प्रोजेक्ट जोरावर, स्वार्म ड्रोन, आईएनएस विक्रांत...एक के बाद एक बढ़ रही भारतीय सैन्य बलों की ताकत

INS Vikrant
ANI
सेना आधुनिक तकनीक का किस कदर इस्तेमाल कर रही है इसका उदाहरण इसी सप्ताह तब सामने आया था जब जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में गुरुवार को नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोधी अभियान के दौरान तीन आतंकवादियों का पता लगाने के लिए हाइटेक उपकरणों ने काफी मदद की।

चारों दिशाओं में तैनात भारतीय सैन्य बलों के आधुनिकीकरण का काम तेजी से जारी है। खासकर संवेदनशील मोर्चों पर अत्याधुनिक उपकरणों के माध्यम से हमारे सुरक्षा बलों की ताकत बढ़ाई जा रही है। हाल में तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में कई कदम उठाये गये हैं। इसी कड़ी में अब थलसेना ‘प्रोजेक्ट जोरावर’ के तहत पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाले स्थानों पर तैनाती के लिए हल्के टैंक का एक बेड़ा हासिल करने वाली है। इस कदम का उद्देश्य किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए गोलाबारी करने की सेना की संपूर्ण क्षमता को बढ़ाना है। रक्षा एवं सुरक्षा प्रतिष्ठानों के सूत्रों ने बताया कि आवश्यकता की स्वीकार्यता या शुरुआती मंजूरी रक्षा मंत्रालय द्वारा अगले महीने प्रदान किये जाने की संभावना है। हम आपको बता दें कि हल्के टैंक तैनात करने की योजना भारत और चीन के बीच संबंधों में तनाव लाने वाले पूर्वी लद्दाख में व्याप्त सीमा विवाद के बीच आई है। सूत्रों ने बताया कि हल्के टैंक की गोला दागने की क्षमता मौजूदा टैंक के अनुरूप होगी और उन्हें शीघ्र तैनाती तथा थल सेना की फुर्ती बढ़ाना सुनिश्चित करने के लिए हासिल किया जा रहा है। सूत्रों ने बताया है कि उत्तरी सीमाओं पर निकट भविष्य में खतरा बने रहने की संभावना है।

सूत्रों ने यह भी बताया कि यह महसूस किया गया कि जब मौजूदा टैंक को इस तरह के भू-भाग में उपयोग करने की बारी आई तब एक ‘जरूरत’ महसूस की गयी और इसलिए ‘‘हल्के टैंक’’ तैनात करने का फैसला किया गया। सूत्रों ने बताया कि शत्रु ने बड़ी संख्या में तकनीकी रूप से आधुनिक, अत्याधुनिक टैंक शामिल किये हैं और मध्यम से लेकर हल्के टैंक तक को मिश्रित रूप से तैनात किया है। सूत्रों ने कहा कि उत्तरी सीमाओं पर ‘‘बढ़ा हुआ खतरा’’ निकट भविष्य में बने रहने की संभावना है और सेना की क्षमता बढ़ाने में वक्त लगता है। एक सूत्र ने कहा, ‘‘हमारे मौजूदा टैंक अच्छा काम कर रहे हैं और पिछली बार हमने विभिन्न माध्यमों के जरिये उनकी वहनीयता को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाये थे।’’ सूत्र ने कहा, ‘‘हालांकि, ऊंचाई वाले स्थानों पर एक अंतराल पाया गया और इसलिए हमें अपेक्षाकृत हल्के टैंक की जरूरत है, जो मौजूदा टैंक के समान ही सक्षम हों।’’

इसे भी पढ़ें: ‘विक्रांत’ स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को विनम्र श्रद्धांजलि है: नौसेना

हम आपको बता दें कि ये टैंक ‘प्रोजेक्ट जोरावर’ के तहत हासिल किये जाएंगे। इसका नामकरण जोरावर सिंह के नाम पर किया गया है जिन्होंने जम्मू के राजा गुलाब सिंह के तहत एक सैन्य जनरल के रूप में सेवा दी थी। मिसाइल दागने की क्षमता, ड्रोन रोधी उपकरण, चेतावनी प्रणाली और शक्ति एवं वजन का अनुपात इस टैंक को बहुत फुर्तीला बनाएगा। इसके अलावा हल्के टैंक सेना को मध्यम लड़ाकू टैंक की सीमाओं से बाहर आने में मदद करेंगे। देखा जाये तो भारतीय थलसेना के लिए स्वदेश में हल्के टैंक को डिजाइन और विकसित करना भी जरूरी है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना होगा कि क्या इन्हें स्थल और जल, दोनों के लिए अनुकूल बनाया जा सकता है ताकि इन्हें पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो इलाके में तैनात किया जा सके।

इसके अलावा यदि ड्रोन तकनीक की बात करें तो आपको बता दें कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित सॉफ्टवेयर का उपयोग करके लक्ष्य की पहचान करने में सक्षम और अत्याधुनिक तकनीक से लैस ‘स्वार्म’ ड्रोन प्रणाली को भारतीय सेना के यंत्रीकृत बलों (मैकेनाइज्ड फोर्सेस) में शामिल किया जा रहा है। सूत्रों ने बताया कि ‘स्वार्म’ ड्रोन में एक ही स्टेशन से नियंत्रित कई ड्रोन होते हैं, जिन्हें निगरानी सहित विभिन्न कार्यों को करने के लिए ‘एल्गोरिदम’ का उपयोग करके संचालित किया जा सकता है। भारतीय सेना ने ट्विटर पर कहा कि नई प्रणाली भविष्य की ‘‘सुरक्षा चुनौतियों’’ का सामना करने में उसे ‘‘बढ़त’’ प्रदान करेगी। दरअसल सेना भविष्य की परिचालन चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को ''तकनीक से लैस बल’’ में बदलने के लिए ‘‘उभरती और विघटनकारी तकनीकों को अपनाने’’ का प्रयास कर रही है। जहां तक स्वार्म ड्रोन की बात है तो आपको बता दें कि स्वार्म ड्रोन में एक ही स्टेशन से नियंत्रित कई ड्रोन होते हैं और एक ही मिशन में विभिन्न प्रकार के ‘पेलोड’ ले जा सकते हैं, इस प्रकार यह लगातार हमले करके दुश्मन की रक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने में सक्षम है।

सेना आधुनिक तकनीक का किस कदर इस्तेमाल कर रही है इसका उदाहरण इसी सप्ताह तब सामने आया था जब जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में गुरुवार को नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोधी अभियान के दौरान तीन आतंकवादियों का पता लगाने और उन्हें खत्म करने के लिये हवाई और जमीन आधारित संवेदकों समेत नई पीढ़ी के निगरानी उपकरणों तथा हथियारों का इस्तेमाल किया गया। जिस क्षेत्र में इस अभियान को अंजाम दिया गया वह बेहद चुनौतीपूर्ण था। वहां घने झाड़-झंखाड़ थे। वहां काफी अंधेरा था और भारी बारिश हो रही थी। पूरे इलाके में बारूदी सुरंग भी थीं। नियंत्रण रेखा पर तैनात जवानों ने जब इलाके में संदिग्ध गतिविधि देखी तो ऑपरेशन मृत्युंजय शुरू करते हुए छोटे घातक दलों और निगरानी दलों को इलाके में भेजा गया। यह सब इतना गोपनीय तरीके से हुआ था कि दुश्मन के निगरानी उपकरणों और निगरानी तंत्र को हमारे दलों की भनक नहीं लगी। हमारे दल उस स्थान पर 25 घंटे से भी ज्यादा समय तक तैनात रहे और 25 अगस्त को सुबह सात बजकर 55 मिनट पर उन्होंने आतंकवादियों को नियंत्रण रेखा पार करते हुए देखा। इस दौरान नवीनतम हवाई और जमीनी संवेदकों और निगरानी उपकरणों से आतंकवादियों की गतिविधि पर निगरानी सुनिश्चित की गई। सुबह पौने नौ बजे आतंकवादी जब घातक दलों से 40-50 मीटर की दूरी पर रह गए तो उन पर हमला किया गया और करीब 15 मिनट तक हुई गोलीबारी में तीनों पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया गया।

तो इस प्रकार हमानी सेना तो आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित हो ही रही है बात नौसेना की करें तो उसकी भी क्षमता में जोरदार इजाफा होने वाला है। स्वदेश निर्मित विमानवाहक युद्धपोत विक्रांत को दो सितंबर को नौसेना की सेवा में शामिल किया जायेगा। युद्धपोत को नौसेना में शामिल करने के लिए होने वाले हाईप्रोफाइल कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिस्सा लेंगे। इस पोत का वजन 45,000 टन है। इसे कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड में रखा गया है, जहां इसे निर्मित किया गया है। स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत को नौसेना की सेवा में शामिल किये जाने के बाद इस पर विमानों को उतारने का परीक्षण किया जाएगा। इस पोत पर तीन महीने के लिए दवाइयां और सर्जरी में उपयोग आने वाले उपकरण सदा उपलब्ध होंगे। पोत पर तीन रसोई होंगी जो इसके चालक दल के 1,600 सदस्यों के भोजन की जरूरतों को पूरा करेंगी। इस पोत का डिजाइन नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है और इसका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र की शिपयार्ड कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। पोत 262 मीटर लंबा और 62 मीटर चौड़ा है तथा इसकी अधिकतम गति 28 नॉट है। विक्रांत में करीब 2,200 कंपार्टमेंट हैं, जो इसके चालक दल के करीब 1,600 सदस्यों के लिए हैं जिनमें महिला अधिकारी और नाविक भी शामिल हैं। हम आपको बता दें कि विक्रांत ने पिछले साल 21 अगस्त से अब तक समुद्र में परीक्षण के कई चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

बहरहाल, भारत सरकार तीनों सेनाओं का आधुनिकीकरण करते हुए इनको आत्मनिर्भर बनाने पर भी पूर जोर दे रही है। इसीलिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर दोहराया है कि भारत अब कमजोर नहीं रहा और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा और साख तेजी से बढ़ी है।

-नीरज कुमार दुबे 

अन्य न्यूज़