षटतिला एकादशी पर तिल दान से आएगी समृद्धि, जानें व्रत का महत्व

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पंडितों का मानना है कि षटतिला एकादशी के दिन काले तिल का प्रयोग करने से भक्त के सभी पापों का नाश होता और उसे पुण्य मिलता है। साथ ही षटतिला एकादशी के दिन काली गाय की पूजा का भी खास महत्व होता है।

हिन्दू धर्म में एकादशी का खास महत्व होता है। षटतिला एकादशी माघ महीने की कृष्णपक्ष की एकादशी को मनायी जाती है, तो आइए हम आपको षटतिला एकादशी के व्रत, पूजा-विधि तथा महत्व के बारे में बताते हैं। 

षटतिला एकादशी पर काले तिल का महत्व 

षटतिला एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा होती है तथा इस पूजा के काले तिल का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। पंडितों का मानना है कि षटतिला एकादशी के दिन काले तिल का प्रयोग करने से भक्त के सभी पापों का नाश होता और उसे पुण्य मिलता है। साथ ही षटतिला एकादशी के दिन काली गाय की पूजा का भी खास महत्व होता है। 

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षटतिला एकादशी के दिन तिल का उपयोग करना शुभ माना जाता है। तिल का प्रयोग कआ प्रकार से किया जा सकता है। षटतिला एकादशी के दिन तिल का उबटन लाग कर आप तिल से स्नान कर सकते हैं। साथ ही तिल से हवन-पूजन कर तर्पण करें। इसके अलावा भोजन में तिल का प्रयोग कर तिल दान में भी दे सकते हैं। षटतिला एकादशी के दिन तिल दान देने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।

षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान होगा लाभदायी

शास्त्रों के अनुसार, षटतिला एकादशी के दिन जो भी व्यक्ति तिल का दान करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसके अलावा पंडितों का मानना है कि एकादशी के दिन जो व्यक्ति तिल दान करता है उसके सभी पापों का नाश होता है और उसे पुष्य की प्राप्ति होती है। 

षटतिला एकादशी पर ऐसे करें पूजा

षटतिला एकादशी के दिन तिल का उबटन लगा कर तिल वाले पानी से स्नान करें। उसके बाद साफ वस्त्र धारण कर घर के मंदिर की सफाई करें और भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का स्मरण कर षटतिला एकादशी व्रत का संकल्प लें। षटतिला एकादशी की पूजा दशमी के दिन से शुरू हो जाती है। दशमी के दिन तिल मिश्रित गाय के गोबर से 108 उपले बनाएं। उसके बाद एकादशी के दिन पूजा प्रारम्भ करें। भगवान की चन्दन, अरगजा, कपूर, नैवेद्य इत्यादि अर्पित करें। उसके बाद उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी का भोग लगाएं और प्रसाद स्वरूप बाट दें। एकादशी की रात में पूजा करें तथा उन्हीं 108 उपलों से हवन करें इससे भगवान विष्णु की आप पर विशेष कृपा होगी। एकादशी की रात में सोएं नहीं बल्कि रात भर जगकर कीर्तन करें। 

षटतिला एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा

पुद्म पुराण में षटतिला एकादशी से सम्बन्धित कथा का वर्णन किया गया है। इस कथा के अनुसार एक स्त्री भगवान विष्णु की परम भक्त थी। पूजा-पाठ करने के कारण मृत्यु के पश्चात उसे बैकुंठ धाम प्राप्त हुआ लेकिन वहां पहुंचने पर उसे केवल एक खाली कुटिया मिली। तब उस स्त्री ने भगवान विष्णु से कहा कि मैंने आपकी भक्ति की फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली। तब भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए तुम्हें यह फल भोगना पड़ा। विष्णु जी उससे षटतिला एकादशी का व्रत करने को कहा। षटतिला एकादशी व्रत से स्त्री की कुटिया अन्न-धन से भरी गयी और वह खुशी-खुशी बैकुंठ धाम में रहने लगी। 

षटतिला एकादशी पर यें चीजें करें दान

षटतिला एकादशी के दिन पूजा के बाद दान का खास महत्व होता है। विशेष रूप से तिल से भरा बर्तन, जूता,छाता, घड़ा, वस्त्र दान फलदायी होता है। यथाशक्ति अनुसार आप काली गाय भी दान कर सकते हैं। षटतिला एकादशी के दिन केवल तिल का दान ही नहीं बल्कि तिल के साथ अन्न का दान भी विशेषदायी होता है। पंडितों का मानना है कि षटतिला एकादशी के दिन तिल के साथ यदि कोई भक्त अन्न दान करता है तो उसके जीवन में कभी दरिद्रता नहीं आती। साथ ही इस दान  से मनुष्य का जीवन सुखद और वैभवशाली होता है। यही नहीं षटतिला एकादशी पर विधिपूर्वक दान से न केवल इस लोक में बल्कि मृत्यु के बाद बैकुंठ लोक में भक्त सुखपूर्वक विचरण करता है।

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षटतिला एकादशी का शुभ मुहूर्त 

षटतिला एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त-  17 जनवरी 2023 को शाम 6.05 बजे से हो जाएगी और 18 जनवरी को शाम 4.03 मिनट तक रहेगा।

व्रत का पारण-सुबह 7 बजकर 15 मिनट से शुरु होकर 9 बजकर 29 मिनट तक है।


एकादशी व्रत में करें इन नियमों का पालन 

षटतिला एकादशी का विशेष महत्व होता है इसलिए इस एकादशी में कुछ नियमों का पालन विशेष फलदायी होता है। एकादशी के पहले दशमी की संध्या से ही व्रत प्रारम्भ कर दें। दशमी को मसूर की दाल तथा लहसुन, प्याज युक्त भोजन का सेवन न करें। 

- प्रज्ञा पाण्डेय 

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