• ग्लोबल डिजिटल टैक्स क्या है? यह कबसे लागू होगा? भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

ग्लोबल डिजिटल टैक्स को ही ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स और ग्लोबल मिनीमम टैक्स भी कहा जा रहा है। इसे वर्ष 2023 तक पूर्ण रूप से लागू किये जाने पर लगभग सहमति बन गई है। अब सिर्फ इसे विभिन्न देशों के समूह द्वारा अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

अब बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां केवल उन देशों को टैक्स नहीं देगी जहां वे स्थित हैं, बल्कि उन देशों को भी टैक्स चुकाएंगी जहां वह काम करती हैं। विश्व विरादरी इस नई कराधान प्रक्रिया पर लगभग सहमत है और इसे अंतिम रूप दिए जाने के लिए बैठक दर बैठक चल रही है। इस प्रकार के कराधान की अधिकतम सीमा 15 प्रतिशत तक हो सकती है। यही ग्लोबल डिजिटल टैक्स है। 

ग्लोबल डिजिटल टैक्स को ही ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स और ग्लोबल मिनीमम टैक्स भी कहा जा रहा है। इसे वर्ष 2023 तक पूर्ण रूप से लागू किये जाने पर लगभग सहमति बन गई है। अब सिर्फ इसे विभिन्न देशों के समूह द्वारा अमलीजामा पहनाया जा रहा है। बता दें कि इस नए टैक्स पर जी-7 देश इस वर्ष जून माह में ही सहमत हो गए, जबकि जुलाई में जी-20 देशों ने भी इस पर सैद्धांतिक सहमति जता दी। वहीं, हाल ही में 130 देशों के संगठन 'आर्थिक सहयोग और विकास संगठन, पेरिस, फ्रांस' ने भी अपना समर्थन दे दिया है।

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बता दें कि ग्लोबल मिनिमम टैक्स की दरें ओवरसीज प्रॉफिट पर लागू होंगी। सरकारें इसके बाद भी अपनी मर्जी से लोकल कॉरपोरेट टैक्स लगा सकेंगी, लेकिन अगर कंपनियां किसी देश में कम टैक्स चुकाती हैं तो उस कंपनी के देश की सरकार टैक्स को न्यूनतम रेट तक बढ़ा सकती है, जिससे कि प्रॉफिट को दूसरे देश में शिफ्ट कर के टैक्स बचाने को रोका जा सके। ओईसीडी ने कहा था कि सरकारें बेसिक डिजाइन पर तो सहमत हैं, लेकिन दरों पर अभी समहति नहीं बनी है।

# डिजिटल टैक्स से सम्बंधित ‘गाफा’ नियम क्या है?

दुनिया की सरकारें गूगल और फेसबुक जैसी दिग्गज कंपनियों पर एक नए प्रकार के कर को लगाने की तैयारी कर रही हैं, जिसे गाफा नाम दिया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह का कदम दूसरे कई देश उठा चुके हैं। फ्रांस के सांसदों ने फेसबुक और एप्पल जैसी डिजिटल कम्पनियों पर डिजिटल टैक्स लगाने की स्वीकृति दी है। इस कानून को “गाफा” (गूगल, अमेजन, फेसबुक और एपल) नाम दिया गया है। इस गाफा नियम के अंतर्गत डिजिटल विज्ञापन, निजी डाटा की बिक्री आदि के लिए प्रौद्योगिकी कंपनियों पर तीन फीसद कर लगेगा। यह उन सभी कंपनियों पर लागू होगा, जो प्रत्येक वर्ष दुनियाभर में 84 करोड़ डॉलर (करीब 5,823 करोड़ रुपये) की कमाई करती हैं। 

उल्लेखनीय है कि गत 5 जून 2021 को जी-7 देशों ने प्रस्ताव दिया कि ग्लोबल टेक कंपनियां अपने प्रॉफिट मार्जिन का 10 प्रतिशत टैक्स के रूप में उन देशों को भी भुगतान करेंगी, जहां ये कंपनियां ऑपरेट करती हैं। इससे स्पष्ट है कि मल्टीनेशनल कंपनियों पर ज्यादा ग्लोबल टैक्स लगाने को लेकर ऐतिहासिक समझौता हो चुका है।

बता दें कि गूगल, एप्पल और अमेज़न जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों पर ज्यादा ग्लोबल टैक्स लगाने को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों के बीच गत 5 जून  को ऐतिहासिक समझौता हुआ। ये डील जी-7 वित्त मंत्रियों की बैठक में हुई, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका जैसे देश शामिल हैं। इस समझौते से ये देश करोड़ों डॉलर कमा सकेंगे, जो कोविड महामारी से हुए नुकसान से उबरने में काम आएंगे। खास बात यह कि सातों देश कम से कम 15 फीसदी के न्यूनतम ग्लोबल कॉर्पोरेट रेट पर साथ आए हैं।

इस बारे में ब्रिटेन ने स्पष्ट कहा है कि जी-7 देशों ने टैक्स इवेजन से बचाव के लिए एक ऐतिहासिक ग्लोबल डील पर हस्ताक्षर किए हैं। वो भी यह सुनिश्चित करने के लिए कि वैश्विक तकनीक कंपनियां उचित तरीके से अपने हिस्से के टैक्स का भुगतान करें। बताते चलें कि इस डील को होने में कई साल लगे हैं। इससे ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों की तरफ से लगाया गया नेशनल डिजिटल सर्विस टैक्स भी खत्म हो सकता है, जिसे लेकर अमेरिका ने कहा था कि ये टैक्स गलत तरीके से अमेरिकी कंपनियों को निशाना बना रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि अमीर देश सालों से एक समझौता करने के लिए जूझ रहे हैं, जिससे कि गूगल, अमेजन, फेसबुक जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों से ज्यादा रेवेन्यू कमाया जा सके। ये कंपनियां ऐसे देशों में मुनाफा दिखाती हैं, जहां कम या बिलकुल टैक्स नहीं देना होता है। समझा जा रहा है कि वित्त मंत्रियों का ये कदम कंपनियों को मजबूर करेगा कि वो पर्यारण पर अपने प्रभाव के बारे में जानकारी दें, जिससे कि निवेशक उन्हें पैसा देने का सही फैसला कर पाएं। सच कहा जाए तो ये समझौता टैक्स हेवन देशों पर भी निशाना है। तभी तो जर्मन वित्त मंत्री ओलाफ शोल्ज ने इसे दुनिया के टैक्स हेवन के लिए एक 'बुरी खबर' बताया है।

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# आखिर न्यूनतम ग्लोबल टैक्स क्यों?

कहना न होगा कि जी-7 देशों जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मल्टीनेशनल कंपनियों के मुनाफा और टैक्स रेवेन्यू कम टैक्स वाले देशों में शिफ्ट करने से परेशान हैं। आलम यह है कि ड्रग पेटेंट, सॉफ्टवेयर और इंटेलेक्टुअल प्रॉपर्टी जैसे ठीक से मापे न जाने वाले सोर्स से इन कंपनियों की इनकम ऐसे कम टैक्स वाले देश जा चुकी है, जिससे इन कंपनियों को उनके गृह देशों में ज्यादा टैक्स नहीं देना पड़ता है।

यही वजह है कि अमेरिकी ने 15 फीसदी ग्लोबल डिजिटल टैक्स रेट का प्रस्ताव आगे बढ़ाया था, जिसे अन्य देशों ने मान लिया। इससे उम्मीद लगाई जा रही है कि अमेरिकी कंपनियों को बहुत ज्यादा वित्तीय नुकसान नहीं होगा और टैक्स रेवेन्यू भी मिलता रहेगा। वहीं, जर्मनी और फ्रांस ने भी इस समझौते का स्वागत किया है, लेकिन फ्रांस ने भी दो टूक कह दिया कि वो 15 फीसदी से ज्यादा के ग्लोबल टैक्स के लिए लड़ेंगे। संभवतया इसलिए उसने अपने यहां गाफा नियम लागू किया है।

एक बात और, जी-7 के इस समझौते में यह साफ भी नहीं है कि नियमों के तहत कौन से बिजनेस आएंगे। यही नहीं, यहां पर अभी ये भी तय नहीं हुआ है कि टैक्स रेवेन्यू कैसे बांटा जाएगा।

# ग्लोबल डिजिटल कंपनियों से टैक्स वसूली में भारत में क्या हैं नियम 

भारत सरकार भी गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों से ट्रांजैक्शन वॉल्यूम और देश में उनके कंज्यूमर्स की संख्या के आधार पर टैक्स वसूलने के लिए नियमों का ऐलान कर चुकी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह का कदम दूसरे कई देश उठा चुके हैं। ठीकठाक कारोबारी उपस्थिति या डिजिटल परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट पर बेसिक फ्रेमवर्क बनाया गया है। भारत में कंपनियों से परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट कॉन्सेप्ट के आधार पर टैक्स लिया जाता है, जिससे वह कंपनी से टैक्स लेने का अधिकार रखने वाला ज्यूरिस्डिक्शन तय होता है।

सरकार का मानना है कि ग्लोबल डिजिटल कंपनियों का भारत में अच्छा-खासा कंज्यूमर बेस है, लेकिन वे यहां पर्याप्त टैक्स नहीं देती हैं। यही वजह है कि बड़ी डिजिटल कंपनियों को लोकल टैक्स सिस्टम के तहत लाने के लिए कई देशों में जोर लगाया जा रहा है। क्योंकि ऐसी कई कंपनियां जानबूझकर अपने एस्टैब्लिशमेंट कम टैक्स वसूलने वाले देशों में बनाती हैं।

इसके लिये हमें कंपनियों और उनके क्लाइंट्स या उनकी पैरेंट कंपनियों के बीच होने वाले ट्रांजैक्शंस का आंकड़ा निकालना होगा। साथ ही यह भी पता लगाना होगा कि उनके कितने कंज्यूमर हैं। इस आंकड़े के आधार पर टैक्स लगाया जाएगा। वास्तव में यह एक जटिल विषय है। इसलिए यह ध्यान रखना होगा कि छोटी कंपनियां इसमें न फंसें और फोकस बड़ी कंपनियों पर ही रहे।

उम्मीद है कि सरकार करीब 2,50,000 भारतीय उपभोक्ताओं की एक सीमा तय कर सकती है ताकि छोटी कंपनियों पर इसका असर न पड़े। हालांकि, टैक्स एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि कंपनियों पर नजर रखना और उनसे नियमों का पालन कराना एक बड़ी चुनौती होगी। ईवाई इंडिया के पार्टनर (टैक्स एंड रेगुलेटरी सर्विसेज) समीर कनाबार की राय है कि, 'ठीकठाक कारोबारी मौजूदगी के लिए लेजिस्लेटिव फ्रेमवर्क से ट्रांजैक्शंस का बिजनेस कनेक्शन बेसिस नंबर और ऐसे ट्रांजैक्शंस की एग्रीगेट वैल्यू या कस्टमर बेस सामने आ सकता है। सरकार ने इन पैरामीटर्स के बारे में टिप्पणियां आमंत्रित की थीं, जिसके दृष्टिगत अब नई गाइडलाइंस का इंतजार किया जा रहा है।'

देखा जा रहा है कि अधिकतर बड़ी कंपनियां भारत में दो इकाइयों यानी एक भारतीय और एक विदेशी कंपनी (टैक्स हेवेन में रजिस्टर्ड) के जरिए काम करती हैं। इस प्रक्रिया में भारतीय इकाई केवल इंटरमीडियटरी या कमीशन एजेंट के तौर पर काम करती है और अधिकांश कमाई सीधे विदेश में रजिस्टर्ड कंपनियों के हेडक्वॉर्टर भेज दी जाती है। इसलिए टैक्स विभाग ने कहा था कि गूगल की भारतीय इकाई आयरलैंड में स्थित इकाई को किए जाने वाले भुगतान पर पर्याप्त टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स) नहीं काट रही है। यह मामला अभी अदालत में बताया जा रहा है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि डिजिटल कर लेना भारत का संप्रभु अधिकार है। खासकर कोविड-19 के बीच ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था के छलांगें लगाकर बढ़ने से डिजिटल कारोबार पर लगाया गया डिजिटल टैक्स मौजूदा तंग हालात में भारत की आमदनी का नया स्रोत बन सकता है। 

हालांकि, डिजिटल सर्विस टैक्स (डीएसटी) पर अमेजॉन, फेसबुक और गूगल जैसी अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने आपत्ति लेते हुए अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कार्यालय से शिकायत की है।

इसके बाद यूएसटीआर कार्यालय ने भारत में ई-कॉमर्स कंपनियों पर दो फीसदी डीएसटी लगाने के मामले की न्यायसंगतता पर जांच शुरू की है। उल्लेखनीय है कि यूएसटीआर ने भारत के अलावा अन्य नौ देशों के खिलाफ भी ऐसी ही जांच शुरू की है।

खास बात यह कि भारत में दो करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक कारोबार करने वाली विदेशी डिजिटल कंपनियों के द्वारा किए जाने वाले व्यापार एवं सेवाओं पर दो फीसदी डिजिटल कर लगाने के लिए वित्त विधेयक 2020-21 में संशोधित करके इसे एक अप्रैल, 2020 से कानून बना दिया गया है।

वस्तुतः डिजिटल कर विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा भारत में अर्जित आय पर लगाया गया है, जिसके दायरे में भारत में काम करने वाली दुनिया के सभी देशों की ई-कॉमर्स करने वाली कंपनियां शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में आठ एवं नौ जून को जापानी शहर फुकुओका में आयोजित जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों और दुनिया के शीर्ष वित्तीय नीति-निर्माताओं की शिखर बैठक में डिजिटल वैश्विक उद्योग-कारोबार पर डिजिटल टैक्स लगाने को लेकर आम सहमति बनी थी।

फिर, 28 एवं 29 जून को जापान के ओसाका में जी-20 सम्मेलन के दौरान डेटा लोकलाइजेशन और डिजिटल कर पर भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि डेटा एक ऐसी संपत्ति है, जिस पर विकासशील देशों के हितों का ध्यान रखा जाना जरूरी है। स्थिति यह है कि पिछले एक वर्ष से दुनिया के अधिकांश देश डिजिटल कारोबार करने वाले उद्यमों पर डिजिटल टैक्स लगाने का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सहित दुनिया के कुछ विकसित देशों की प्रमुख डिजिटल कंपनियां इस नए डिजिटल टैक्स के खिलाफ हैं।

अमूमन, कोविड-19 के बाद ई-कॉमर्स छलांगें लगाकर किस तरह बढ़ेगा, इसका अनुमान हाल ही में विश्व प्रसिद्ध ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा के द्वारा लॉकडाउन और कोविड-19 के बाद जिंदगी में आने वाले बदलाव के बारे में जारी की गई वैश्विक अध्ययन रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जिसके मुताबिक, 46 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे अब भीड़भाड़ में नहीं जाएंगे। ऐसे में दुनिया में उपभोक्ताओं की आदत और व्यवहार में भारी बदलाव के मद्देनजर ऑनलाइन खरीदारी में तेज वृद्धि तय है।

वहीं, स्थिति यह है कि कोविड-19 के बीच भारत में खुदरा कारोबार (रिटेल ट्रेड) के ई-कॉमर्स बाजार की चमकीली संभावनाओं को मुठ्ठियों में करने के लिए दुनिया भर की बड़ी-बड़ी ऑनलाइन कंपनियों के साथ-साथ भारत के व्यापारिक संगठनों के द्वारा भी स्थानीय किराना दुकानों व कारोबारियों को ऑनलाइन जोड़ने के प्रयास की नई रणनीति बनाई जा रही है। इसी क्रम में विगत 22 अप्रैल को लॉकडाउन के बीच रिलायंस जियो और फेसबुक में ई रिटेल शॉपिंग में उतरने को बड़ी डील हुई है। जिसके तहत फेसबुक ने जियो प्लेटफॉर्म्स में 5.7 अरब डॉलर लगाकर 9.9 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की है। 

इसलिए अब रिलायंस का जियोमार्ट और फेसबुक का वाट्सएप प्लेटफॉर्म मिलकर भारत के करीब तीन करोड़ खुदरा कारोबारियों और किराना दुकानदारों को पड़ोस के ग्राहकों के साथ जोड़ने का काम करेंगे। इनके लेन-देन डिजिटल होने से पड़ोस की दुकानों से ग्राहकों को सामान जल्द मिलेगा और छोटे दुकानदारों का कारोबार भी बढ़ेगा। भारत में व्हाट्सएप के करीब 40 करोड़ यूजर्स हैं, जबकि जियो के 38 करोड़ ग्राहक हैं।

निस्संदेह ई-कॉमर्स ने देश में खुदरा कारोबार में क्रांति ला दी है। देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या इस समय करीब 62 करोड़ से भी अधिक होने के कारण देश में ई-कॉमर्स की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। डेलॉय इंडिया और रिटेल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत का ई-कॉमर्स बाजार इस वर्ष तक 84 अरब डॉलर का हो जाएगा, जोकि 2017 में महज 24 अरब डॉलर था। लेकिन अब कोविड-19 के बीच अनुमान किया गया है कि वर्ष 2027-28 तक यह कारोबार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

इसलिए यहां पर यह बात महत्वपूर्ण है कि देश में खुदरा कारोबार में जैसे-जैसे विदेशी निवेश बढ़ा, वैसे-वैसे ई-कॉमर्स की रफ्तार बढ़ती गई। ऐसे में अब एक ओर ई-कॉमर्स नीति में जरूरी बदलाव करने होंगे, तो दूसरी ओर डिजिटल कर की व्यवस्था को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ाना होगा। वैसे नई ई-कॉमर्स नीति का मसौदा विभिन्न पक्षों के विचार-मंथन के लिए जारी किया जा चुका है। कोविड-19 के मद्देनजर नई ई-कॉमर्स नीति के तहत ई-कॉमर्स बाजार में उपभोक्ताओं के हितों और उत्पादों की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के संतोषजनक समाधान के लिए नियामक भी सुनिश्चित किया जाना है।

ऐसी बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों पर उपयुक्त नियंत्रण करना होगा, जिन्होंने भारत को अपने उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बना दिया है। कई बड़ी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां टैक्स की चोरी करते हुए देश में अपने उत्पाद बड़े पैमाने पर भेज रही हैं। ये कंपनियां इन उत्पादों पर गिफ्ट या सैंपल का लेबल लगाकर भारत में भेज देती हैं।

नई ई-कॉमर्स नीति में अनुमति मूल्य, भारी छूट और घाटे के वित्तपोषण पर लगाम लगाने की व्यवस्था करनी होगी, जिससे सबको काम करने का समान अवसर मिल सके। इससे तो कोई इनकार ही नहीं कर सकता कि भारत अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय और विश्व व्यापार संगठन के समक्ष न्यायसंगतता के साथ दृढ़तापूर्वक अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा और किसी दबाव में नहीं आएगा।

बहरहाल, कोविड-19 के बाद नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के तहत भविष्य में डेटा की वही अहमियत होगी, जो आज सोने की है। इसलिए, डिजिटल कर लगाने का कदम भारत का संप्रभु अधिकार है और यह भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

यूं तो दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं के वित्त मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय कराधान में बड़े बदलावों का समर्थन किया है जिसमें वैश्विक स्तर पर न्यूनतम 15 प्रतिशत की कॉरपोरेट कर की दर का प्रस्ताव भी शामिल है। इससे बड़ी कंपनियां निचली कर दरों वाले कर पनाहगाह क्षेत्रों का लाभ नहीं उठा पाएंगी। क्योंकि जी-20 के वित्त मंत्रियों ने इस साल वेनिस में हुई बैठक में इस योजना को स्वीकृति दी।

अमेरिका ने कहा कि इस प्रस्ताव से आत्मघाती अंतरराष्ट्रीय कर प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाएगी। विभिन्न देश बरसों से कंपनियों को आकर्षित करने के लिए अपनी कर दरों को निचले स्तर पर रख रहे हैं। वस्तुतः, यह एक ऐसी दौड़ है जिसे कोई नहीं जीत पाया है। इसके उलट इससे हमें उन संसाधनों से वंचित होना पड़ा है, जिनका निवेश हम अपने लोगों, अपने श्रमबल और अपने बुनियादी ढांचे में कर सकते थे।

इसके तहत अगला कदम पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) में उठाया जाएगा, जहां इस प्रस्ताव के अधिक ब्योरे पर काम करना है। इसके बाद 30-31 अक्टूबर 2021 को रोम में होने वाली जी-20 के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों की बैठक में इस पर अंतिम फैसला किया जाएगा। इस योजना का क्रियान्वयन 2023 की शुरुआत तक हो सकता है। यह राष्ट्रीय स्तर की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। देशों को न्यूनतम कर की जरूरत को अपने कानूनों में शामिल करना होगा। अन्य हिस्सों के लिए औपचारिक संधि की जरूरत पड़ सकती है। ओईसीडी द्वारा बुलाई गई 130 से अधिक देशों की बैठक में एक जुलाई को इस प्रस्ताव के मसौदे को मंजूरी दी गई। इटली ने वेनिस में जी-20 के वित्त मंत्रियों के बैठक की मेजबानी की।

# नए कर नियमों को 2023 से पहले दुनिया भर में बाध्यकारी कानून में अनुपालन किया जाना चाहिए

20 अमीर देशों के समूह के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंकर ने इस वर्ष वेनिस में एक सभा में कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद पहली बार आमने-सामने होंगे, जहां कॉर्पोरेट कर सुधार एजेंडे में सबसे ऊपर होगा। इसलिए जी-20 से उम्मीद की जाती है कि वह नए नियमों की योजनाओं को अपना राजनीतिक समर्थन देगा, जहां और कितनी कंपनियों पर कर लगाया जाता है, जिन्हें हाल ही में 130 देशों द्वारा पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग और विकास संगठन में समर्थन दिया गया था।

इस सौदे में कम से कम 15 प्रतिशत के वैश्विक न्यूनतम कॉर्पोरेट आयकर की परिकल्पना की गई है। यह एक ऐसा स्तर है जो ओईसीडी के अनुमान के अतिरिक्त वैश्विक कर राजस्व में लगभग 150 बिलियन डॉलर का उत्पादन हो सकता है, लेकिन बहुत सारे विवरणों को अंकित करना बाकी है। अधिकारियों का कहना है कि इटली के ऐतिहासिक लैगून शहर में प्रस्तावित दो दिवसीय सभा अक्टूबर 2021 में होगी, जिसमें जी-20 के नेतागण एक शिखर सम्मेलन भी करेंगे। इसमें किसी अंतिम समझौते तक पहुंचने के उद्देश्य से ओईसीडी प्रस्तावों को व्यवहार में लाने के बारे में चर्चा करेगी।

जी-20 के सदस्य देश विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 80 प्रतिशत से अधिक, वैश्विक व्यापार का 75 प्रतिशत और ग्रह की 60 प्रतिशत आबादी के लिए जिम्मेदार हैं, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और भारत आदि भी शामिल हैं। यदि सब कुछ योजना के अनुसार होता है, तो 2023 के अंत से पहले नए कर नियमों का दुनिया भर में बाध्यकारी कानून में अनुपालन किया जाना चाहिए।

यहां जुटने वाले मंत्री गण अमेरिका से यह आश्वासन भी मांग सकते हैं कि वह विभाजित अमेरिकी कांग्रेस में प्रस्तावों के लिए विधायी अनुमोदन जीत सकती हैं जहां रिपब्लिकन और व्यापारिक समूह निगमों और अमीर अमेरिकियों पर जो बिडेन के प्रस्तावित कर वृद्धि से लड़ रहे हैं। कर के अलावा, मंत्री गण वैश्विक आर्थिक सुधार पर चर्चा करेंगे, जिसे जी-20 के अध्यक्ष इटली के अधिकारियों ने कहा था कि यह बेहद असमान था, अमीर पश्चिमी देशों ने जोरदार तरीके से उठाया, जबकि विकासशील देश पीछे रह गए।

वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपना एक संदेश दिया, जिसमें कहा गया था कि अमीर और विकासशील देशों के बीच “खतरनाक विचलन” था क्योंकि वे कोविड-19 महामारी से उबरना चाहते हैं। जी-20 आईएमएफ से अगस्त के अंत तक अपनी आरक्षित संपत्ति के 650 बिलियन डॉलर आवंटित करने के लिए कहा था, जिसे विशेष आहरण अधिकार के रूप में जाना जाता है। इस सिफारिश के साथ ही पैसे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सबसे ज्यादा जरूरत वाले देशों में जाता है। बैठक में कुछ प्रतिनिधिमंडल यह चिंता व्यक्त कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में बढ़ती मुद्रास्फीति और ब्याज दरें वैश्विक अर्थव्यवस्था को असंतुलित कर सकती हैं।

# ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स प्रावधानों पर कितनी सार्थक है ओईसीडी की भूमिका

ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) को हिंदी में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन कहा जाता है। जिसके यानी जी-20 के बहुतायत सदस्यों (भारत सहित) ने एक अहम घोषणापत्र को अपना लिया। जिसके तहत सभी सदस्य देश इस बात पर सहमत थे कि अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण के कारण टैक्स चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिये। उल्लेखनीय है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां व उद्योग अपने लाभ को ज्यादा टैक्स लेने वाले देशों से निकाल कर उसे कम टैक्स लेने वाले देशों में स्थांतरित कर देते हैं। इस तरह ज्यादा टैक्स वाले देशों के “टैक्स आधार” का “क्षरण” हो जाता है।

इसके प्रस्तावित समाधान में दो घटक हैं– पहला सिद्धांत है कि लाभ के अतिरिक्त हिस्से को देश-विशेष के बाजार में डाल दिया जाये और दूसरे सिद्धांत में न्यूनतम कर शामिल है, जो कर नियमों के अधीन हो। वहीं, लाभ को साझा करने और कर नियमों के दायरे से संबंधित कुछ अहम मुद्दे अभी वार्ता के लिये खुले रखे गए हैं जिनका समाधान किया जाना है। इसके अलावा प्रस्ताव का तकनीकी विवरण भी आने वाले वक्त में तैयार किया जायेगा। अक्टूबर 2021 तक उम्मीद है कि इस पर सहमति बन जायेगी।

दरअसल, समाधान निकालने के जिन सिद्धांतों पर अमल किया जा रहा है, उससे भारत की बात को बल मिलता है कि बाजार में ज्यादा से ज्यादा लाभ को साझा किया जाये, लाभ का निवेश करने सम्बंधी घटकों पर विचार किया जाये, सीमा-पार लाभ स्थानांतरित करने के मुद्दे को गंभीरता से हल किया जाये तथा टैक्स नियमों को इस तरह बनाया जाये कि ऐसे व्यक्तियों को रोका जा सके, जो नागरिक न होते हुये भी दो देशों के बीच होने वाली टैक्स संधि के लाभों तक परोक्ष रूप से पहुंचने की कोशिश करते हैं।

इसलिए, भारत आम सहमति से एक ऐसा समाधान निकालने के हक में है, जिसे लागू करना और पालन करना सरल हो। साथ ही समाधान को अर्थपूर्ण होना चाहिये और देशों के बाजारों की सतत आय होनी चाहिये, खासतौर से विकासशील तथा उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की। भारत सिद्धांत-एक और सिद्धांत-दो के हवाले से आम सहमति के आधार पर उनके क्रियान्वयन के लिये तैयार है। वह इस सम्बंध में अक्टूबर 2021 तक समाधान चाहता है और इस दिशा में वह अंतर्राष्ट्रीय टैक्स एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये सकारात्मक योगदान करेगा।

# क्या है ग्लोबल मिनिमम टैक्स, इसके लागू होने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?

ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स कम से कम 15 फीसदी होगा, जिसका भुगतान उसी देश में करना होगा, जहां पर व्यापार किया जा रहा है। अब सबसे बड़ा और अहम सवाल ये है कि आखिर ग्लोबल मिनिमम टैक्स की दर 15 फीसदी न्यूनतम तय करने का भारत पर क्या असर होगा? दरअसल, बहुत सालों की मशक्कत के बाद आखिरकार जी-7 देश इस बात पर राजी हो गए हैं कि ग्लोबल मिनिमम टैक्स को न्यूनतम 15 फीसदी रखा जाएगा। इसके तहत ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स कम से कम 15 फीसदी होगा, जिसका भुगतान उसी देश में करना होगा, जहां पर व्यापार किया जा रहा है। क्योंकि अभी टैक्सेशन क्लीयर नहीं होने की वजह से कई देशों के नुकसान होता था। विकसित देशों को गूगल, एमेजॉन, फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियों से बहुत कम टैक्स मिलता है। ग्लोबल मिनिमम टैक्स के लागू होने बाद उन पर भारत को 15 फीसदी तक का टैक्स लगाने की ताकत मिल जाएगी।

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सवाल है कि आखिर क्यों जरूरत पड़ी ग्लोबल मिनिमम टैक्स की? तो जवाब होगा कि अधिकतर देश चाहते हैं कि वह मल्टीनेशनल कंपनियों की तरफ से अपना प्रॉफिट और टैक्स रेवेन्यू कम टैक्स वाले देशों में डायवर्ट करने को रोकें। यह कंपनियां सेल्स कहीं भी करें, प्रॉफिट को कम टैक्स वाले देश में डायवर्ट कर देते हैं। इस तरह दवाओं के पेटेंट, सॉफ्टवेयर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर रॉयल्टी आदि से हुई कमाई पर कंपनियां अधिक टैक्स देने से बचते हुए उसे कम टैक्स वाले देश में डायवर्ट कर देती हैं। इससे अपनी कमाई को बचाने के लिए ग्लोबल मिनिमम टैक्स की जरूरत पड़ी है।

यही वजह है कि ओईसीडी यानी आर्थिक सहयोग और विकास संगठन सालों से 140 देशों के साथ टैक्स को लेकर बातचीत कर रहा है। ये बातचीत तमाम देशों के बीच डिजिटल सेवाओं पर टैक्स लगाने और साथ ही टैक्स चोरी को रोकने के लिए चल रही है। इसके तहत ही ग्लोबल कॉरपोरेट मिनिमम टैक्स की बात भी हो रही है। ओईसीडी और जी-20 देश दोनों ही इस लेकर इसी साल के अंतिम तिमाहियों तक किसी फैसले पर पहुंच सकते हैं। इसके बाद कम टैक्स वाले देश एग्रीमेंट का विरोध नहीं कर पाएंगे। ओईसीडी का अनुमान है कि इसके बाद कंपनियों को दुनिया भर में 50-80 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ सकता है।

# भारत के लिए ग्लोबल मिनीमम टैक्स के क्या मायने हैं?

अब सबसे बड़ा और अहम सवाल ये है कि आखिर ग्लोबल मिनिमम टैक्स की दर 15 फीसदी न्यूनतम तय करने का भारत पर क्या असर होगा? अगर भारत में कोई ऐसी कंपनी है जो किसी कम टैक्स वाले देश को कमाई का भुगतान कर रही है तो भारत को अधिकार होगा कि वह इस कमाई पर टैक्स लगा सके, बशर्ते वह कमाई डिजिटल इनकम से जुड़ी हो। कम टैक्स वाले देशों में आयरलैंड, लग्जम्बर्ग और नीदरलैंड जैसे देश आते हैं।

गौरतलब है कि इसी वर्ष अमेरिका ने 2 जून को भारत पर लगाए गए जवाबी टैक्स को 6 महीने के लिए स्थगित करने का फैसला किया है। वहीं, अमेरिका को उम्मीद है कि वो भारत के डिजिटल टैक्सेशन के मुद्दे पर बहुपक्षीय समाधान खोज लेगा। अमेरिका ने ये एक्शन भारत के उस कदम के बाद लिया था, जिसमें भारत ने ऑनलाइन गुड्स और सर्विस बेचने वाली विदेशी कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लगाने की बात कही थी। ये टैक्स उन बिग टैक कंपनियों पर लगता है जिनकी सालाना आय 2 करोड़ से ज्यादा रही है।

दरअसल, भारत ने डिजिटल टैक्स अप्रैल 2020 में लगाया था। इससे विदेशी डिजिटल और ई-कॉमर्स कंपनियों जैसे अमेजॉन, अलीबाबा, फेसबुक, गूगल, ऊबर जैसी कंपनियां, जो सालाना 2 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई करती हैं और भारत में इनकम टैक्स नहीं भरने दे रही हैं। ऐसी कंपनियों को दो परसेंट लेवी देनी होगी। वहीं, यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रिजेंटेटिव (यूएसटीआर) ने कहा कि इस तरह का टैक्स अमेरिकी कारोबार के प्रति भेदभावपूर्ण है और इसके खिलाफ ट्रेड ऑफ एक्ट 1974 के सेक्शन 301 के तहत कार्रवाई होगी। इसके बाद यूएसटीआर ने भारत समेत 10 देशों पर जांच की। इन देशों ने भी बिग टेक कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लगाया था।

वहीं, यूएस ट्रेड रिप्रिजेंटेटिव ने भारत सरकार को इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए कहा, जिसके मुताल्लिक 5 नवंबर 2020 को इस पर चर्चा हुई। यूएसटीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत द्वारा लगाया गया डिजिटल टैक्स भेदभावपूर्ण है और यह अमेरिकी कारोबार में बाधा डालता है। वहीं, जनवरी 2021 को यूएसटीआर की रिपोर्ट की जानकारी भारत को मिली। इस जांच के दौरान अमेरिकी ट्रेड रिप्रिजेंटेटिव इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भारत के डिजिटल टैक्सेशन के कानून सही नहीं है। इन पर अमेरिकी ट्रेड एक्ट के सेक्शन 301(बी) और 304(ए) के तहत कार्रवाई बनती है। 

वहीं, मार्च 2021 में भारत के डिजिटल टैक्स के जवाब में अमेरिका ने कई सारे भारतीय उत्पादों, यथा- बासमती, सोने, चांदी पर 25 प्रतिशत जवाबी टैक्स लगा दिया। इन प्रोडक्ट में बांस के उत्पाद, सिगरेट पेपर, मोती, महंगे पत्थर, गहने और लकड़ी के सामान शामिल थे। यूएसटीआर ने बताया कि बिग टेक कंपनियों पर भारत ने करीब $55 मिलियन का टैक्स लगाया है। इसके जवाब में करीब इतनी ही कीमत के जवाबी टैक्स लगाए गए हैं। हालांकि, अमेरिका ने 2 जून 2021 को भारत के खिलाफ लगाए जवाबी टैक्स को स्थगित कर दिया है, ताकि कारोबारी मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अगले 6 महीनों तक तनाव कम हो।

# आखिर चर्चा में क्यों है भारत समेत विभिन्न देशों का नया डिजिटल कानून पहल?

गूगल और फेसबुक जैसी दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियाँ भारत के नए डिजिटल कर को कुछ समय के लिये टालने की मांग कर रही हैं। इन शीर्ष प्रौद्योगिकी कंपनियों के अधिकारियों ने सरकार से कम-से-कम छह महीने तक यह कर लागू न करने की मांग करने का निर्णय लिया था। बता दें कि भारत सरकार ने 1 अप्रैल, 2020 से देश में प्रदान की जाने वाली डिजिटल सेवाओं के लिये सभी विदेशी बिलों पर 2 प्रतिशत कर लगाया है।

यहाँ पर विदेशी बिलों से अभिप्राय उन बिलों से है जिनमें कंपनियाँ भारत में ग्राहकों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं की भुगतान राशि विदेश में प्राप्त करती हैं। यह कर ई-कॉमर्स सेवाएँ प्रदान करने वाली कंपनियों पर भी देय होगा। साथ ही यह कर उन कंपनियों पर भी लागू होगा जो ऑनलाइन विज्ञापन के माध्यम से भारतीय ग्राहकों को लक्षित करती हैं। 

उल्लेखनीय है कि यह नया कर वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किये गए 2020-21 के बजट का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसे कुछ समय पूर्व बजट 2020-21 में संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, नए कर की शुरुआत महामारी के समय राजस्व संग्रहीत करने के एक उपाय के रूप में प्रतीत हो रहा है।

बता दें कि कुछ समय पूर्व फ्रांस ने भी बड़ी टेक कंपनियों पर कर लागू करने की योजना बनाई थी, किंतु गूगल ने फ्रांँस के इस निर्णय का विरोध किया था। हालाँकि गूगल के विरोध और अमेरिकी सरकार के हस्तक्षेप के पश्चात् फ्रांस ने इस कर को कुछ समय तक टालने का निर्णय लिया है। वहीं, भारत की डिजिटल कर योजना ऐसे समय में आई है जब गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियाँ भारत में अपने व्यवसाय के विस्तार की योजना बना रही हैं, क्योंकि भारत दुनिया के तेज़ी से बढ़ते क्लाउड कंप्यूटिंग बाज़ारों में से एक है। 

क्लाउड कंप्यूटिंग के अलावा गूगल का भारत के डिजिटल भुगतान बाज़ार में भी एक विशेष स्थान है। कंपनी ने भारतीय ग्राहकों को ध्यान में रखते हुए ‘तेज़’ नाम से एक विशिष्ट डिजिटल भुगतान एप भी लॉन्च किया था। कुछ समय पश्चात् इस मोबाइल एप का नाम परिवर्तित कर ‘गूगल पे’ कर दिया गया है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत का मोबाइल भुगतान बाज़ार वर्ष 2023 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगा, जो कि वर्ष 2018 में 200 बिलियन डॉलर था।

वहीं, भारत का नया डिजिटल कर गूगल जैसी बड़ी कंपनियों की विस्तार परियोजनाओं के समक्ष एक बड़ी बाधा बन सकता है। क्योंकि यह कर ऐसे समय में आया है, जब विश्व की लगभग सभी कंपनियाँ कोविड-19 महामारी के कारण संकट का सामना कर रही हैं। ऐसे में भारत द्वारा शुरू किया गया यह नया कर भले ही कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिये एक उपाय हो, किंतु यह कर भारत के समक्ष कई चुनौतियाँ उत्पन्न करेगा। वैसे भी भारत और अमेरिका के मध्य बीते कई वर्षों से कर व्यवस्था को लेकर तनाव बना हुआ है और इस नए कर के कारण दोनों देशों के संबंधों पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि इस विषय को लेकर सभी हितधारकों से वार्ता की जाए और यथासंभव संतुलित उपाय खोजने का प्रयास किया जाए।

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि फ्रांस में भी गाफा नियम से सम्बंधित विधेयक ऐसे समय में आया है, जब दुनिया की कुछ सबसे अमीर फर्मों द्वारा न्यूनतम भुगतान करने को लेकर सार्वजनिक नाराजगी है। फिर भी अमेरिका ने अपने नाटो सहयोगी देशों से इस योजना को छोड़ने का आग्रह किया है। विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने इस सम्बन्ध में चेतावनी दी है कि इससे अमेरिकी कंपनियों और उन प्लेटफार्मों का उपयोग करने वाले फ्रांसीसी नागरिकों, दोनों को हानि होगी। 

वहीं, न्यूजीलैंड सरकार ने भी फेसबुक और गूगल जैसी दिग्गज ऑनलाइन कंपनियों पर नया टैक्स लगाने की योजना की घोषणा की है। उसका कहना कि आय और कर के बीच बड़ा अंतर है, जिससे कम करने की आवश्यकता है। हमारी वर्तमान कर व्यवस्था इस तरह से उचित नहीं है कि वह व्यक्तिगत करदाताओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ अलग-अलग व्यवहार कर सके। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि विदेशी ऑनलाइन कंपनियों को स्थानीय कंपनियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त हुआ है। जहां स्थानीय कंपनियां काफी मात्रा में कर का भुगतान करती हैं, वहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा अपेक्षाकृत कम कर प्राप्त होता है। इसलिए नया कर प्रावधान अति शीघ्र लागू करने की जरूरत है। इसके लिए वर्ष 2023 तक का इंतजार करना उचित नहीं होगा।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार