ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  जनवरी 21, 2021   13:23
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ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं।

कड़कड़ाती कड़ाके की हाड़ कंपकंपा देने वाली भयंकर शीतलहर में हमारे देश का अन्नदाता अपने हक को लेने के लिए सड़कों पर धरना देकर बैठा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं की सड़कों पर व देश में अन्य भागों में बहुत जगहों पर केंद्र सरकार के द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले बहुत लंबे समय से हमारे प्यारे किसान जगह-जगह पर धरनारत हैं। मसले के समाधान के लिए केंद्र सरकार से किसानों की बार-बार वार्ता होने के बाद भी अभी तक भारत सरकार व किसानों के बीच कोई भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है, किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं केंद्र सरकार बिंदुवार चर्चा करके असहमत बिंदुओं में संशोधन करने की बात कह रही है। लेकिन धरातल पर वास्तविकता यह है कि किसान संगठनों व केंद्र सरकार के बीच मामला आंदोलन के एक-एक दिन गुजरने के साथ और लंबा खिचता जा रहा है, जिसके चलते उतना ही यह मामला पेचीदा होकर सुलझने की जगह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा उलझता जा रहा है।

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अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को अब धीरे-धीरे दो माह होने वाले हैं, लेकिन फिर भी किसानों की समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं, जिसके चलते अब किसान आंदोलन देश के विभिन्न भागों में बहुत तेजी से विस्तार लेता जा रहा है। अब तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है, जिसने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, जो किसानों से बात करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी। हालांकि कमेटी का गठन होते ही वो सदस्यों की वजह से विवादों के दायरे में आ गयी, किसान संगठनों के कुछ नेताओं ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर कमेटी के सदस्यों के चयन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उनको तीनों कृषि कानूनों का समर्थक बताया है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसके बाद एक सदस्य ने तो कमेटी में रहने से इंकार ही कर दिया है।

खैर हमारे देश में राजनीति जो करवा दे वो भी कम है, लेकिन अब देश में किसानों का हितैषी बनने को लेकर के पक्ष विपक्ष व निष्पक्ष लोगों के बीच में जबरदस्त चर्चा के साथ किसान राजनीति अपने चरम पर है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनका हक ना देने वाले राजनीतिक दलों से लेकर के हर कोई अपने आपको अन्नदाता किसानों का कट्टर हितैषी दिखाने पर लगा हुआ है। वैसे विचारणीय बात यह है कि जिस तरह से देश में आजादी के बाद से ही गरीबी को खत्म करने के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं चलाई गयीं और हर वक्त राजनीतिक दलों के द्वारा उनका श्रेय लेने में भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती है ठीक उसी प्रकार से ही किसानों के नाम पर भी देश में आजादी के बाद से यही स्थिति है, राजनीतिक दल हमेशा श्रेय लेने से चूके नहीं हैं। लेकिन अफसोस फिर भी सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि ना तो देश से गरीबी समाप्त होने का नाम ले रही है और ना ही हमारे अन्नदाता किसानों को भी उनकी समस्याओं का समाधान व हक अभी तक मिल पा रहा है। हाँ, देश में लंबे समय से गरीब व किसानों का हितैषी बनने के लिए राजनीतिक लोगों के द्वारा केवल और केवल हर वर्ष की आंकड़ेबाजी अवश्य जारी है। आंकड़ों की बाजीगरी व धरातल के हालातों में बहुत अंतर होने के कारण उत्पन्न आक्रोश की वजह से ही किसान अब सड़कों पर उतरे हुए हैं और वो अब अपने हक के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते ही वो दिल्ली की सीमाओं के साथ देश के अन्य भागों में अपना घर-बार छोड़कर अनिश्चितकालीन लंबे धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार व आम जनमानस का अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

उसी क्रम में कुछ किसान संगठन राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर दिल्ली की आउटर रिंगरोड व देश के विभिन्न भागों में ट्रैक्टर परेड के आयोजन करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहे हैं। जिसको लेकर केंद्र सरकार व देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन 26 जनवरी पर किसी भी अनहोनी की आशंका को रोकने के लिए सरकार व सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हैं। 'केन्द्र सरकार तो ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक चली गयी है, जिस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबडे ने कहा, 'दिल्ली में रैली निकाले जाने के मामले में हमने पहले ही कहा था कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और यह पुलिस को देखना है।' उन्‍होंने कहा, 'यह देखना पुलिस का काम है, कोर्ट का नहीं कि कौन दिल्ली में प्रवेश करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा!' सीजेआई ने कहा कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, हमें बताने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली पुलिस गणतंत्र दिवस की गरिमा सुनिश्चित करे।

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वहीं अब किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग के तार खालिस्तानी संगठनों से जुड़ने के अंदेशों को देखते हुए जांच करने के लिए देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी एनआईए भी एक्टिव हो गयी है। सूत्रों के अनुसार उसने किसान संगठनों के कुछ शीर्ष नेताओं व अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजे हैं। जिसके बाद उत्पन्न हालात को देखकर हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक सरकार व किसानों के बीच भविष्य में टकराव का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। किसानों के द्वारा ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा के बाद से ही देश के अधिकांश आम लोगों के मन में एक विचार बहुत तेजी से कौंध रहा है कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर क्या सुरक्षा की दृष्टि से किसानों का इस तरह से ट्रैक्टर परेड निकालना उचित है?

क्या किसानों का ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम बहुत अधिक जोखिम भरा नहीं है?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि सुरक्षा एजेंसी के जरिये उन्हें जानकारी मिली है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर परेड निकालने वाले हैं। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्ता के इस महत्वपूर्ण समारोह को प्रभावित करना है, हालांकि किसान संगठन समारोह में किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की रणनीति से इंकार कर रहे हैं, वो केवल गरिमापूर्ण ढंग से परेड निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन पूर्व में जिस तरह से कुछ लोगों की वजह से किसानों के धरने के बीच ही देश को तोड़ने की बात करने वाले लोगों के फोटो लगे थे उस घटना से सबक लेकर अब किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड के दौरान अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी, उनको आत्ममंथन करना होगा कि क्या किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में आये ट्रैक्टरों के बीच अनुशासन बना कर रख सकते हैं, क्योंकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में कोई भी देश विरोधी घटना घटित ना हो पाये इसको रोकने की जिम्मेदारी किसानों की खुद होगी, क्योंकि अगर कोई भी घटना घटित हो जाती है तो भविष्य में किसान आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगने का काम हो सकता है और वैसे भी यह हमारे प्यारे देश की आन-बान-शान व अस्मिता के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। किसान संगठनों व उससे जुड़े लोगों को ध्यान रखना होगा कि धरना प्रदर्शन करने का उनका अधिकार है। तो यह ध्यान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है कि आंदोलन व परेड के दौरान कोई ऐसी घटना घटित ना हो जाये जिससे कि कोई देशद्रोही व्यक्ति देश की मान प्रतिष्ठा को इस किसान आंदोलन की आड़ में धूमिल करने का दुस्साहस कर सके। एक वीर जाबांज जवान की तरह देश के लिए सभी कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहने वाले अन्नदाता किसानों को हर हाल में देश की आन-बान-शान व स्वाभिमान का ध्यान रखना होगा।

-दीपक कुमार त्यागी

(स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार)







कोरोना की मार दुनिया के अधिकतर देशों के शिक्षा बजट पर पड़ी है

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  मार्च 6, 2021   15:17
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कोरोना की मार दुनिया के अधिकतर देशों के शिक्षा बजट पर पड़ी है

वैक्सीन आने के बाद यह समझा जा रहा था कि अब कोरोना पर काबू पा लिया जाएगा पर कोरोना की लगभग एक साल की यात्रा के बाद स्थिति में वापस बदलाव आने लगा है और जिस तरह से कोरोना पॉजिटिव केसों में कमी आने लगी थी उस पर विराम लगने के साथ ही नए केस आने लगे हैं।

कोरोना की मार का असर अब शिक्षा व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारों ने शिक्षा के बजट में कटौती की है। खासतौर से शिक्षा बजट में कमी निम्न व निम्न मध्यम आय वाले देशों ने की है तो उच्च व मध्यम उच्च आय वाले देशों में से कई देश भी शिक्षा बजट में कटौती करने में पीछे नहीं रहे हैं। रिपोर्ट में 65 प्रतिशत देशों द्वारा महामारी के बाद शिक्षा के बजट में कमी की बात की गई है। संभव है इसमें अतिश्योक्ति हो पर यह साफ है कि कोरोना महामारी का असर शिक्षा के क्षेत्र में साफ रूप से दिखाई दे रहा है। देखा जाए तो कोरोना के कारण सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। जहां एक ओर आज भी सब कुछ थमा-थमा-सा लग रहा हैं वहीं कोरोना की दूसरी लहर और अधिक चिंता का कारण बनती जा रही है।

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कोरोना वैक्सीन आने के बाद यह समझा जा रहा था कि अब कोरोना पर काबू पा लिया जाएगा पर कोरोना की लगभग एक साल की यात्रा के बाद स्थिति में वापस बदलाव आने लगा है और जिस तरह से कोरोना पॉजिटिव केसों में कमी आने लगी थी उस पर विराम लगने के साथ ही नए केस आने लगे हैं। हालांकि समग्र प्रयासों से दुनिया के देशों में उद्योग धंधे पटरी पर आने लगे हैं, अर्थव्यवस्था में सुधार भी दिखाई देने लगा है पर अभी भी कुछ गतिविधियां ऐसी हैं जो कोरोना के कारण अधिक ही प्रभावित हो रही हैं। इसमें शिक्षा व्यवस्था प्रमुख है। भारत सहित कई देशों में स्कुल खुलने लगे हैं तो उनमें बड़ी कक्षा के बच्चों ने आना भी शुरू किया है पर अभी तक पूरी तरह से शिक्षा व्यवस्था के पटरी पर आने का काम दूर की कौड़ी दिख रही है।

लगभग एक साल से शिक्षा व्यवस्था ठप्प-सी हो गई है। प्राइमरी से उच्च शिक्षा व्यवस्था तक को पटरी पर लाना सरकारों के सामने बड़ी चुनौती है। क्योंकि कोरोना के दौर में ऑनलाइन शिक्षा के भले ही कितने ही दावे किए गए हों पर उन्हें किसी भी स्थिति में कारगर नहीं माना जा सकता। इसका एक बड़ा कारण दुनिया के अधिकांश देशों में सभी नागरिकों के पास ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा नहीं है। इंटरनेट सुविधा और फिर इसके लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता लगभग नहीं के बराबर है। इसके साथ ही स्कूल कॉलेज खोलना किसी चुनौती से कम नहीं है। कोरोना प्रोटोकाल की पालना अपने आप में चुनौती है, ऐसे में आवश्यकता तो शिक्षा बजट को बढ़ाने की है पर उसके स्थान पर शिक्षा बजट में कटौती शिक्षा के क्षेत्र में देश दुनिया को पीछे ले जाना ही है। आवश्यकता तो यह थी कि कोरोना प्रोटोकाल की पालना सुनिश्चित कराने पर जोर देते हुए शिक्षण संस्थाओं को खोलने की बात की जाती। इसके लिए कक्षाओं में एक सीमा से अधिक विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था ना होने, थर्मल स्कैनिंग की व्यवस्था, सैनेटाइजरों की उपलब्धता और अन्य सावधानियां सुनिश्चित करने की व्यवस्था अतिरिक्त बजट देकर की जानी चाहिए थी।

इसी तरह से अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया जाना चाहिए था क्योंकि ऑनलाइन क्लासों के कारण बच्चों में सुनाई देने में परेशानी जैसे साइड इफेक्ट सामने आने लगे हैं। ऑनलाइन पढ़ाई की गुणवत्ता और उसके परिणाम भी अधिक उत्साहवर्द्धक नहीं हैं। अपितु बच्चों में मोबाइल व लैपटॉप के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। कोरोना के कारण येन-केन प्रकारेण बच्चों को प्रमोट करने के विकल्प से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। इसके लिए औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था करनी ही होगी। दुनिया के देशों की सरकारों को इस दिशा में गंभीर विचार करना ही होगा। गैरसरकारी संस्थाओं को भी इसके लिए आगे आना होगा क्योंकि यह भावी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है तो दूसरी और स्वास्थ्य मानकों की पालना भी जरूरी हो जाता है।

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केवल और केवल फीस लेने या नहीं लेने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि निम्न व निम्न मध्यम आय वाले देशों या यों कहें कि अविकसित, अल्प विकसित, विकासशील देश ही नहीं अपितु विकसित देशों के सामने भी कोरोना नई चुनौती लेकर आया है। सभी देशों में बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है। परिजनों की अभी भी बच्चों को स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं हो रही है। आधारभूत सुविधाएं व संसाधन होने के बावजूद विकसित देशों में भी शिक्षा को पटरी पर नहीं लाया जा सका है। कोरोना प्रोटोकाल के अनुसार मास्क, सैनेटाइजर, थर्मल स्केनिंग और दूरी वाली ऐसी स्थितियां हैं जिसके लिए अतिरिक्त बजट प्रावधान की आवश्यकता है। यह सभी आधारभूत व्यवस्थाएं व संसाधन उपलब्ध कराना मुश्किल भरा काम है तो दूसरी और शिक्षण संस्थाओं द्वारा यह अपने संसाधनों से जुटाना आसान नहीं है। अभिभावकों से इसी राशि को वसूलना भी कोरोना महामारी से टूटे हुए लोगों पर अतिरिक्त दबाव बनाने के समान ही होगा। आम आदमी वैसे ही मुश्किलों के दौर से गुजर रहे हैं। नौकरियों के अवसर कम हुए हैं तो वेतन कटौती का दंश भुगत चुके हैं। अनेक लोग बेरोजगार हो गए हैं। ऐसे में शिक्षा को बचाना बड़ा दायित्व हो जाता है। इसके लिए दुनिया के देशों की सरकारों को कहीं ना कहीं से व्यवस्थाएं करनी ही होंगी। संयुक्त राष्ट्र संघ को भी इसके लिए आगे आना होगा। शिक्षा को बचाना हमारा सबका दायित्व हो जाता है।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







मध्यप्रदेश की सेवा मुख्यमंत्री नहीं, अभिभावक के रूप में कर रहे हैं शिवराज

  •  मनोज कुमार
  •  मार्च 5, 2021   12:15
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मध्यप्रदेश की सेवा मुख्यमंत्री नहीं, अभिभावक के रूप में कर रहे हैं शिवराज

मध्यप्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री रहने का एक रिकार्ड तेरह वर्षों का है तो दूसरा रिकार्ड चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाने का है। साल 2018 के चुनाव में मामूली अंतर से शिवराजसिंह सरकार की पराजय हुई तो लोगों को लगा कि शिवराजसिंह का राजनीतिक वनवास का वक्त आ गया है।

नए मध्यप्रदेश की स्थापना के लगभग 7 दशक होने को आ रहे हैं। इस सात दशकों में अलग-अलग तेवर और तासीर के मुख्यमंत्रियों ने राज्य की सत्ता संभाली है। लोकोपयोगी और समाज के कल्याण के लिए अलग-अलग समय पर योजनाओं का श्रीगणेश होता रहा है और मध्यप्रदेश की तस्वीर बदलने में कामयाबी भी मिली है। लेकिन जब इन मुख्यमंत्रियों की चर्चा करते हैं तो सालों-साल आम आदमी के दिल में अपनी जगह बना लेने वाले किसी राजनेता की आज और भविष्य में चर्चा होगी तो एक ही नाम होगा शिवराजसिंह चौहान। 2005 में उनकी मुख्यमंत्री के रूप में जब ताजपोशी हुई तो वे उम्मीदों से भरे राजनेता के रूप में नहीं थे और ना ही उनके साथ संवेदनशील, राजनीति के चाणक्य या स्वच्छ छवि वाला कोई विशेषण नहीं था। ना केवल विपक्ष में बल्कि स्वयं की पार्टी में उन्हें एक कामचलाऊ मुख्यमंत्री समझा गया था। शिवराज सिंह की खासियत है वे अपने विरोधों का पहले तो कोई जवाब नहीं देते हैं और देते हैं तो विनम्रता से भरा हुआ। वे बोलते खूब हैं लेकिन राजनीति के मंच पर नहीं बल्कि अपने लोगों के बीच में। आम आदमी के बीच में। ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जिनके नाम के साथ कोई संबोधन नहीं था, आज वही राजनेता बहनों का भाई और बेटियों का मामा बन गया है। यह विशेषण इतना स्थायी है कि वे कुछ अंतराल के लिए सत्ता में नहीं भी थे, तो उन्हें मामा और भाई ही पुकारा गया। कायदे से देखा जाए तो वे मुख्यमंत्री नहीं, एक अभिभावक की भूमिका में रहते हैं।

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मध्यप्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री रहने का एक रिकार्ड तेरह वर्षों का है तो दूसरा रिकार्ड चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाने का है। साल 2018 के चुनाव में मामूली अंतर से शिवराजसिंह सरकार की पराजय हुई तो लोगों को लगा कि शिवराजसिंह का राजनीतिक वनवास का वक्त आ गया है। लेकिन जब वे ‘टायगर जिंदा है’ का हुंकार भरी तो विरोधी क्या, अपने भी सहम गए। राजनीति ने करवट ली और एक बार फिर भाजपा सत्तासीन हुई। राजनेता और राजनीतिक विश्लेषक यहां गलतफहमी के शिकार हो गए. सबको लगा कि अब की बार नया चेहरा आएगा। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को पता था कि प्रदेश की जो स्थितियां है, उसे शिवराजसिंह के अलावा कोई नहीं संभाल पाएगा। देश की नब्ज पर हाथ रखने वाले मोदी-शाह का फैसला वाजिब हुआ। कोरोना ने पूरी दुनिया के साथ मध्यप्रदेश को जकड़ रखा था। पहले से कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था। संकट में समाधान ढूंढने का ही दूसरा नाम शिवराजसिंह चौहान है। अपनी आदत के मुताबिक ताबड़तोड़ लोगों के बीच जाते रहे। उन्हें हौसला देते रहे। इलाज और दवाओं का पूरा इंतजाम किया। भयावह कोरोना धीरे-धीरे काबू में आने लगा। इस बीच खुद कोरोना के शिकार हो गए लेकिन काम बंद नहीं किया।

एक वाकया याद आता है। कोरोना का कहर धीमा पड़ा और लोग वापस काम की खोज में जाने लगे। इसी जाने वालों में एक दम्पत्ति भी औरों की तरह शामिल था लेकिन उनसे अलग। इस दम्पत्ति ने इंदौर में रूक कर पहले इंदौर की मिट्टी को प्रणाम किया और पति-पत्नी दोनों ने मिट्टी को माथे से लगाया। इंदौर का, सरकार और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का शुक्रिया अदा कर आगे की यात्रा में बढ़ गए। यह वाकया एक मिसाल है।

कोरोना संकट में मध्यप्रदेश से गए हजारों हजार मजदूर जो बेकार और बेबस हो गए थे, उनके लिए वो सारी व्यवस्थाएं कर दी जिनके लिए दूसरे राज्यों के लोग विलाप कर रहे थे। श्रमिकों की घर वापसी से लेकर खान-पान की व्यवस्था सरकार ने निरपेक्ष होकर की। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की पहल पर अनेक स्वयंसेवी संस्था भी आगे बढक़र प्रवासी मजदूरों के लिए कपड़े और जूते-चप्पलों का इंतजाम कर उन्हें राहत पहुंचायी। आज जब कोरोना के दूसरे दौर का संकेत मिल चुका है तब शिवराज सिंह आगे बढक़र इस बात का ऐलान कर दिया है कि श्रमिकों को मध्यप्रदेश में ही रोजगार दिया जाएगा। संभवत: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान देश के पहले अकेले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने ऐसा फैसला लिया है। उनकी सतत निगरानी का परिणाम है कि लम्बे समय से कोरोना से मृत्यु की खबर शून्य पर है या एकदम निचले पायदान पर। आम आदमी का सहयोग भी मिल रहा हैं कोरोना के दौर में लोगों को भय से बचाने के लिए वे हौसला बंधाते रहे हैं।

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वे मध्यप्रदेश को अपना मंदिर मानते हैं और जनता को भगवान। शहर से लेकर देहात तक का हर आदमी उन्हें अपने निकट का पाता है। चाय की गुमटी में चुस्की लगाना, किसानों के साथ जमीन पर बैठ कर उनके दुख-सुख में शामिल होना। पब्लिक मीटिंग में आम आदमी के सम्मान में घुटने पर खड़े होकर अभिवादन कर शिवराजसिंह चौहान ने अपनी अलहदा इमेज क्रिएट की है। कभी किसी की पीठ पर हाथ रखकर हौसला बढ़ाना तो कभी किसी को दिलासा देने वाले शिवराजसिंह चौहान की ‘शिवराज मामा’ की छवि ऐसी बन गई है कि विरोधी तो क्या उनके अपनों के पास इस इमेज की कोई तोड़ नहीं है।

सभी उम्र और वर्ग के प्रति उनकी चिंता एक बराबर है। बेटी बचाओ अभियान से लेकर बेटी पूजन की जो रस्म उन्होंने शुरू की है, वह समाज के लोगों का मन बदलने का एक छोटा सा विनम्र प्रयास है। इस दौर में जब बेटियां संकट में हैं और वहशीपन कम नहीं हो रहा है तब ऐसे प्रयास कारगर होते हैं। बेटियों को लेकर उनकी चिंता वैसी ही है, जैसा कि किसानों को लेकर है। लगातार कृषि कर्मण अवार्ड हासिल करने वाला मध्यप्रदेश अपने धरती पुत्रों की वजह से कामयाब हो पाया है तो उन्हें हर कदम पर सहूलियत हो, इस बात का ध्यान भी शिवराजसिंह चौहान ने रखा है। विद्यार्थियो को स्कूल पहुंचाने से लेकर उनकी कॉपी-किताब और फीस की चिंता सरकार कर रही है। विद्यार्थियों को समय पर वजीफा मिल जाए, इसके लिए भी कोशिश जा रही है। मध्यप्रदेश शांति का टापू कहलाता है तो अनेक स्तरों पर सक्रिय माफिया को खत्म करने का ‘शिव ऐलान’ हो चुका है। प्रदेश के नागरिकों को उनका हक दिलाने और शुचिता कायम करने के लिए वे सख्त हैं।

पहली दफा मुख्यमंत्री बन जाने के बाद सबसे पहले वेशभूषा में परिवर्तन होता है लेकिन जैत से निकला पांव-पांव वाले भैया शिवराज आज भी उसी पहनावे में हैं। आम आदमी की बोलचाल और देशज शैली उन्हें लोगों का अपना बनाती है। समभाव और सर्वधर्म की नीति पर चलकर इसे राजनीति का चेहरा नहीं देते हैं। इस समय प्रदेश आर्थिक संकट से गुजर रहा है लेकिन उनके पास इस संकट से निपटने का रोडमेप तैयार है। प्रदेश के हर जिले के खास उत्पादन को मध्यप्रदेश की पहचान बना रहे हैं तो दूर देशों के साथ मिलकर उद्योग-धंधे को आगे बढ़ा रहे हैं। आप मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की आलोचना कर सकते हैं लेकिन तर्क नहीं होगा। कुतर्क के सहारे उन्हें आप कटघरे में खड़े करें लेकिन वे आपको सम्मान देने से नहीं चूकेंगे। छोडि़ए भी इन बातों को। आइए जश्र मनाइए कि वे एक आम आदमी के मुख्यमंत्री हैं। मामा हैं, भाई हैं। ऐसा अब तक दूजा ना हुआ।

-मनोज कुमार

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)







शशिकला ने इसलिए दी है अपने राजनीतिक हितों की कुर्बानी...पर पिक्चर अभी बाकी है

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  मार्च 4, 2021   15:25
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शशिकला ने इसलिए दी है अपने राजनीतिक हितों की कुर्बानी...पर पिक्चर अभी बाकी है

शशिकला का राजनीति से दूर रहने वाला बयान इसलिए चौंका गया क्योंकि बेंगलुरू जेल से रिहा होने के बाद शशिकला ने पिछले महीने ही सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा की थी। जेल से छूटने के बाद शशिकला ने चेन्नई में जबरदस्त रोड शो भी किया था।

चुनावों के दौरान नेता या तो दल बदल कर या पुराना गठबंधन तोड़कर नया गठबंधन बनाकर राजनीतिक सनसनी फैला देते हैं या फिर चुनावों से पहले कोई बड़ी हस्ती राजनीति में एंट्री मार लेती है लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले सबको चौंकाते हुए वीके शशिकला ने राजनीति से दूर रहने का ऐलान कर सबको चौंका दिया है। अन्नाद्रमुक की निष्कासित नेता और तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता की दशकों तक करीब सहयोगी रहीं वीके शशिकला ने घोषणा की है कि ‘वह राजनीति से दूर रहेंगी’ लेकिन जयललिता के ‘स्वर्णयुगीन’ शासन के लिए प्रार्थना करेंगी। एक अप्रत्याशित और आकस्मिक ऐलान के तहत उन्होंने ‘‘अम्मा के समर्थकों’’ से भाई-बहन की तरह काम करने की अपील की और यह भी गुजारिश की कि वे यह सुनिश्चित करें कि जयललिता का ‘स्वर्णयुगीन शासन जारी रहे।’’ उन्होंने एक बयान में कहा, ''मैं राजनीति से दूर रहूंगी और अपनी बहन पुराचि थलावी (जयलिलता), जिन्हें मैं देवीतुल्य मानती हूं, और ईश्वर से अम्मा के स्वर्णयुगीन शासन की स्थापना के लिए प्रार्थना करती रहूंगी।’’ उन्होंने जयललिता के सच्चे समर्थकों से छह अप्रैल के चुनाव में एकजुट होकर काम करने और साझे दुश्मन को सत्ता में आने से रोकने की अपील की।

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शशिकला का राजनीति से दूर रहने वाला बयान इसलिए चौंका गया क्योंकि बेंगलुरू जेल से रिहा होने के बाद शशिकला ने पिछले महीने ही सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा की थी। जेल से छूटने के बाद शशिकला ने चेन्नई में जबरदस्त रोड शो भी किया था जिसे उनके शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा गया था। ऐसे में तमाम तरह की अटकलें लगायी जा रही हैं कि अचानक से ऐसा क्या हुआ कि शशिकला राजनीति से दूर हो गयीं। वह शशिकला जोकि जयललिता के जीवित रहते एक तरह से पार्टी और राज्य के शासन संबंधी निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं, वह शशिकला जिन्होंने जयललिता के निधन के बाद मुख्यमंत्री बनने का पूरा प्रयास किया लेकिन उन्हें अचानक जेल जाना पड़ गया, आखिर वह सजा पूरी होने के बाद क्यों अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने से पीछे हट गयीं? जेल से छूटने के बाद शशिकला ने अन्नाद्रमुक में वापसी के भरसक प्रयास किये लेकिन जब दाल नहीं गली तो ऐसा लग रहा था कि वह अपना मोर्चा बनाकर अन्नाद्रमुक को नुकसान पहुँचा सकती हैं। लेकिन शशिकला ने ऐसा नहीं किया।

अटकलें हैं कि शशिकला के इस अप्रत्याशित कदम की पटकथा भाजपा ने लिखी है। पहले तो भाजपा ने प्रयास किये कि शशिकला की अन्नाद्रमुक में वापसी हो जाये लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका तो शशिकला को राजनीति से दूर रहने के लिए मना लिया गया क्योंकि शशिकला अगर अपना मोर्चा खड़ा करतीं तो द्रमुक को फायदा हो सकता था। बताया जा रहा है कि भाजपा का पूरा प्रयास है कि तमिलनाडु में एनडीए का शासन बरकरार रहे। यदि द्रमुक और कांग्रेस गठबंधन तमिलनाडु में सरकार बनाने में सफल रहता है तो विपक्षी खेमा मजबूत होगा साथ ही दक्षिण में भगवा खेमे की धाक कम पड़ेगी। भाजपा की नजर इसके साथ ही 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी है। यदि एक बार फिर अन्नाद्रमुक सरकार बने तो लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु में एनडीए का प्रदर्शन सुधर सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले चुनावों में एनडीए का यहां नुकसान उठाना पड़ा था। फिलहाल तो शशिकला के ऐलान के बाद अन्नाद्रमुक काफी मजबूत हो गयी है क्योंकि जो पार्टी बगावत रोकने में सफल हो जाये उसका पलड़ा भारी हो ही जाता है। मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी और उपमुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम के बीच विवाद सुलझाने और दोनों को साथ मिलकर काम करने के लिए भी भाजपा ने ही मनाया था। देखा जाये तो अन्नाद्रमुक में एकता कायम रखने के पीछे भाजपा का ही सबसे बड़ा हाथ है।

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बहरहाल, शशिकला ने अपने इस कदम से तमिलनाडु की जनता को यह भी संदेश दिया है कि भले उनके भतीजे ने अन्नाद्रमुक से निकाले जाने के बाद अपनी अलग पार्टी बना ली हो लेकिन अम्मा की भक्त शशिकला ने अन्नाद्रमुक से निकाले जाने के बाद कोई नई पार्टी नहीं बनायी और अम्मा की सत्ता की वापसी के लिए अपने राजनीतिक हितों की कुर्बानी दे दी। अब अगर तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक का वर्तमान नेतृत्व सत्ता में वापस नहीं लौट सका तो चुनावों के बाद पार्टी की कमान शशिकला को सौंपने की माँग भी हो सकती है। इसलिए शशिकला की इस चाल का पूरा परिणाम सामने आ गया है यह नहीं कहा जा सकता।

-नीरज कुमार दुबे







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