है। श्रम मंत्रालय द्वारा पांचवें वार्षिक रोजगार-बेरोजगार सर्वेक्षण (2015-16) की रपट में कहा गया है कि बेरोजगारी दर पांच फीसदी रही। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सर्वेक्षण से पूर्व के 365 दिनों में 183 या उससे अधिक दिन काम करने वाले लोगों को बेरोजगार नहीं माना जाता है और इस बार के सर्वे में दिहाड़ी मजदूरों को भी शामिल किया गया है उसके बावजूद रोजगार की दर घटना चिंता का सबब है।

आर्थिक सर्वेक्षण में रोजगार की प्रकृति में भी अहम बदलाव को रेखांकित किया गया है और कहा गया कि स्थानीय नौकरियों की अपेक्षा कुल रोजगार में अस्थायी एवं संविदा पर नौकरियों की हिस्सेदारी बढ़ी है। इसका सीधा सा अर्थ है कि ठेकेदारी प्रथा बढ़ने से कर्मचारियों का शोषण बढ़ा है। श्रम मंत्रालय के त्रैमासिक रोजगार सर्वेक्षण में शामिल मुख्य आठ सेक्टरों से हासिल आंकड़ों और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के अंतर्गत अक्टूबर, 2016 तक प्राप्त आंकड़ों को मिलाकर भाजपा के तीन वर्षों के कार्यकाल के दौरान देश में कुल 15.1 लाख रोजगार सृजित हुए। यह संख्या इससे पूर्व के तीन वर्षों के दौरान सृजित रोजगारों की संख्या से 39 फीसदी कम है। सरकार बनने से पूर्व भाजपा ने हर वर्ष दो करोड़ रोजगार मुहैया कराने की वादा किया था। अगर लोगों को याद हो तो, कुछ ऐसा ही वादा भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार बनने से पूर्व किया था और तब भी 6 वर्षों तक भाजपा की सरकार रही थी लेकिन बेरोजगारी लगातार बढ़ती ही गई थी और न ही किसानों की आत्महत्याएं रूकी थीं। अब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने हुए तीन साल हो गये हैं लेकिन बेरोजगारी की समस्या लगातार विकराल होती जा रही है लेकिन सरकार मौन है। बेरोजगारी दिनों-दिन बढ़ रही है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत और गुड गवर्नेंस के नारे तो नजर आते हैं लेकिन रोजगार की बात सिरे से गायब है।

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर विभिन्न न्यूज चैनल और अखबार रोजाना नए-नए सवालों से लैस होकर पाठकों की राय पूछ रहे हैं और हर कोई मोदी सरकार की लोकप्रियता को आंक रहा है। देशी-विदेशी मीडिया की दिलचस्पी इस बात में है कि आखिर तीन साल में मोदी सरकार ने ऐसा क्या किया है कि उन्हें अब बाहुबली कहा जाने लगा है। फेसबुक और ट्विटर पर इन दिनों कोई मोदी सरकार की वीरगाथा लिख रहा है ते कोई तंज कस रहा है।

युवाओं को नौकरियां उपलब्ध कराने में मोदी सरकार नाकाम रही है। रोजगार तो नहीं बढ़े, इसके विपरीत छंटनी में वृद्धि हुई है और श्रम कानूनों को कड़ाई से पालन न होने के कारण लाखों लोग  बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। सरकारी मंजूरी के बिना मनमाने ढंग से छंटनी के चलते श्रम अदालतें अत्यधिक दबाव में काम कर रही हैं। ऐसे में मजदूर वर्ग के फैसले सालों तक लंबित रहने से शोषण बढ़ा है जिसकी तरफ से सरकार लापरवाह दिखाई देती है जबकि उनका अपना संगठन भारतीय मजदूर संघ भी इससे नाराजगी जाहिर कर चुका है। दूसरे मजदूर संगठन इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस, एटक एवं अन्य वामपंथी संगठन हर दिन कहीं न कहीं धरने-प्रदर्शन करते ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण कम्पनियों द्वारा की जा रही छंटनी है, जो दिनों-दिन बढ़ रही है और कर्मचारी वर्ग का नाराजगी का सबसे बड़ा कारण यह है कि कम्पनियां नियम-कायदों और कानूनों को धता बताते हुए छंटनी कर रही हैं। कम्पनियों को बंद करने अथवा छंटनी करने के लिए कानून के अनुसार सरकार की मंजूरी जरूरी है लेकिन सरकार की ढुलमुल नीतियों के चलते कम्पनियां मनमाने तरीके से छंटनी कर रही हैं और "हायर एण्ड फॉयर" जैसी नीतियां अपना कर कर्मचारी वर्ग का शोषण कर रही हैं लेकिन सरकार मौन है।

भारतीय जनता पार्टी ने हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा किया था लेकिन सालाना एक लाख 35 हज़ार नौकरी तक नहीं पैदा कर पा रही है। भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं। टूटे और अधूरे वादों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, ख़ास तौर पर रोज़गार और विकास के मामले में। सरकारी आँकड़े ही चुगली कर रहे हैं कि रोज़गार के नए अवसर और बैंकों से मिलने वाला कर्ज़, दोनों इतने नीचे पहले कभी नहीं गए। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड़ से बढ़कर 1.78 करोड़ हो जाएगी, जिसका मतलब है कि इस साल देश में 10 लाख बेरोजगार और बढ़ जाएंगे और यह गति लगातार जारी रहने का अनुमान है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सही गणना एवं रजिस्ट्रेशन न होने के कारण बेरोजगारों की संख्या इससे कहीं अधिक होने का अनुमान है और यह आंकड़ा 2 करोड़ के आसपास भी हो सकता है। श्रम मंत्रालय के अधीन काम करने वाले लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ नोटबंदी के दौरान 1.52 लाख अस्थायी कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

एक अनुमान के अनुसार देश में हर साल 30 लाख से ज्यादा युवा ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री हासिल करते हैं और इनमें से मात्र 5-7 प्रतिशत नौजवानों को ही रोजगार प्राप्त होता है और इसमें भी केवल 2-3 प्रतिशत नौजवानों को ही स्थायी रोजगार उपलब्ध होता है। एक अध्ययन के अनुसार देश में 20 से 25 साल के 27 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, 25 से 30 साल के 20 प्रतिशत नौजवानों के पास कोई काम-धंधा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक आईटी, ट्रांसपोर्ट, मैन्यूफैक्चरिंग, ट्रेड आदि 8 सेक्टरों में नौकरियों में कटौती हुई है। 

नौकरियों की हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है। बड़े पैमाने पर बड़ी एवं अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों को रोजगार उपलब्ध करवाने वाली कम्पनी के एक सीईओ ने बताया कि पिछले कुछ सालों में बीसीए, एमसीए, बी. टेक, एम. टेक या इसी तरह के डिग्रीधारकों को बड़ी कम्पनियां 6 से 8 हजार रुपए की मासिक सैलरी पर हायर कर रही हैं जबकि दो-तीन साल पहले इन्हीं नौकरियों के लिए कम्पनियां 15-20 हजार रुपए मासिक अदा कर रहीं थीं। इसका सबसे बड़ा कारण ज्यादा संख्या में पेशेवरों का उपलब्ध होना है। नौकरियों की कमी के चलते नौजवान इन्हें अपना रहे हैं। इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष चौधरी जिले सिंह का कहना है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में नौकरियों में न सिर्फ कटौती हुई है बल्कि श्रम कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन हो रहा है और संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छंटनी की जा रही है और सरकार खामोश है।

श्रम अदालतों की कमी एवं श्रम विभाग की लापरवाही के चलते फैसले आने में 10-20 वर्षों का लम्बा समय लगता है जो श्रमिकों के साथ सरासर धोखा है। आंकड़ों के मक्कड़जाल में उलझकर सरकार युवाओं और विशेषकर मजदूर वर्ग के साथ छल कर रही है। चंद नीतियों को छोड़कर वाजपेयी सरकार ने भी कांग्रेस की नीतियों की ही अनुसरण किया था और टेलीविजन और अखबारों में "इंडिया शाइनिंग" का कम्पैन चलाकर यह दर्शाने का प्रयास किया था कि भाजपा के राज में देश दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है लेकिन अंतत: जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आये थे तो भाजपा फिसल कर औंधे मुंह गिरी थी और फिर लगातार 10 वर्षों तक सत्ता से बाहर रही थी, अत: भारतीय जनता पार्टी की सरकार को इस बार अधिक चौकन्ना रहकर काम करना होगा और रोजगारपरक कार्यक्रमों पर ध्यान देकर रोजगार उत्पन्न करने के साथ-साथ अवैध रूप से की जा रही छंटनियों को रोकने पर बल देना चाहिए।

बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों को छोड़कर बेशक मोदी सरकार का प्रदर्शन अच्छा रहा हो लेकिन किसान एवं मजदूर इस देश की रीढ़ है और इनको दरकिनार करके कभी देश का विकास नहीं हो सकता। धारणाओं के आधार पर चलने वाली सरकारें स्थाई नहीं रह सकतीं। अत: सरकार को गंभीरता से इस स्थिति पर नियंत्रण करने के बारे में प्रयास करना चाहिए। सड़क निर्माण के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन पहले की सरकारों से काफी अच्छा है लेकिन रोजगार उपलब्ध कराने, बेरोजगारी पर लगाम लगाने एवं श्रम कानूनों का उल्लंघन रोकने में मोदी सरकार विफल रही है।

- विजय शर्मा 

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