अफगानिस्तान में गृहयुद्ध छिड़ा तो यह अमेरिका की भी बड़ी विफलता होगी

अफगानिस्तान में गृहयुद्ध छिड़ा तो यह अमेरिका की भी बड़ी विफलता होगी

कुछ आलोचक यह मानते हैं कि तालिबान हिंसक घटनाओं में इज़ाफ़ा करके, निर्णायक दौर की बातचीत में अपना पलड़ा भारी रखना चाहता था और वर्चस्व बनाये रखने के लिए नागरिक और सरकारी ठिकानों को निशाना बना रहा था।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और तालिबान के बीच पिछले 10 माह से चल रही बातचीत पर विराम लगा दिया है। उन्होंने तालिबान पर हिंसा करके दबाव बनाने और बातचीत को लेकर ग़म्भीरता में कमी का आरोप लगाया है। इस तरह से अमेरिकी सेना की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी की चर्चा फिलहाल ठप्प हो गई है। अभी पिछले माह ही अमेरिका और तालिबान के बीच नौवें दौर की बातचीत समाप्त हुई थी। नौवें दौर की बैठक में एक ड्राफ्ट योजना पर सहमति बननी थी लेकिन अमेरिकी वार्ताकारों और तालिबान प्रतिनिधियों के बीच अविश्वास की खाई बढ़ती जा रही थी और ऐसे में यह बैठक भी बेनतीजा रही थी। अमेरिका का यह आरोप है कि पिछले कुछ महीनों में तालिबान ने हिंसा की घटनाओं में कोई कमी नहीं की। अभी सितम्बर के पहले हफ्ते में ही काबुल में हुए एक आत्मघाती हमले में एक अमेरिकी सार्जेंट मारा गया था और कार्रवाई करने को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप दबाव में थे। अमेरिकी सेना ने भी हवाई हमलों के द्वारा पिछले दो हफ़्तों में 1000 तालिबान लड़ाकों को मारने का दावा किया है।

कुछ आलोचक यह मानते हैं कि तालिबान हिंसक घटनाओं में इज़ाफ़ा करके, निर्णायक दौर की बातचीत में अपना पलड़ा भारी रखना चाहता था और वर्चस्व बनाये रखने के लिए नागरिक और सरकारी ठिकानों को निशाना बना रहा था। लेकिन अब ऐसा लगता है कि बातचीत बंद हो जाने के बाद तालिबान और अमेरिकी सेना के बीच आने वाले कुछ महीनों में संघर्ष तेज हो जायेगा। अमेरिका के बातचीत से हट जाने से, अमेरिकी सेना की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है। अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना हटाने के लिए किसी समय सीमा से इंकार करने के बाद तालिबान की भी प्रतिक्रिया आई है। तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि अमेरिका का अप्रत्याशित रूप से बातचीत से अलग हो जाना दर्शाता है कि अमेरिका का रुख शांति विरोधी है। तालिबान ने चेताया है कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका को अपने ज़यादा सैनिकों को खोने के लिए तैयार रहना होगा। अफ़ग़ानिस्तान में अभी लगभग 14000 अमेरिकी सैनिक हैं और इसके अलावा नाटो की सेना भी मौजूद है। अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान में पांच सैन्य अड्डे हैं।

इसे भी पढ़ें: अमेरिका के साथ बातचीत के लिए दरवाजे खुले हैं: तालिबान

आठवें दौर के बातचीत के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि सितम्बर के पहले सप्ताह तक दोनों पक्षों के बीच कुछ शर्तों पर सहमति बन जाएगी और अमेरिका 135 दिनों के भीतर अपने 5400 सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान के पांच सैनिक स्थलों से निकाल लेगा। राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए दोनों पक्ष चाहते थे कि सितम्बर के पहले सप्ताह तक यह बातचीत युद्ध समाप्ति के निर्णय में तब्दील हो जाए।  अगस्त माह में ही देश में 2100 से अधिक लोग मारे गए और घायल हुए। सितम्बर माह में काबुल के ग्रीन विलेज पर हुए हमले में 8 विदेशी नागरिकों के अलावा 20 से अधिक लोग मारे गए और 100 से अधिक  लोग घायल हो गए। रोज कहीं न कहीं हमले हो रहे हैं और गोलीबारी हो रही है। आम-अवाम पर लगातार हो रहे हमलों को लेकर नागरिकों में बेचैनी पहले ही थी लेकिन अब अमेरिका के कई पूर्व राजदूतों ने यह आशंका व्यक्त की है कि अफ़ग़ानिस्तान में 'सिविल वॉर' छिड़ सकता है।

पिछले साल से शुरू हुए शांति-प्रयास से एक उम्मीद बंधी थी कि तालिबान के लोग हिंसा को छोड़ कर मुख्य धारा में शामिल हो सकतें हैं लेकिन फिलहाल, ऐसी उम्मीदों पर पानी फिर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि तालिबान, बिना चुनाव में शामिल हुए, सरकार में हिस्सेदारी चाहता था लेकिन अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। इसी महीने, 28 सितम्बर को अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं। चुनाव प्रचार के दौरान भी हिंसा में सैंकड़ों नागरिक मारे गए हैं। अफ़ग़ानिस्तान रिसर्च एंड स्टडी ऑर्गेनाइजेशन के सर्वे से यह निष्कर्ष निकला है कि 76 प्रतिशत से अधिक लोग राष्ट्रपति के आगामी चुनाव में वोट देना चाहते हैं लेकिन 22 प्रतिशत लोग असुरक्षा और अविश्वास के चलते अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं। एक अफगानी नागरिक ने बताया कि तालिबान शायद अपने जनाधार को लेकर आश्वस्त नहीं है, उसके प्रति लोगों का लगाव कम हो रहा है शायद इसीलिए उसके प्रतिनिधि चुनाव प्रक्रिया में भाग नहीं लेना चाहते थे, बल्कि सीधे सरकार में शामिल होना चाहते थे।

उधर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, माइक पोम्पिओ ने किसी भी संदेहास्पद शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले ही इंकार कर दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी दोहराया है कि तालिबान बातचीत के रास्ते को नहीं अपना कर बहुत बड़ी भूल कर रहा है और जब तक अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाली नहीं हो जाती, तब तक अमेरिकी सेना की वापसी का सवाल ही नहीं उठता। नाटो के प्रमुख, जेन्स स्टॉलटेनबर्ग ने भी एक बयान दिया, जिसमें वह विदेशी सेनाओं के जल्दीबाज़ी में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं।

इसे भी पढ़ें: अमेरिका-तालिबान वार्ता टूटने से भारत रहा फायदे में, पर अभी सतर्क रहना जरूरी

कुछ लोग, तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के बीच सीधी बातचीत के हिमायती हैं क्योंकि अमेरिका और तालिबान के बीच अभी समझौता हो भी जाता तो अफ़ग़ानिस्तान की सरकार उसे कैसे मानती ? ऐसा कहा जा रहा है कि अमेरिकी वार्ताकार जलमई ख़लीलज़ाद ने तालिबान के साथ जो सहमति का मसौदा तैयार किया था उस पर अफ़ग़ानिस्तन की सरकार ने पहले ही अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं। अफ़ग़ानिस्तान की सरकार लोया जिरगा को साथ लेकर तालिबान को बिना शर्त बातचीत करने के लिए बुलाती रही है। अब जब दस महीनों की क़वायद एक बार फिर पटरी से उतर गई है और अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा का ग्राफ और बढ़ने के आसार हैं। अब देखना यह है कि अगले हफ्ते होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद तालिबान, अमेरिका और निर्वाचित राष्ट्रपति, देश में शांति स्थापित करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

-डॉ. संजीव राय