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समसामयिक

जिंदगी के तनावों के बीच सुकून देतीं त्योहारों की खुशियाँ

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Nov 9 2018 11:22AM

जिंदगी के तनावों के बीच सुकून देतीं त्योहारों की खुशियाँ
Image Source: Google
ज़िंदगी में खुशियां कम हैं और दुख ज़्यादा। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ को आधार कार्ड मानकर, हजारों प्रवाचक सुबह से शाम तक करोड़ों लोगों को समझाते रहते हैं कि भजन करो, प्रसाद खाओ और खुश रहो। डॉक्टर कहते रहते हैं खुश रहना चाहिए। जीवन में प्रसन्न रहने के सूत्रों पर हज़ारों किताबें, ज़िंदगी की लाइब्रेरी की दुखभरी अलमारियों में दफन धूलभरी ‘किताबें’ बनकर ही रह गई हैं। तनाव की नाव है कि मस्ती के गहरे पानी में भी डूबती नहीं है। जिस छोटे से देश से हमारे बड़े से देश में बुलेट ट्रेन आ रही है उन्होंने बड़ी शालीनता से बताया है कि तनाव दूर करने का सही तरीका केवल हँसना नहीं है। वहां हुए एक सर्वे के अनुसार खुशी ही नहीं दुख के आंसुओं से भी जीवन में तनाव घटता है। संभवतः जापानियों को सर्वे के बाद पता चला लेकिन हमें तो पहले से पता है कि दुख के कुछ आँसू क्या, खुल कर रोने से ज़िंदगी का तनाव कम हो जाता है, शरीर जी भर आराम कर लेता है और आंखें धुल जाती हैं उनका खुलकर व्यायाम भी होता है।
 
दुनिया जानती है जापानी काम के दीवाने हैं और हमारे यहाँ काम से ज़्यादा परेशान होने की परम्परा नहीं है। भारतीय किसी भी दुर्घटना से ज़्यादा दिन तक परेशान नहीं रहते। अति उत्सव प्रेमी हम लोगों का चौबीस घंटे रंगीला, हठीला व हंसीला मनोरंजन किया जा रहा है। जीवन में स्थायी सुख का मौसम है। लेकिन कभी कभी शरीर में ख्याल आता है कि कहीं लोग फूहड़ तरीकों से हंस-हंस कर ऊबने तो नहीं लग गए हैं। सुनने में आया है कि अब तो बच्चे भी मुस्कुराते हुए पैदा होने लगे हैं। उन्हें पता है विकासजी हर मकान के अतिथिकक्ष में विराजमान हैं, समाज में लोग सफल हैं, ज़िंदगी का दंगल जीत रहे हैं, एक दूसरे के साथ हंस रहे हैं, पार्टी कर रहे हैं, फ़ेस बुक ईमानदारी से पढ़ने रोज़ क्लास में बैठते हैं। ‘फुर्सत है किसको रोने की दौर ए बहार में ........। क्या उनके भीतर भी तनाव कहीं न कहीं ज्वालामुखी की तरह शांत है ?
 
डॉक्टर यह भी तो मानते हैं कि कभी कभी तो रोना ही चाहिए। हमेशा माना जाता रहा कि दुख का गीत संगीत ही ज़िंदगी का असली गीत संगीत होता है। एक लाफ़्टर थेरेपिस्ट द्वारा स्थापित क्राइंग क्लब वाले तो लोगों को पहले से रुला रहे हैं। कहीं वे यह तो नहीं मानते कि हंस कर या दिखा कर कि हम खुश हैं, सब ठीक चल रहा है मान लेने से बात नहीं बनती। शायद यही जानकर जापान में ‘टीयर टीचर्स’ तैयार किए जा रहे हैं जो संस्थानों में जाकर लोगों को रोने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। वही सर्वे समझाता है कि तनाव घटाने में रोना, हंसने व सोने से ज़्यादा मददगार है। अब तनाव झेल रहे, खुश मगर रोना भूल चुके व्यक्तियों को अलग अलग तरीकों से रुलाए जाने के प्रयास होंगे। हो सकता है शुरू शुरू में लोग मुफ्त में रोने को तैयार ही न हों। कुछ आकर्षक उपहार लेकर ही रोना के लिए तैयार होंगे, फिर शुरू करेंगे और जब यह व्यवसाय सफल हो जाए तो रोने के सैशन का हिस्सा होने के लिए कीमत अदा किया करेंगे। तनाव के प्रकार के अनुसार उनके दिल को बाहर से छूकर, दिमाग की छत पर प्यार से हाथ फेरकर या फिर ज़ोर से मार कर रुलाया जाएगा। उन्हें केएल सहगल या मुकेश के रुलाऊ गीत नियमित रूप से सुनने की सलाह दी जाएगी।
 
करोड़ों लोगों को आनंद देने वाले राजस्थान के आंगन में पनपी रूदाली परम्परा समझाती है कि रोना भी एक कला है। कहीं लगता तो है जापान की ‘टीयर थैरेपी’ रुदाली की प्रयोगशाला में उगी है। अब ज़माना पुराने आजमाए हुए नुस्खों को कैश करने का भी तो है। यहां यह शंका परेशान करती है कि दूसरों को रुलाकर सफल होने की कोशिश करने वाला बंदा रोएगा क्या। रोने से तो इंसान भावुक होना शुरू हो जाएगा और अगर सचमुच यह तकनीक सफल हो गई, दुख तकलीफ देने वाला पदार्थ आंसू बनकर बह निकला और व्यक्ति में सशक्त भावनाएँ प्रबल हो गईं तो वो इस मारकाटू प्रतियोगी दुनिया में कैसे आगे बढ़ेगा। रुलाकर तनाव दूर भगाने वालों का धंधा चल निकला तो हंसाने वाले क्या करेंगे क्यूंकि बताते हैं कि हंसाना बहुत मुश्किल काम है। क्या खुशी और ग़म के आंसू अलग अलग आकार, रंग व प्रवृत्ति के होते हैं। अब हौले हौले यह अनुभूति होने लगी है कि जीवन में आया ज़्यादा सुख, रुलाने पर उतारू हो गया है।
 
-संतोष उत्सुक

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