पुतिन ने अपनी सेना को साजोसामान तो खूब दिया पर वो हिम्मत नहीं दी जो युद्ध जिता सके

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एक ओर, रूसियों सहित दुनिया के लोग पुतिन पर सवाल उठा रहे हैं तो दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को सराह रहे हैं क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया है कि सामने वाले को अपने हौसलों से भी मात दी जा सकती है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपनी सेना के आधुनिकीकरण के लिए तो बहुत कुछ किया लेकिन सोवियत काल से सेना में व्याप्त कई कमियों को दूर नहीं किया जिसका परिणाम अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है। पुतिन ने अपनी सेना और हथियारों पर भरोसा करके यूक्रेन के साथ युद्ध तो छेड़ दिया लेकिन इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है। रूस दुनिया में अलग-थलग तो पड़ा ही है साथ ही रूसी सैन्य रणनीतियों और रूसी सेना के पराक्रम पर भी सवाल उठने लगे हैं क्योंकि यूक्रेन कई उन इलाकों को वापस ले चुका है जोकि रूसी नियंत्रण में चले गये थे।

यूक्रेन में इमारतें भले गिर गयी हैं लेकिन इस देश के हौसले युद्ध के पहले दिन के जैसे बुलंद हैं। दुनिया के बड़े देशों ने भले शुरू में यूक्रेन को सिर्फ जुबानी सहयोग दिया था लेकिन अब अमेरिका, ब्रिटेन तथा कई अन्य देशों की ओर से यूक्रेन को युद्धक हथियारों, सैन्य साजोसामान और बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज देकर उसकी भरपूर मदद की जा रही है। इसके अलावा मानवीय सहायता तो यूक्रेन को भारत समेत कई देशों से लगातार मिल ही रही है।

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एक ओर, रूसियों सहित दुनिया के लोग पुतिन पर सवाल उठा रहे हैं तो दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को सराह रहे हैं क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया है कि सामने वाले को अपने हौसलों से भी मात दी जा सकती है। हिंदी फिल्मों का एक डॉयलॉग बहुत मशहूर है- हार के जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं लेकिन अब इसे बदल कर कर देना चाहिए- हार के जीतने वाले को वोलोदिमीर जेलेंस्की कहते हैं।

हम आपको बता दें कि जेलेंस्की युद्ध के पहले दिन से ही सेना और नागरिकों का मनोबल बढ़ाने में लगे हुए हैं और लगातार ऑनलाइन संबोधनों के जरिये देश को जीत के प्रति आश्वस्त भी करते रहते हैं। जेलेंस्की सिर्फ राष्ट्रपति कार्यालय में ही नहीं बैठे रहते बल्कि वह सड़कों पर और आमजनों के बीच रहते हैं। जेलेंस्की ने हाल ही में जब रूसी कब्जे से मुक्त कराये गये शहर इजिअम का दौरा किया था तो उनकी खुशी देखते ही बनती थी। इस दौरान उन्होंने अपनी सेना का अभिनंदन भी किया। इजिअम शहर से आई तस्वीरों को देखें तो पता चलता है कि वहां स्थित सिटी हॉल भले ही जलकर तबाह हो चुका है, लेकिन यूक्रेन का झंडा अब वहां उसके सामने शान से लहरा रहा है। उल्लेखनीय है कि रूसी सैनिकों ने पिछले हफ्ते युद्धग्रस्त इजिअम शहर को छोड़ दिया था, क्योंकि यूक्रेन ने एक व्यापक जवाबी कार्रवाई की थी। इसके अलावा कुछ दिन पहले ही यूक्रेन के सैनिकों ने देश के उत्तरपूर्वी खारकीव क्षेत्र के विशाल इलाकों को फिर से अपने कब्जे में ले लिया था।

जहां तक रूस की बात है तो एक चीज स्पष्ट है कि सत्तावादी अक्सर सेना के जरिये शासन करते हैं। पुतिन की सत्ता को बनाए रखने में भी सेना एक प्रमुख स्तंभ है। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। पुतिन के नेतृत्व और रूसी सेना की रणनीति और पराक्रम पर कभी इतने सवाल नहीं उठे जितने इस समय उठ रहे हैं। रूसी कब्जे वाले क्षेत्र में यूक्रेन की धमाकेदार प्रगति ने इस युद्ध की दिशा ही बदल कर रख दी है जिससे पूरा रूसी नेतृत्व हैरान है। साफ दिख रहा है कि यूक्रेन से निपटने में रूस अपनी सेना का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने में विफल रहा है। इसके अलावा यूक्रेन ने रूस के कमांड-एंड-कंट्रोल बुनियादी ढांचे पर प्रहार करके जो दर्द दिया है वह रूस को भुलाए नहीं भूलेगा।

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यूक्रेनी सेना भौतिक और बौद्धिक रूप से भी रूसी सेना को मात दे रही है। खारकीव में यूक्रेन की जवाबी हमले की सफलता दर्शाती है कि रूसी खुफिया तंत्र कितना विफल रहा है। इस विफलता के कारण रूस को इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपनी सेना की तैनाती की योजना में फेरबदल करने पर मजबूर होना पड़ा। सेना विफल होती है तो नेतृत्व करने वाले पर गाज गिरती ही है। इसीलिए रूस ने क्षेत्र के प्रभारी लेफ्टिनेंट जनरल रोमन बर्डनिकोव को बर्खास्त कर दिया। लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला। रूस की सेना के कमांडर-इन-चीफ राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी विफलता की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

रूस की थल और वायु सेना में भी समन्वय और सही तालमेल नहीं दिख रहा है। दूसरी तरफ यूक्रेन को देखें तो उसने जब भी जरूरत पड़ी है तब तेजी से प्रतिक्रिया करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। इसके अलावा युद्ध की शुरुआत से ही रूसी कमांडरों में आत्मविश्वास की कमी स्पष्ट रूप से सामने दिखी जिसने अग्रिम मोर्चे पर डटे सैनिकों का मनोबल गिराने का काम किया। यही नहीं, दुश्मन की गोलाबारी में रूस ने अपने कई वरिष्ठ अधिकारियों को खो दिया है। इस युद्ध में रूसी सेना के अब तक के प्रदर्शन पर गौर करें तो एक बात और साफतौर पर उभर कर आती है कि रूसी सेना आज भी कठोर कमान संरचनाओं में फंसी हुई है। विफलता का ऐसा डर रूसी सेना के मन में बैठा हुआ है जोकि उसे युद्ध के मैदान में जोखिम लेने या प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता है। यही नहीं अब तो रूसी सेना के फील्ड कमांडरों के तेजी से निर्णय लेने की क्षमता पर भी संदेह होने लगा है। ऐसा लग रहा है कि ऊपर से मिलने वाले आदेशों का ही पालन करने के चक्कर में रूसी सेना अपना सबकुछ खो देगी।

वहीं यूक्रेन को मिल रही सफलता के पीछे वहां की सेना का ही मुख्य तौर पर योगदान है। आपने शायद ऑलेक्ज़ेंडर सिर्स्की के बारे में कभी नहीं सुना होगा। लेकिन हम आपको बता दें कि कर्नल जनरल सिर्स्की 21वीं सदी के अब तक के सबसे सफल जनरल होने के दावेदार हो सकते हैं। पूर्वी यूक्रेन में इस सप्ताह के ऑपरेशन की कमान उन्होंने ही संभाली थी और इसे यूक्रेन की सेना की अब तक की सबसे बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

बहरहाल, देखा जाये तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पूरे यूक्रेन को अपने कब्जे में लेने का सपना धूमिल हो गया है। वहीं यूक्रेन के सहयोगी देश और दानदाता अब आश्वस्त हो सकते हैं कि यूक्रेनी कमांडर न केवल अपनी रक्षा में बल्कि महत्वपूर्ण रूप से अपनी भूमि को फिर से वापस लेने में सक्षम हैं। यह युद्ध कब खत्म होगा यह तो पता नहीं लेकिन इसने अपने आपको शक्तिमान समझने वालों का घमंड जरूर चूर-चूर कर दिया है।

- नीरज कुमार दुबे

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