हिंदू शब्द किसी धर्मग्रंथ में है ही नहीं, यह शब्द विदेशी मुसलमानों का दिया हुआ है

हिंदू शब्द किसी धर्मग्रंथ में है ही नहीं, यह शब्द विदेशी मुसलमानों का दिया हुआ है

किसी भी भारतीय प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में मैंने हिंदू शब्द नहीं पढ़ा। वेद, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत आदि किसी धर्मग्रंथ में हिंदू शब्द नहीं है। यह हिंदू शब्द हमें विदेशी मुसलमानों का दिया हुआ है। इसका सीधा-साधा अर्थ है कि सिंधु नदी के आर-पार जो भी रहता है, वह हिंदू है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने मुंबई की एक सभा में कहा कि मुसलमान नेताओं को कट्टरपंथियों के खिलाफ दो-टूक रवैया अपनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह एतिहासिक सत्य है कि भारत में इस्लाम विदेशी हमलावरों की वजह से आया है। लेकिन उन्होंने साथ-साथ यह भी कहा कि सारे भारतीयों का डीएनए एक ही है। हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब भारतमाता की ही संतान हैं। जिसकी मातृभूमि भारत है, वह हिंदू है। उसकी जाति, भाषा, रंग-रूप और मजहब चाहे जो हो।

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वास्तव में मोहन भागवत ने हिंदू शब्द की यह जो परिभाषा की है, यह उदारतापूर्ण तो है ही, विदेशियों की दृष्टि में यह पूर्ण सत्य भी है। मैं जब चीन के गांवों में जाया करता था तो चीनी लोग मुझे ‘इंदुरैन’ कहा करते थे याने हिंदू आदमी ! अफगानिस्तान और ईरान में मैंने किसी भी आदमी को ‘भारत’ या ‘इंडिया’ कहते हुए नहीं सुना। वे हमेशा भारत को हिंदुस्थान या हिंदुस्तान ही कहते हैं याने हिंदुओं का स्थान! अफगान और ईरानी विद्वानों के मुंह से मैंने ‘आर्यावर्त्त’ शब्द भी भारत के लिए सुना है। सच्चाई तो यह है कि किसी भी भारतीय प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में मैंने हिंदू शब्द नहीं पढ़ा है। वेद, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत आदि किसी धर्मग्रंथ में हिंदू शब्द नहीं है। यह हिंदू शब्द भी हमें विदेशी मुसलमानों का दिया हुआ है। इसका सीधा-साधा अर्थ यह है कि सिंधु नदी के आर-पार जो भी रहता है, वह हिंदू है। फारसी भाषा में हमारे ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है। जैसे सप्ताह का हफ्ता! इस दृष्टि से जो भी भारत का नागरिक है, वह हिंदू है।

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यह ठीक है कि हिंदू की यह व्यापक और उदार परिभाषा सावरकर को स्वीकार नहीं होगी, क्योंकि उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ में लिखा है कि हिंदू वही है, जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि, दोनों ही भारत हो अर्थात् भारतीय मुसलमानों की पुण्यभूमि मक्का-मदीना और ईसाइयों की रोम है तो वे हिंदू कैसे कहला सकते हैं ? सावरकर ने यह उन दिनों लिखा था जब मुस्लिम लीग जोरों पर थी और खिलाफत आंदोलन अपने शबाब पर था। अब पिछले 100 साल में दुनिया काफी बदल गई है। लोगों को एक-दूसरे देशों की असलियत का पता बराबर चलता रहता है। अब कौन भारतीय मुसलमान भारत छोड़कर मक्का-मदीना में रहना चाहेगा और कौन ईसाई रोम में बसना चाहेगा? जो लोग विभाजन के समय भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे, उनको भी मैंने कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में पछताते हुए देखा है। वास्तव में भारतीय मुसलमान तो ‘हिंदू मुसलमान’ ही हैं। उन्हें अरब देशों में ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’ ही कहा जाता है। भारतीय मुसलमानों की धमनियों में हजारों वर्षों से चली आ रही उत्कृष्ट भारतीय संस्कृति ही बह रही है। इसीलिए मैं उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मुसलमान कहता हूं। वे अपने आचरण से यह सिद्ध करें और कट्टरपंथ का अंधानुकरण न करें, यह जरूरी है। हिंदू शब्द इतना व्यापक और उदार है कि इसमें दुनिया का कोई भी धर्म, कोई भी जाति, कोई भी कबीला समा सकता है। जो भी भारतीय है, वह हिंदू है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक