Prabhasakshi
रविवार, मई 20 2018 | समय 21:43 Hrs(IST)

समसामयिक

अनुशासन और संस्कारों के अभाव में बिखरते जा रहे हैं परिवार

By ललित गर्ग | Publish Date: May 15 2018 8:46AM

अनुशासन और संस्कारों के अभाव में बिखरते जा रहे हैं परिवार
Image Source: Google

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने 1994 को अंतर्राष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था। समूचे संसार में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाने लगा। 1995 से यह सिलसिला जारी है। परिवार की महत्ता समझाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्पष्ट है कि किसी भी समाज का केंद्र परिवार ही होता है। परिवार ही हर उम्र के लोगों को सुकून पहुँचाता है। दरअसल सही अर्थों में परिवार वह संरचना है, जहां स्नेह, सौहार्द, सहयोग, संगठन, सुख-दुःख की साझेदारी, सबमें सबके होने की स्वीकृति जैसे जीवन-मूल्यों को जीया जाता है। जहां सबको सहने और समझने का अवकाश है, अनुशासन के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता है। निष्ठा के साथ निर्णय का अधिकार है। जहां बचपन सत्संस्कारों में पलता है। युवकत्व सापेक्ष जीवनशैली में जीता है। वृद्धत्व जीए गये अनुभवों को सबके बीच बांटता हुआ सहिष्णु और संतुलित रहता है। लेकिन आज इस परिवार की संरचना में आंच आयी हुई है। अपनों के बीच भी परायेपन का अहसास पसरा हुआ है। विश्वास संदेह में उतर रहा है। कोई किसी को सहने और समझने की कोशिश नहीं कर रहा है। इन स्थितियों पर नियंत्रण की दृष्टि विश्व परिवार दिवस मनाये जाने की प्रासंगिकता आज अधिक सामने आ रही है।

परिवार सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य रहा है या फिर है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है। भारत की संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार करके अपने को परिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हों लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं। बावजूद इसके क्यों परिवार बिखर रहे हैं, परिवार संस्था के अस्तित्व पर क्यों धुंधलके छा रहे हैं- इस तरह के प्रश्न समाधान चाहते हैं।
 
सच है कि आज संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। एकल परिवार भी तनाव में जी रहे हैं। बदलते परिवेश में पारिवारिक सौहार्द का ग्राफ नीचे गिर रहा है, जो एक गंभीर समस्या है। परिवार से पृथकता तक तो ठीक है, किंतु उसके मूल आधार स्नेह में भी खटास पड़ जाती है। स्नेह सूत्र से विच्छिन्न परिवार, फिर ‘घर’ के दिव्य भाव को नहीं जी पाता क्योंकि तब उसकी दशा ‘परिवार के सदस्यों की परस्पर अजनबी समूह’ जैसी हो जाती है।
 
समस्या आदिकाल से है, किंतु वह अब तक इसलिए है क्योंकि अधिकांश परिवारों ने समाधान के अति सरल उपायों पर विचार ही नहीं किया या फिर यों कहें कि अपनी रूढ़िवादिता की झोंक में विचार करना पसंद ही नहीं किया। मेरे विचार से, स्नेह, सम्मान और स्वतंत्रता की सूत्रत्रयी ही समाधान का मूल है। यदि तीनों का परस्पर अंतर्संबंध समझकर उसे आचरण में उतार लें, तो घर को ‘स्वर्ग’ बनते देर नहीं लगेगी। दुनिया भर की धन दौलत व्यक्ति को वह सुकून नहीं दे सकती, जो स्नेह और सम्मान का मधुर भाव देता है।
 
आप स्वयं ही विचार करें कि एक व्यक्ति अपने परिवार से और क्या चाहेगा ? मात्र सास बहू के संबंध में ही नहीं बल्कि पिता और पुत्र, माँ और बेटी, देवरानी जेठानी, ननद और भाभी, भाई भाई आदि हर रिश्ते पर यह बात लागू होती है। आप सामने वाले को स्नेह, सम्मान और स्वतंत्रता दीजिए, प्रतिफल में आपको भी उससे यही मिलेगा। 
 
आप अपनी बुद्धि और विवेक से यह विचारें कि पारिवारिक सुख शांति अधिक महत्वपूर्ण है अथवा रूढ़िवादिता या आधुनिकता? बंधी बंधाई लीक पर चलकर कोई उपलब्धि भी हासिल न हो बल्कि जो कुछ अच्छा था, वह भी छूटता जाए तो फिर ऐसा नियम पालन किस काम का? साड़ी और सिर पर पल्लू की अनिवार्यता, पति समेत घर के सभी सदस्यों से पहले भोजन न करने की कड़ाई, सास ससुर से हास-परिहास न करने की कूपमण्डूपता, ननद देवर के छोटे-छोटे बच्चों को जी और आप कहने की औपचारिकता, पति के साथ भ्रमण व मनोरंजन न करने और महत्वपूर्ण व्यक्तिगत व पारिवारिक फैसलों में भागीदारी न होने की कथित संस्कारशीलता से आज तक कौन-सा परिवार कोई ऐसी महान उपलब्धि हासिल कर पाया है, जिससे उपर्युक्त आचरण की सार्थकता सिद्ध होकर उसका नाम इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया हो? सच तो यह है कि ऐसे परिवार, जहां की आधा प्रतिशत जनसंख्या ऐसे घुटन भरे माहौल में जीती है, उपलब्धि की दृष्टि से औसत और पारस्परिक संबंधों की दृष्टि से यांत्रिक बनकर रह जाते हैं।
 
जिस प्रकार आयुर्वेद में निरोगी काया के लिए वात, पित्त और कफ का संतुलन अनिवार्य बताया गया है, उसी प्रकार पारिवारिक सुख और शांति के लिए स्नेह, सम्मान और स्वतंत्रता का संतुलन जरूरी है। ‘जैसा बोया, वैसा काटोगे’ के सर्वकाल सत्य के आधार पर कहा जा सकता है कि जो भाव और व्यवहार हमारा दूसरों के प्रति होगा, वही हमें भी प्रतिफल में मिलेगा। तभी ‘सुख’ अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा और तब आपका घर ऐसे अटल सुख, मंगल व शांति से भर उठेगा, जिसकी सुगंध से आपके मन प्राण ही नहीं, आत्मा भी तृप्त होगी और आत्मा की तृप्ति ही तो समस्त तृप्तियों का मूल है।
 
सुखद पारिवारिक जीवन के लिये संस्कार और सहिष्णुता भी जरूरी है। जिनके पास संस्कारों की सृजना होती है, उनके लिए वे संस्कार आलम्बन बन जाते हैं और व्यक्ति और परिवार संभल जाते हैं। गृहस्थ समाज में सुखी गृहस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए सहिष्णुता की बहुत जरूरत है, अपेक्षा है, जिसकी आज बहुत कमी होती जा रही है। सहन करना जानते ही नहीं हैं। पत्नी हो, मां-बेटे, मां-बेटी, भाई-भाई, भाई-बहन, सास-बहू, गुरु-शिष्य कहने का अर्थ है कि प्रायः सभी में सहिष्णुता की शक्ति में कमी हो रही है।
 
एक व्यक्ति अपने भाई को सहन नहीं करता, माता-पिता को सहन नहीं करता और पड़ोसी को सहन कर लेता है, अपने मित्र को सहन कर लेता है। यह प्रकृति की विचित्रता है। सहन करना अच्छी बात है। लेकिन घर में भी एक सीमा तक एक-दूसरे को सहन करना चाहिए, तभी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व नित्य झगड़े नहीं होंगे।
 
इन्सान की पहचान उसके संस्कारों से बनती है। संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यायित करते हैं। संस्कार हमारी जीवनी शक्ति है, यह एक निरंतर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश की किरणें बिछा देती है। उच्च संस्कार ही मानव को महामानव बनाते हैं। सद्संस्कार उत्कृष्ट अमूल्य सम्पदा है जिसके आगे संसार की धन दौलत का कुछ भी मौल नहीं है। सद्संस्कार मनुष्य की अमूल्य धरोहर है, मनुष्य के पास यही एक ऐसा धन है जो व्यक्ति को इज्जत से जीना सिखाता है और यही सुखी परिवार का आधार है। वास्तव में बच्चे तो कच्चे घड़े के समान होते हैं उन्हें आप जैसे आकार में ढालेंगे वे उसी आकार में ढल जाएंगे। मां के उच्च संस्कार बच्चों के संस्कार निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि सबसे पहले परिवार संस्कारवान बने, माता-पिता संस्कारवान बनें, तभी बच्चे संस्कारवान चरित्रवान बनकर घर की, परिवार की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकेंगे। अगर बच्चे सत्पथ से भटक जाएंगे तो उनका जीवन अंधकार के उस गहन गर्त में चला जाएगा जहां से पुनः निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
 
प्रख्यात साहित्यकार जैनेन्द्रजी ने इतस्तत में कहा है, “परिवार मर्यादाओं से बनता है। परस्पर कर्तव्य होते हैं, अनुशासन होता है और उस नियत परम्परा में कुछ जनों की इकाई हित के आसपास जुटकर व्यूह में चलती है। उस इकाई के प्रति हर सदस्य अपना आत्मदान करता है, इज्जत खानदान की होती है। हर एक उससे लाभ लेता है।''
 
आज की भोगवादी संस्कृति ने उपभोक्तावाद को जिस तरह से बढ़ावा दिया है उससे बाहरी चमक-दमक से ही आदमी को पहचाना जाता है। यह बड़ा भयानक है। उससे ही अपसांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ये ही स्थितियां पारिवारिक बिखराव का बड़ा कारण बन रही हैं। वही आदमी श्रेष्ठ है जो संस्कृति को शालीन बनाये। वही औरत शालीन है जो परिवार को इज्जतदार बनाये। परिवार इज्जतदार बनता है तभी सांस्कृतिक मूल्यों का विकास होता है। उसी से कल्याणकारी मानव संस्कृति का निर्माण हो सकता है।
 
भारत को आज सांस्कृतिक क्रांति का इंतजार है। यह कार्य सरकारी तंत्र पर नहीं छोड़ा जा सकता है। सही शिक्षा और सही संस्कारों के निर्माण के द्वारा ही परिवार, समाज और राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र बनाया जा सकता है इसी उद्देश्य को लेकर श्रद्धेय गणि राजेन्द्र विजयजी के मार्गदर्शन में सुखी परिवार अभियान चलाया जा रहा है। मेरी दृष्टि में इस अभियान के माध्यम से बदलते पारिवारिक परिवेश पर गंभीरता से चिन्तन-मनन हो रहा है और समय-समय पर पारिवारिक संरचना को सुदृढ़ बनाने के लिये प्रभावी प्रयत्न भी किये जा रहे हैं। हाल ही में गुजरात के बडोदरा एवं छोटा उदयपुर जिले के हजारों आदिवासी परिवारों में गणि राजेन्द्र विजयजी ने पारिवारिक सौहार्द का जो प्रशिक्षण दिया, उसके परिणाम भी सुखद रहे हैं। पारिवारिक सौहार्द के इस तरह के प्रयत्न हमारे परिवारों के लिये संजीवनी बन सकती है। इससे जहां हमारी परिवार परम्परा और संस्कृति को पुनः प्रतिष्ठापित किया जा सकेगा। वहां स्वस्थ तन, स्वस्थ मन और स्वस्थ चिन्तन की पावन त्रिवेणी से स्नात होने का दुर्लभ अवसर भी प्राप्त हो सकेगा। 
 
-ललित गर्ग

Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.