न्यायपालिका में सुधार के लिए गांधीवादी तरीके से चल रहा है आंदोलन

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प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय आईटीएम के कुलपति रमाशंकर सिंह और मप्र के ख्यातिप्राप्त नेत्र सर्जन डॉ. अरविंद दुबे ने इस ''न्याय मित्र'' नामक सत्याग्रही प्लेटफार्म को आकार दिया है। ''न्याय मित्र'' यानी ''फ्रेंड्स फ़ॉर जस्टिस'' का यह आंदोलन अपने एक सूत्रीय एजेंडे पर कायम रहेगा।

देश के उच्च न्यायिक तंत्र की कार्यविधि, सरंचना और सामंती सोच के विरुद्ध पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी की जन्मभूमि ग्वालियर से एक सत्याग्रह की शुरुआत हुई है। अभी तक इस मामले पर वैचारिक विमर्श औऱ दबी जुबान में आक्रोश देखने समझने को मिलता था लेकिन "न्याय मित्र" नामक एक जनसंगठन ने बाकायदा गांधीवादी तौर तरीकों से भारत में न्यायपालिका के शुद्धिकरण के लिये जमीन पर काम आरंभ किया है। करीब एक हजार कानून के विद्यार्थियों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील, चिकित्सक, व्यापारी और सरकारी, गैर सरकारी मुलाजिमों के समूह ने इस नए तरह के आंदोलन में अपनी शिरकत की है। शहर के एक होटल से करीब तीन किलोमीटर पैदल चल कर इस संगठन ने मप्र उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ के रजिस्ट्रार को एक ज्ञापन भी सौंपा जिसमें 10 प्रमुख मांगों पर विचार का आग्रह है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडे की मौजूदगी में इस जनसंगठन ने विधिवत अपने गठन का ऐलान किया।

देश के प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय आईटीएम के कुलपति रमाशंकर सिंह और मप्र के ख्यातिप्राप्त नेत्र सर्जन डॉ. अरविंद दुबे ने इस 'न्याय मित्र' नामक सत्याग्रही प्लेटफार्म को आकार दिया है। 'न्याय मित्र' यानी 'फ्रेंड्स फ़ॉर जस्टिस' का यह आंदोलन अपने एक सूत्रीय एजेंडे पर कायम रहेगा -"भारत में न्यायपालिका सन्देह और आक्षेप से परे होकर विश्व में सर्वश्रेष्ठ कैसे बने।'' रमाशंकर सिंह मप्र में सबसे कम उम्र में मंत्री रह चुके हैं वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान लोहियावादी आंदोलन से जुड़े। वर्तमान में वह आईटीएम जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी के मालिक कुलपति हैं। डॉ. अरविंद दुबे मप्र के बड़े नेत्र सर्जन हैं, गांधीवाद पर उनका अध्ययन और समझ अद्भुत है। इस जन संगठन को लोकतन्त्र के एक उपकरण 'प्रेशर ग्रुप' यानी दबाव समूह भी कहा जा सकता है क्योंकि इसमें कोई पदाधिकारी नहीं है सब समान हैसियत से जुड़े हुए हैं। यह संगठन पहले चरण में देश के सभी हाईकोर्ट मुख्यालय एवं खंडपीठ मुख्यालय पर जाकर गांधीवादी तरीके से रजिस्ट्रार को ज्ञापन देगा। यह सत्याग्रह सभी जगह रविवार के दिन ही होगा ताकि कोर्ट की नियमित करवाई बाधित न हो और कोई अप्रिय तमाशा भी इस मुद्दे का न बनाया जा सके।

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यह एक वैचारिक आंदोलन भी होगा, क्योंकि जिस भी शहर में यह सत्याग्रह होगा वहां एक दिन पहले गांधीवादी तरीके की जनसभा होगी जिसमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यविधि पर संसदीय शैली में खुली चर्चा की जाएगी। इस दरमियान देश के सभी जिला मुख्यालयों पर भी जनसंवाद और ज्ञापन का लक्ष्य रखा गया है, देश भर के गांधीवादी और स्वैच्छिक संगठनों को इस 'न्याय मित्र' से जोड़ने पर काम आरम्भ कर दिया गया है। ग्वालियर में जो व्यापक और सघन प्रतिसाद इस सत्याग्रह को हासिल हुआ उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आईटीएम यूनिवर्सिटी से उठी ये आवाज देश भर में उसी तरह अपनी उपयोगिता साबित करेगी जैसा नमक सत्याग्रह ने आजादी के लिये किया था।

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न्याय मित्र पूरी तरह से गांधीवाद पर केंद्रित रहेगा और गैर राजनीतिक मंच होगा। जिन दस बिंदुओं को इस संगठन ने उठाया है वह सही मायनों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंदर ही अंदर धधक रहे एक आक्रोश की समयानुकुल संसदीय अभिव्यक्ति ही है। जैसा कि डॉ. अरविन्द्र दुबे कहते हैं कि न्यायमूर्तियों का सम्मान, न्यायालय की प्रतिष्ठा बढ़े यह सभी चाहते हैं लेकिन आज देश में हालात बहुत ही गंभीर हैं। संविधान में किसी कॉलेजियम सिस्टम का प्रावधान नहीं है। हमारा पीएम, सीएम, एमपी, एमएलए कौन होगा यह हमें पता रहता है क्योंकि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क के बाशिंदे हैं हम इस चुनाव से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जुड़े रहते हैं लेकिन जरा सोचिये हमारे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज कौन होंगे ? यह हमें अखबारों से पता चलता है। 

-डॉ. अजय खेमरिया

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