शहादत को प्रान्तीय नजर से देख कर गलती कर बैठे अखिलेश

सियासत, पूर्वाग्रह और वोटबैंक की राजनीति किसी भी स्तर तक जा सकती है। लेकिन स्वतंत्र भारत में शायद यह पहला अवसर है जब किसी जिम्मेदार नेता ने शहादत को प्रान्तीय नजरिये से देखा है।

आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा में लगे सैनिकों के प्रति गर्व राष्ट्रीय सहमति का विषय है। यही कारण है कि जब कोई सैनिक शहीद होता है तो पूरा देश उसके प्रति सम्मान व्यक्त करता है। इसे पूरे देश की अपूरणीय क्षति माना जाता है। प्रान्तीय सीमायें कोई मायने नहीं रखतीं। सैनिक देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। जान की बाजी लगा देते हैं। इस तरह स्वाभाविक रूप में उनके प्रति लोगों का भावनात्मक लगाव हो जाता है।

सियासत, पूर्वाग्रह और वोटबैंक की राजनीति किसी भी स्तर तक जा सकती है। लेकिन स्वतंत्र भारत में शायद यह पहला अवसर है जब किसी जिम्मेदार नेता ने शहादत को प्रान्तीय नजरिये से देखा है। अखिलेश यादव कुछ दिन पहले तक उ0प्र0 प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वह आज भी संवैधानिक संस्था विधान परिषद के सदस्य हैं और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संसद के दोनों सदनों में उनकी पार्टी की मौजूदगी है। उ0प्र0 में सत्ता से हटने के बाद मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा मिला है। ये सभी बातें उनकी जिम्मेदारी को बढ़ा देती हैं। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि अखिलेश के पिता देश के रक्षा मंत्री रह चुके हैं। यह ठीक है कि उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया जा चुका है। लेकिन अखिलेश को यह ध्यान रखना चाहिए कि मुलायम रक्षा विभाग की कार्यप्रणाली से परिचित हैं। इसमें सैनिकों की तैनाती सियासी आधार पर नहीं होती है। मुलायम ने आज तक ऐसा कोई बयान नहीं दिया। इसके अलावा अखिलेश ने कांग्रेस से गठबंधन किया है। कांग्रेस भले ही दयनीय अवस्था में है, लेकिन आज भी वह राष्ट्रीय पार्टी है। कई प्रदेशों में उसकी सरकार है। गुजरात में वह मुख्य विपक्षी पार्टी है। ऐसे में अखिलेश के बयान से कांग्रेस का असहज होना स्वाभाविक है। अखिलेश ने प्रश्न किया था कि गुजरात के सैनिक शहीद क्यों नहीं होते हैं। शहादत को प्रान्तीय सीमा में बांधने का यह अनुचित प्रयास था।

वैसे अखिलेश यादव को गुजरात के शहीदों के परिजन जवाब दे रहे हैं। उन्हें न चाहते हुए भी संख्या बतानी पड़ रही है। अखिलेश ने उनके जख्मों को कुरेदा है। इस संबंध में कुछ अन्य तथ्यों पर भी ध्यान रखना चाहिए था। उ0प्र0 की आबादी गुजरात के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है। दूसरी बात यह कि जवानों की बहादुरी या शहादत प्रान्तीय स्तर की बात नहीं होती। अखिलेश ने इसे राष्ट्रीय स्तर से प्रान्तीय बनाने का जो प्रयास किया है, वह शहीदों व उनके परिजनों के प्रति अपमानजनक है।

यह भी समझना होगा कि अखिलेश ने गुजरात का ही नाम क्यों लिया। वह कुछ अन्य प्रान्तों का भी नाम ले सकते थे। लेकिन तब शायद शहादत पर सियासी मकसद पूरा नहीं होता। अखिलेश ने यह भी दिखाया कि युवा होने के बावजूद उनमें नई सोच का अभाव है। केवल नरेन्द्र मोदी को निशाने पर लेने के लिये गुजरात का नाम लिया जाता है। यह राजनीति मोदी के मुख्यमंत्री बनने के साथ शुरू हो गयी थी। आज तक जारी है। डेढ़ दशक से यह माना जा रहा है कि अपने को सेक्यूलर साबित करने के लिये गुजरात की आलोचना जरूरी है। सेक्यूलर जमात के नेता यही करते हैं। अखिलेश भी इस घिसी−पिटी लकीर पर चलते दिखाई दिये।

इसके अलावा शिवपाल सिंह यादव की मुहिम के जवाब में भी अखिलेश ने गुजरात का नाम लिया। शिवपाल इस समय मुलायम के नेतृत्व में सेक्यूलर मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या यह संयोग नहीं था कि जब शिवपाल मोर्चा बनाने हेतु दिल्ली प्रवास पर जाने वाले थे, उसके ठीक पहले अखिलेश का गुजरात संबंधी बयान आया। इस क्रम में दो प्रसंगों का उल्लेख भी किया जा सकता है। कुछ दिन पहले अखिलेश अपने समर्थकों के साथ एक शहीद के परिवार में संवेदना व्यक्त करने गये थे। वहां पता चला कि शहीद के माता पिता सेना के एक उच्च अधिकारी के साथ कतिपय दस्तावेज पर लिखापढ़ी कर रहे हैं। इसलिये सेना के बाहर तैनात जवानों ने उन्हें कुछ मिनट इंतजार करने को कहा। इससे अखिलेश नाराज हुए कहा कि कमाण्डर क्या उनसे बड़ा है। वह कमरे में चले गये। क्या यह आचरण शहीदों के परिजनों के प्रति शिष्टाचार या शालीनता का था। शहीद के माता−पिता दिल पर पत्थर रखकर औपचारिक कागजों को देख रहे होंगे। दुख व संवेदना का माहौल रहा होगा। अखिलेश कुछ मिनट इंतजार करते तो उनका बड़प्पन होता। इसके बाद जब वह बाहर निकले तो अखिलेश के समर्थन में नारेबाजी होने लगी। किसी ने उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया। जाहिर है कि यह शहीदों के प्रति सम्मान नहीं था।

दूसरी बात यह कि चुनाव में गुजरात के नाम लेने को भी याद रखना चाहिए था। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उ0प्र0 चुनाव में अखिलेश ने गुजरात के गधों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने अमिताभ बच्चन को सुझाव दिया कि वह गुजरात के गधों का प्रचार न करें। ये बात अलग है कि अमिताभ के विज्ञापन से जितना प्रचार नहीं हुआ था उतना अखिलेश के बयान से हो गया। इस बयान से अखिलेश को नुकसान भी हुआ। इस ताजा प्रकरण को इतनी जल्दी भूलना नहीं चाहिए था। गुजरात भी देश का अंग है। नकारात्मक राजनीति के लिये उसका नाम लेना अनुचित है। शहादत पर प्रान्तीय भेदभाव उससे भी ज्यादा गलत है। 

- डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

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