जब अभ्यारण्य के बाघ कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं तो पालतू पशु भी हो सकते हैं

जब अभ्यारण्य के बाघ कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं तो पालतू पशु भी हो सकते हैं

गांव में तो और भी लापरवाही है। कोई निर्देश नहीं मान रहा। बुखार−खांसी के मरीज अपनी जांच नहीं करा रहे। घूमने−फिरने से बाज नहीं आ रहे। इन्हें जांच कराने को कहना उम्र भर की दुश्मनी लेना है। इनमें कई संक्रमित दूसरों को भी संक्रमित कर सकते हैं।

महामारी बन चुका कोरोना नए−नए रूप ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उसे बहुरुपिया बता चुके हैं। कोरोना से जुड़ी ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस बीमारी पता चल ही चुकी हैं। अब येलो फंगस भी आ गया। अब तक कोरोना बुजुर्ग का काल बना था। कहा जा रहा है कि तीसरे चरण में ये बच्चों का काल बनकर उतरेगा।

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इस महामारी के नए−नए रूप, नए परिवर्तन पर हमको अभी से नजर रखनी होगी। इसे फैलाने वाल वाहक को भी रोकना होगा। अब तक वैज्ञानिक कह रहे थे कि पशुओं से इंसान को कोरोना का खतरा नहीं है। पर इटावा सफारी में दो मादा बाघ के कोरोना संक्रमित मिलने से उनके दावे की पोल खुल जाती है। साथ ही मानव के लिए चिंता पैदा हो जाती है। यदि अभ्यारण्य के बाघ संक्रमित हो सकते हैं तो पालतू पशु क्यों नहीं ? स्ट्रीट एनिमल क्यों नहीं ? दूसरे अगर कोरोना का वायरस अभ्यारण्य के प्राणियों को प्रभावित कर सकता है तो सड़क पर घूमने वाले पशुओं में क्यों नहीं आ सकता ? पक्षियों में क्यों नहीं जा सकता ?

कोरोना के संक्रमण को देखते हुए हम मास्क लगाने लगे। दो गज की दूरी का भी पालन करने लगे। बार−बार हाथ धोने लगे। साफ-सफाई पर बहुत ध्यान देने लगे। बार−बार इतना सब होने के बाद भी घर पर आइसोलेट हुए लोगों के कोरोना संक्रमित मास्क, उनके द्वारा प्रयोग किए डिस्पोजल सामान, उनके कपड़े, प्रयोग की गयीं दवाइयों के रेपर आदि को हम सड़क के किनारे फेंक देते हैं या कूड़ेदान में डाल देते हैं। आवारा पशु इस सामान में अपना भोजन तलाशते हैं। ऐसा संभव नहीं है कि कोरोना संक्रमित द्वारा प्रयोग किए गए सामान के बैक्टीरिया इन पशु−पक्षियों तक न पहुँचे ? यदि बैक्टीरिया इन पशु−पक्षी तक पहुँचे तो फिर उनसे स्वस्थ व़्यक्ति पर न पहुँचेंगे, ये कैसे संभव है ?

अब तक हम लॉकडाउन लगाकर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में जा रहे संक्रमण को रोकने का प्रयास कर रहे हैं। इन आवारा और पालतू पशुओं से आने वाले संक्रमण पर तो ध्यान दे ही नहीं रहे। राह चलते सड़क पर पड़े कोरोना पीड़ित के मास्क पर पड़ा हमारा जूता और चप्पल कोरोना के बैक्टिरिया हमारे घर में ले आएगा, इस ओर हम ध्यान नहीं देते हैं। सफाई कर्मी भी इस कूड़े को आम कूड़े के साथ उठा रहे हैं। इससे उनके और उनके परिवार के संक्रमित होने का खतरा ज्यादा बढ़ रहा है।

गांव में तो और भी लापरवाही है। कोई निर्देश नहीं मान रहा। बुखार−खांसी के मरीज अपनी जांच नहीं करा रहे। घूमने−फिरने से बाज नहीं आ रहे। इन्हें जांच कराने को कहना उम्र भर की दुश्मनी लेना है। इनमें कई संक्रमित दूसरों को भी संक्रमित कर सकते हैं।

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कोई कुछ भी कहे पर बरेली में मौजूद भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) के वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्यादातर जानवर, घरों के भीतर, जू या वाइल्ड सेंचुरी में संक्रमित इंसानों के करीब आने से ही कोरोना से इन्फेक्टेड होते हैं। इन्होंने इस संबंध में एक एडवाइजरी भी जारी की है कि पालतू जानवरों को भी परिवार का सदस्य मानकर उन्हें कोरोना से बचाना चाहिए।

पालतू के बारे में कुछ शहरी पशुपालक भले ही मान लें। गांव में तो कोई मानने और सुनने वाला नहीं है। इसके साथ ही आवारा घूमने वाले पशुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है। बताया जा रहा है कि ब्लैक फंगस इडस्ट्रियल गैस के सिलेंडर से फैला। इसलिए यह भी ध्यान रखना होगा कि ये पशुओं से इंसान तक न जा पाए। इसके लिए तैयारी भी अभी से करनी होगी। यह महामारी है। महायुद्ध है। इसकी तैयारी में लापरवाही जाने कितनों की जान ले सकती है।

-अशोक मधुप