दावों के विपरीत है ज्यादातर खाद्य व पेय उत्पादों की गुणवत्ता

बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से डच कंपनी एक्सेस टू न्यूट्रि्शन फाउंडेशन द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा तय मानकों के अनुसार यह जांच की गई।

देश की नामी गिरामी कंपनियों के उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर आई हालिया रिपोर्ट आंखें खोल देने के लिए पर्याप्त है। आकर्षक विज्ञापनों में बड़े−बड़े दावों की पोल खोलने वाली इस रिपोर्ट का सबसे हैरतअंगेज परिणाम यह है कि इन शीर्ष कंपनियों के दावों के विपरीत केवल 12 फीसदी पेय पदार्थ और 18 फीसदी खाद्य पदार्थ ही कंपनियों के पोषक तत्वों के दावों पर खरे उतरे हैं। यानी की देश की खाद्य और पेय उत्पाद बनाने और मार्केटिंग करने वाली इन शीर्ष 9 कंपनियों का रिपोर्ट कार्ड दावों के विपरीत गुणवत्ता के मामले में पूरी तरह से उलट है। यही कारण है कि पोषक तत्वों से भरपूर होने का दावा करने वाले इन उत्पादों के उपयोग से पौष्टिकता मिलना तो दूर की बात हो गई है अपितु यह खाद्य पदार्थ बच्चों में कुपोषण और मोटापा जैसी कई बीमारियों का कारण बनते जा रहे हैं।

बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से डच कंपनी एक्सेस टू न्यूट्रि्शन फाउंडेशन द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा तय मानकों के अनुसार यह जांच की गई। सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि जांच के दायरे में आने वाले पेय पदार्थ और खाद्य पदार्थ सीधे आम आदमी के स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं। टीवी चैनलों पर आकर्षक विज्ञापनों के माध्यम से खासतौर से बच्चों को केन्द्रित विज्ञापनों के माध्यम से इन उत्पादों की मार्केटिंग की जाती रही है। इसके साथ ही पौष्टिकता के दावे किए जाते हैं। हैरतअंगेज यह है कि केवल 12 फीसदी पेय पदार्थ ही पौष्टिकता के दावों पर खरे उतर रहे हैं जबकि 88 प्रतिशत पेय पदार्थ अपने दावे पूरे नहीं कर पा रहे हैं। इसी तरह से 82 फीसदी खाद्य पदार्थों को लेकर दावों के विपरीत परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐन−केन प्रकारेण मुनाफा कमाना ही कंपनियों को काम हैं? लोगों के स्वास्थ्य के प्रति इन कंपनियों का कोई दायित्व बनता भी है या नहीं? हालांकि पिछले लंबे समय से भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने और भ्रामक विज्ञापन देकर लोगों को भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर नकेल कसने के दावे किए जाते रहे हैं। विज्ञापनों से इतर भी प्रश्न उठता है कि लोगों को भ्रमित कर स्वास्थ्य से खिलवाड़ का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? यहां तो सीधा−सीधा परिणाम पूरी दाल ही काली होने का सामने आ रहा है। परिणाम इससे इतर यानी कि केवल 12 या 18 प्रतिशत ही उत्पाद मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हों तब तो कोई बात हो सकती है हालांकि वह भी स्वीकार्य नहीं पर 80 प्रतिशत से अधिक उत्पादों की गुणवत्ता पौष्टिकता के दावों से इतर होना गंभीर चिंता का कारण है। आखिर मुनाफे के लिए लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कब तक होने दिया जाएगा। 

तस्वीर का निराशाजनक पहलू यह है कि बच्चे हों या बड़े आज सभी बाजारू खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों पर निर्भर हो गए हैं। आकर्षक विज्ञापनों और कंपनियों के दावों को देखने के साथ ही टैटू जैसे छोटे छोटे लालच में बच्चों की जिद इन उत्पादों को लाने के लिए अभिभावकों को मजबूर कर देती है। ऐसे में उत्पादकों और वितरकों का भी समाज के प्रति कुछ दायित्व हो जाता है। ठीक है कोई उत्पाद उन्नीस बीस हो सकता है पर इतनी अधिक मात्रा में उत्पादों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग रहा हो तो सरकार के लिए भी चिंता का विषय होने के साथ ही विचारणीय होना चाहिए। आखिर सरकार की नियामक एजेन्सियां क्या करती हैं। हालांकि इससे ज्यादा दुर्भाग्यजनक क्या होगा कि सरकार की नियामक एजेन्सियां कठोर कदम नहीं उठा पा रही हैं और कंपनियां सीधे सीधे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करती जा रही हैं। यह सब तो तब है जब सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि पांच साल से छोटे बच्चों की बड़ी आबादी कुपोषण का शिकार है। देश में साढ़े 13 करोड़ लोग मोटापे के शिकार हैं।

देश की इन नामी गिरामी कंपनियों सहित खाद्य एवं पेय पदार्थ के क्षेत्र में काम कर रही उत्पादक व वितरक कंपनियों को लोगों के स्वास्थ्य के प्रति भी जवाबदेह होना होगा। कंपनियों को केवल और केवल मुनाफे को लक्ष्य नहीं रख कर अपने उत्पादों को पौष्टिक तत्वों से भरपूर बनाना होगा। सरकार ने सस्ते में विटामिन और खनिज आदि से भरपूर आहार उपलब्ध कराने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए ही खाद्य उत्पादों में अलग से पोषक तत्व मिलाने की नीति बनाई है। ऐसे में कंपनियों को अपने नाम व प्रतिष्ठा को बचाए रखते हुए लोगों के विश्वास पर खरा उतरना होगा।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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