गरीबों के साथ-साथ कंपनियों का भी ध्यान रखना ही पड़ता है, सरकार ने यही किया

गरीबों के साथ-साथ कंपनियों का भी ध्यान रखना ही पड़ता है, सरकार ने यही किया

देश को एक और सबसे बड़ा लाभ यह भी होने जा रहा है कि कर की कम दर के चलते कम्पनियों को रुपए 1.45 लाख करोड़ का फ़ायदा होगा, जब यह राशि इन कम्पनियों के हाथ में आने वाली है तो इन कम्पनियों की क्रय शक्ति भी बढ़ेगी।

20 सितम्बर 2019 को केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट इंडिया को एक बहुत बड़ा तोहफ़ा दिया। वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने कॉरपोरेट करों में कटौती की घोषणा की, जो 1 अप्रैल 2019 से लागू होगी। साथ ही, न्यूनतम एकांतर कर में भी राहत दी एवं पूँजी लाभ कर पर बढ़ा हुआ सरचार्ज हटाने का भी बड़ा ऐलान किया। नए प्रावधानों के तहत घरेलू कंपनियों को वर्तमान के 30 प्रतिशत (सरचार्ज सहित 34.94 प्रतिशत) के स्थान पर अब 22 प्रतिशत (सरचार्ज सहित 25.17 प्रतिशत) की दर से कॉरपोरेट कर का भुगतान करना होगा। लेकिन, शर्त ये होगी कि कम्पनी किसी छूट अथवा प्रोत्साहन का लाभ नहीं लेगी। इसके अलावा, 1 अक्तूबर 2019 से अथवा इसके बाद जो कम्पनी विनिर्माण क्षेत्र में नई इकाई की स्थापना करेगी एवं इस इकाई में उत्पादन 31 मार्च 2023 तक शुरू हो जाएगा, उसके लिए कॉरपोरेट कर की वर्तमान दर 25 प्रतिशत (सरचार्ज सहित 29.12 प्रतिशत) से घटकर मात्र 15 प्रतिशत (सरचार्ज सहित 17.01 प्रतिशत) ही रहेगी। कॉरपोरेट कर की यह दर दक्षिण पूर्वी एशिया के लगभग सभी देशों में लागू दरों की तुलना में कम होगी। सरकार के इस फ़ैसले के बाद शेयर बाज़ार में किसी एक दिन में सबसे बड़ी तेज़ी देखने को मिली और अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने के लिए सरकार का अब तक का यह सबसे बड़ा फ़ैसला कहा जा रहा है।

अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह एक साहसिक एवं मज़बूत फ़ैसला भी कहा जा सकता है जो कि अर्थव्यवस्था की रफ़्तार के लिए एक गेम चेंजर साबित होगा। इस समय, वैश्विक स्तर पर भारत की जो स्थिति थी और भारत को जो फ़ायदा उपलब्ध था, दोनों इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि हमें कॉरपोरेट कर को पुनर्गठित करना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था आज वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है और विभिन्न देशों के बीच प्रतिस्पर्धा इस बात की है कि कौन-सा देश अपनी अर्थव्यवस्था में विनिर्माण को, रोज़गार को, संसाधनों को किस प्रकार बढ़ावा देता हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में, जब किसी भी देश द्वारा करों के सम्बंध में कोई बदलाव किया जाता है तो केवल अपने देश की कम्पनियों की ओर देखकर नहीं किया जाता है बल्कि विदेशों में भी इस सम्बंध में नियमों की ओर देखना होता है। चीन ने भी 1980 के दशक में बुनियादी ढाँचे को मज़बूत बनाते हुए, कॉरपोरेट टैक्स की दरों में भारी कमी की थी एवं श्रम क़ानूनों को भी बहुत शिथिल किया था। इस प्रकार चीन ने अपने आप को पूरे विश्व में एक विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित कर लिया था। चीन की स्थिति आज ख़राब है, चीन और अमेरिका के सम्बंध आपस में बिगड़ रहे हैं अतः भारत को एक ऐसा मौक़ा है कि अमेरिकन एवं अन्य देशों की कम्पनियों को अपने देश में विनिर्माण इकाई स्थापित करने के लिए आकर्षित करे, उनके लिए देश में अच्छा माहौल बनाए। भारत अमेरिका के आपसी सम्बंध बहुत अच्छे हैं। सारे प्रतिस्पर्धी देशों यथा, चीन, सिंगापुर, वियतनाम, हांगकांग, इंडोनेशिया आदि में यदि कॉरपोरेट कर की दरें कम हैं तो हमारे देश में 35 प्रतिशत कर की दर होने पर क्यों कोई कम्पनी अपनी विनिर्माण इकाई की स्थापना करेगी। इसलिए आज की परिस्थिति में ये आवश्यक हो गया था कि कर की दरों को कम किया जाए। 

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1 अक्तूबर 2019 को या उसके बाद नई विनिर्माण कम्पनियों की स्थापना करने पर हमारे देश में 15 प्रतिशत एवं सरचार्ज मिलाकर 17.01 प्रतिशत की दर से कर लागू होगा। जबकि, थाईलैंड एवं वियतनाम में यह दर 20 प्रतिशत है एवं सिंगापुर एवं हांगकांग में 17 प्रतिशत है। साथ ही, विदेशी निवेश की दृष्टि से विश्व के अन्य आकर्षित गंतव्य स्थानों की तुलना में भी अब भारत में कर की दर कम हो गई है। अन्य स्थितियों में भी कर की दर 22 प्रतिशत एवं सरचार्ज मिलाकर 25.17 प्रतिशत की दर, तुलनात्मक रूप से काफ़ी कम है। नई व्यवस्था में देश की कर प्रणाली पारदर्शी हो गई है। क्योंकि विनिर्माण इकाइयों को विभिन्न शर्तों के साथ जो कुछ प्रोत्साहन दिए जाते रहे हैं, अब इस व्यवस्था को भी सुधारा जा रहा है एवं कोई प्रोत्साहन अथवा छूट न लेने की स्थिति में कर की कम दर ही लागू हो जाएगी। इस प्रकार, ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की रैंकिंग में भी भारत एक और छलाँग लगा सकता है।  

करों की दरों में उक्त वर्णित कमी के बाद केंद्र सरकार की कॉरपोरेट कर की मद पर आय में 1.45 लाख करोड़ रुपए का असर पड़ सकता है। कभी कभी ऐसा लगता है कि कर की दर कम करने से राजस्व की वसूली में कमी आएगी, लेकिन ऐसा हमेशा होता नहीं है और इस बार भी सम्भवतः ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। क्योंकि, विभिन्न शर्तों को पूरा करने पर सरकार प्रतिवर्ष रुपए 1.08 लाख करोड़ की राशि का प्रोत्साहन एवं छूट कॉरपोरेट जगत को देती है। यदि कम्पनियाँ कर की घटी हुई दर को चुनती हैं तो उन्हें प्रोत्साहन एवं किसी भी प्रकार की छूट लेना बंद करना होगा, तो यह राशि तो सरकार को बचनी चाहिए। दूसरे, कम दर के चलते जिन नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना होगी, उनका कर तो सरकार के लिए नया राजस्व होगा, इस प्रकार वर्तमान राजस्व की राशि में वृद्धि होगी। तीसरे, जो भी नई कम्पनी देश में आएगी वह केवल कॉरपोरेट कर ही नहीं देगी बल्कि अप्रत्यक्ष कर भी देगी, जीएसटी भी देगी तथा अन्य प्रकार के कर राज्य सरकारों को भी देगी, जो विभिन्न सरकारों के संसाधनों में वृधि करेगा। अतः इस विषय पर चिंता करने जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए।

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न्यूनतम वैकल्पिक कर एवं लम्बी अवधि पूँजी लाभ पर कर में कुछ छूट देने के पीछे भी सरकार की मंशा यह है कि देश में अधिक से अधिक निवेश आकर्षित किया जाये। जो लोग सम्पदा का सृजन कर रहे हैं उन्हें देश में सहूलियतें दी जानी चाहिए। जिन कारणों से पूँजी की लागत बढ़ती हो अथवा जिन नियमों के चलते निवेशक नया निवेश करने में निरुत्साहित होते हों, उन नियमों को आसान बनाया जाना ही चाहिए। विदेशी निवेश के आने से देश में विनिर्माण इकाइयों की स्थापना होगी, इन इकाइयों से निर्यात बढ़ेगा, रोज़गार के नए अवसरों का सृजन होगा, उत्पादों की खपत बढ़ेगी, इस प्रकार कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर तेज़ होगी। 

देश को एक और सबसे बड़ा लाभ यह भी होने जा रहा है कि कर की कम दर के चलते कम्पनियों को रुपए 1.45 लाख करोड़ का फ़ायदा होगा, जब यह राशि इन कम्पनियों के हाथ में आने वाली है तो इन कम्पनियों की क्रय शक्ति भी बढ़ेगी, अतः इतनी बड़ी राशि का इन निजी कम्पनियों द्वारा नया निवेश देश में किया जा सकता है, जोकि देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही बड़ा क़दम होगा। 

सरकार द्वारा लिए गए उक्त वर्णित निर्णय केवल एक कर नीति से सम्बंधित निर्णय नहीं है बल्कि सम्पूर्ण एकीकृत नीति का एक हिस्सा है। भारत, अब वैश्विक महत्व श्रृंखला का हिस्सा बनने जा रहा है। अतः अब अमेरिकन, यूरोपीयन, जापानी कम्पनियाँ चीन में अपनी पैठ बनाने के लिए भारत में विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित करेंगी और भारत से चीन को अपनी कम्पनियों के माध्यम से उत्पादों का निर्यात करेंगी।    

उक्त वर्णित चौथे पैकेज के अलावा पूर्व में वित्त मंत्री तीन पैकेजों की घोषणा कर चुकी हैं। प्रथम पैकेज की घोषणा दिनांक 23 अगस्त 2019 को की गई थी। जिसके अंतर्गत, पूँजी बाज़ार में निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु, बैंकों की तरलता की स्थिति में सुधार करने हेतु, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमियों को ऋण का प्रवाह बढ़ाने हेतु, ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों की तरलता की स्थिति में सुधार हेतु, ब्याज दरों में की गई कमी को हितग्राहियों तक पहुंचाने हेतु और ऑटोमोबाईल क्षेत्र के विकास को गति देने हेतु कई उपायों एवं सुधारों की घोषणा की गई थी। दूसरे पैकेज के रूप में दिनांक 30 अगस्त 2019 को देश की वित्त मंत्री ने बैंकिंग क्षेत्र को और अधिक मज़बूत बनाए जाने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की थी। इसमें सरकारी क्षेत्र के बैंकों का आपस में विलय मुख्य रूप से शामिल था। 13 सितम्बर 2019 को तीसरे पैकेज के रूप में आवास क्षेत्र एवं निर्यात क्षेत्र के लिए वित्त मंत्री ने कई उपायों एवं प्रोत्साहनों की घोषणा की थी। यह सब इतना व्यवस्थित रूप से किया जा रहा है कि अब अर्थव्यवस्था पर इन सभी उपायों एवं प्रोत्साहनों का अच्छा प्रभाव बस दिखने भर की देर है और इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को अब पंख लगेंगे ही।   

-प्रह्लाद सबनानी