माघी पूर्णिमा का जीवन में है खास महत्व, इस तरह धुल सकते हैं सभी पाप

  •  शुभा दुबे
  •  फरवरी 19, 2019   19:50
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माघी पूर्णिमा का जीवन में है खास महत्व, इस तरह धुल सकते हैं सभी पाप
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दरअसल हिन्दू धर्म में माघी पूर्णिमा का बहुत महत्व माना गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और उसके बाद दान का विशेष महत्व है। गंगा किनारे लगे मेला क्षेत्रों में मंदिरों में भी भारी भीड़ है।

मान्यता है कि पौष पूर्णिमा की तरह ही माघी पूर्णिमा पर गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। इसी वजह से माघी पूर्णिमा पर गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। खासतौर पर प्रयागराज में चल रहे कुम्भ मेले में करोड़ों की संख्या में लोग पहुँचे हैं। यह कुम्भ मेले का पांचवां प्रमुख स्नान है। इस दिन पवित्र संगम में स्नान करने से काया हमेशा निरोगी रहती है। बनारस के घाटों पर भी माघी पूर्णिमा के दिन जबरदस्त भीड़ है। हरिद्वार और गंगासागर में भी श्रद्धालु बस चले ही आ रहे हैं और सभी का प्रयास है कि पवित्र डुबकी लगाकर अपने जीवन को धन्य कर लिया जाये। दरअसल हिन्दू धर्म में माघी पूर्णिमा का बहुत महत्व माना गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और उसके बाद दान का विशेष महत्व है। गंगा किनारे लगे मेला क्षेत्रों में मंदिरों में भी भारी भीड़ है और मंदिरों में दान के अलावा लोग दीन दुखियों को भी दिल से दान कर रहे हैं।

दरअसल माघ मास की अंतिम पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा कहा जाता है और इसके अगले दिन से ही फाल्गुन की शुरुआत हो जाती है। साल भर में जितनी भी पूर्णिमा होती हैं उनमें माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। शास्त्रों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस दिन विधि विधान से पूजा करने और दान आदि करने से मनुष्य को पुण्य की प्राप्ति होती है।


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माघी पूर्णिमा का महत्व

प्रयागराज में चल रहे कुम्भ मेला में आपको कई कल्पवासी दिख जायेंगे। कल्पवासियों से तात्पर्य प्रयाग कुंभ मेले में आने वाले आस्थावान श्रद्धालुओं से होता है। वह एक महीने तक गंगा के तट पर रह कर, बेहद कठोर नियमों के साथ जीवन जीने का संकल्प लेते हैं। माघी पूर्णिमा के दिन पवित्र स्नान करने के बाद सभी कल्पवासी अपने अपने घर वापस लौट जाएंगे। अपने मूल स्थान पर लौटने से पहले यह लोग गंगा आरती करते हैं और कुम्भ मेला में अपने ठहरने के स्थान पर यज्ञ-हवन करने के बाद गरीबों को दान भी करते हैं।

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क्या करें माघी पूर्णिमा के दिन

मान्यता है कि माघी पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु स्वयं गंगाजल में निवास करते हैं इसलिए इस दिन सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद गंगाजल में स्नान जरूर करें और उसके बाद गंगाजल का आचमन करें। यह भी मान्यता है कि इस दिन पितर देवता रूप में गंगा स्नान के लिए आते हैं इसलिए पितरों का ध्यान करते हुए भी दान इत्यादि करना चाहिए। पितरों का ध्यान करते हुए पवित्र स्थलों पर यदि इस दिन उनका श्राद्ध किया जाये तो उन्हें सीधा मोक्ष मिलता है। इस दिन तिल, गुड़, घी, फल, मोदक, अन्न और कम्बल का दान उत्तम माना गया है।

-शुभा दुबे







मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

  •  ब्रह्मानंद राजपूत
  •  नवंबर 25, 2020   09:25
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मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’
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देव चार महीने शयन करने के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है।

देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दीपावली के ग्यारह दिन बाद आने वाली एकादशी को ही प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी या देव-उठनी एकादशी कहा जाता है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव चार मास के लिए शयन करते हैं। इस बीच हिन्दू धर्म में कोई भी मांगलिक कार्य शादी, विवाह आदि नहीं होते। देव चार महीने शयन करने के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है। इस दिन लोग तुलसी और सालिग्राम का विवाह कराते हैं और मांगलिक कार्यों की शुरुआत करते हैं। हिन्दू धर्म में प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी का अपना ही महत्त्व है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत करता है उसको दिव्य फल प्राप्त होता है।

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उत्तर भारत में कुंवारी और विवाहित स्त्रियां एक परम्परा के रूप में कार्तिक मास में स्नान करती हैं। ऐसा करने से भगवान् विष्णु उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। जब कार्तिक मास में देवोत्थान एकादशी आती है, तब कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है। पूरे विधि विधान पूर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है। विवाह के समय स्त्रियाँ मंगल गीत तथा भजन गाती है। कहा जाता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। हिन्दू धर्म के शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात जिन लोगों के कन्या नहीं होती उनकी देहरी सूनी रह जाती है। क्योंकि देहरी पर कन्या का विवाह होना अत्यधिक शुभ होता है। इसलिए लोग तुलसी को बेटी मानकर उसका विवाह सालिगराम के साथ करते हैं और अपनी देहरी का सूनापन दूर करते हैं। 

प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी के दिन भीष्म पंचक व्रत भी शुरू होता है, जो कि देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक चलता है। इसलिए इसे इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष बिना आहार के रहकर यह व्रत पूरे विधि विधान से करते हैं। इस व्रत के पीछे मान्यता है कि युधिष्ठर के कहने पर भीष्म पितामह ने पाँच दिनो तक (देवोत्थान एकादशी से लेकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक) राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था। इसकी स्मृति में भगवान श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह के नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित किया था। मान्यता है कि जो लोग इस व्रत को करते हैं वो जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

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देवोत्थान एकादशी की कथा

एक समय भगवान विष्णु से लक्ष्मी जी ने कहा- हे प्रभु ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अत: आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। ‘लक्ष्मी’ जी की बात सुनकर भगवान् विष्णु  मुस्काराए और बोले- ‘देवी’! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और खास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।

पूजन विधि 

भगवान विष्णु को चार महीने की निद्रा से जगाने के लिए घण्टा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के बीच ये श्लोक पढकर जगाते हैं-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते। 

त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।

हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

भगवान् विष्णु को जगाने के बाद उनकी षोडशोपचारविधि से पूजा करनी चाहिए। अनेक प्रकार के फलों के साथ भगवान् विष्णु को नैवेद्य (भोग) लगाना चाहिए। अगर संभव हो तो उपवास रखना चाहिए अन्यथा केवल एक समय फलाहार ग्रहण करकर उपवास करना चाहिए। इस एकादशी में रातभर जागकर हरि नाम-संकीर्तन करने से भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।

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शास्त्रों के अनुसार भगवान् विष्णु के चार महीने कि नींद से जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। और हिन्दू धर्म में विवाहों कि शुरुआत भी इसी दिन शुभ मुहूर्त से होती है जो कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलते हैं मान्यता के अनुसार प्रबोधिनी एकादशी के दिन विवाह करने वाला जोड़ा जीवनभर सुखी रहता है।

- ब्रह्मानंद राजपूत

आगरा







देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह का महत्व एवँ पूजन विधि

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 24, 2020   21:41
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देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह का महत्व एवँ पूजन विधि
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इस वर्ष देव उठनी एकादशी 25 नवंबर को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि का प्रारम्भ मध्यरात्रि के बाद 2:42 बजे से होगा और यह तिथि 26 नवंबर 2020 गुरुवार सुबह 5:10 बजे समाप्त होगी। यह पूरा दिन ही बेहद शुभ है इसलिए कभी भी भगवान का पूजन किया जा सकता है।

कार्तिक शुक्ल एकादशी को देव उठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। भगवान श्रीविष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था और थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गए थे और चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देव उठनी एकादशी कहलाया। इस दिन भगवान विष्णु का सपत्नीक आह्वान कर विधि विधान से पूजन करना चाहिए। हिंदू धर्म में भक्तगण भगवान श्रीविष्णु के शयन व उत्थान के उत्सव को धूमधाम से मनाते हैं और माँ लक्ष्मी और भगवान श्रीविष्णु के आशीर्वाद से धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती।

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मुहूर्त और पूजन विधि

इस वर्ष देव उठनी एकादशी 25 नवंबर को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि का प्रारम्भ मध्यरात्रि के बाद 2:42 बजे से होगा और यह तिथि 26 नवंबर 2020 गुरुवार सुबह 5:10 बजे समाप्त होगी। यह पूरा दिन ही बेहद शुभ है इसलिए कभी भी भगवान का पूजन किया जा सकता है और अन्य मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। एकादशी व्रत का शास्त्रों में बहुत महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यदि इस एकादशी का व्रत कर लिया तो सभी एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है और व्यक्ति सुख तथा वैभव प्राप्त करता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन चावल नहीं बनाना चाहिए और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

व्रती महिलाएं प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल को साफ करें और आंगन में चौक बनाकर भगवान श्रीविष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें। दिन में चूंकि धूप होती है इसलिए भगवान के चरणों को ढंक दें। रात्रि के समय घंटा और शंख बजाकर निम्न मंत्र से भगवान को जगाएँ-

'उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये।

त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥'

'उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।

गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥'

'शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।'

इसके बाद भगवान को तिलक लगाएँ, श्रीफल अर्पित करें, नये वस्त्र अर्पित करें और मिष्ठान का भोग लगाएं फिर कथा का श्रवण करने के बाद आरती करें और फिर भगवान श्रीविष्णु को तुलसी अर्पित करें। इसके बाद बंधु बांधवों के बीच प्रसाद वितरित करें।

तुलसी विवाह

देव उठनी एकादशी को तुलसी एकादश भी कहा जाता है। तुलसीजी को साक्षात् लक्ष्मीजी का निवास माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि जो भी इस मास में तुलसी के समक्ष दीप जलाता है उसे अत्यन्त लाभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसीजी का विवाह भगवान श्रीविष्णु के शालिग्राम रूप से कराया जाता है। मान्यता है कि इस प्रकार के आयोजन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। तुलसी शालिग्राम का विवाह करने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो अपनी पुत्री का कन्यादान करके प्राप्त होता है। शास्त्रों और पुराणों में उल्लेख है कि जिन लोगों के यहां कन्या नहीं होती यदि वह तुलसी का विवाह करके कन्यादान करें तो जरूर उनके यहां कन्या होगी। इस आयोजन की विशेषता यह होती है कि विवाह में जो रीति−रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं साथ ही विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।

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तुलसी विवाह की विधि की बात करें तो जिस गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर मंडप बनाकर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक चुनरी को ओढ़ा दें। इसके अलावा गमले को भी साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद सिद्धिविनायक श्रीगणेश सहित सभी देवी−देवताओं और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद आरती करें।

देव उठनी एकादशी व्रत कथा

भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को अपने रूप पर बड़ा गर्व था। वे सोचती थीं कि रूपवती होने के कारण ही श्रीकृष्ण उनसे अधिक स्नेह रखते हैं। एक दिन जब नारदजी उधर गए तो सत्यभामा ने कहा कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि अगले जन्म में भी भगवान श्रीकृष्ण ही मुझे पति रूप में प्राप्त हों। नारदजी बोले, 'नियम यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रिय वस्तु इस जन्म में दान करे तो वह उसे अगले जन्म में प्राप्त होगी। अतः तुम भी श्रीकृष्ण को दान रूप में मुझे दे दो तो वे अगले जन्मों में जरूर मिलेंगे।' सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को नारदजी को दान रूप में दे दिया। जब नारदजी उन्हें ले जाने लगे तो अन्य रानियों ने उन्हें रोक लिया। इस पर नारदजी बोले, 'यदि श्रीकृष्ण के बराबर सोना व रत्न दे दो तो हम इन्हें छोड़ देंगे।'

तब तराजू के एक पलड़े में श्रीकृष्ण बैठे तथा दूसरे पलड़े में सभी रानियां अपने−अपने आभूषण चढ़ाने लगीं, पर पलड़ा टस से मस नहीं हुआ। यह देख सत्यभामा ने कहा, यदि मैंने इन्हें दान किया है तो उबार भी लूंगी। यह कह कर उन्होंने अपने सारे आभूषण चढ़ा दिए, पर पलड़ा नहीं हिला। वे बड़ी लज्जित हुईं। सारा समाचार जब रुक्मिणी जी ने सुना तो वे तुलसी पूजन करके उसकी पत्ती ले आईं। उस पत्ती को पलड़े पर रखते ही तुला का वजन बराबर हो गया। नारद तुलसी दल लेकर स्वर्ग को चले गए। रुक्मिणी श्रीकृष्ण की पटरानी थीं। तुलसी के वरदान के कारण ही वे अपनी व अन्य रानियों के सौभाग्य की रक्षा कर सकीं। तब से तुलसी को यह पूज्य पद प्राप्त हो गया कि श्रीकृष्ण उसे सदा अपने मस्तक पर धारण करते हैं। इसी कारण इस एकादशी को तुलसीजी का व्रत व पूजन किया जाता है।

-शुभा दुबे







सप्तमी तिथि को ऊषा अर्घ्य देकर सम्पन्न होता है छठ पर्व

  •  प्रज्ञा पाण्डेय
  •  नवंबर 20, 2020   11:57
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सप्तमी तिथि को ऊषा अर्घ्य देकर सम्पन्न होता है छठ पर्व
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छठ महापर्व की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सादगी तथा पवित्रता को खास महत्व दिया जाता है। इसके अलावा पर्यावरण को प्राथिमकता देते हुए नदी के किनारे बांस की टोकरी में सूर्य भगवान की पूजा होती है। इसके अलावा प्रसाद बनाने में चावल, गुड़ और गेहूं का इस्तेमाल किया जाता है।

छठ महापर्व की शुरूआत हो गयी है। आज षष्ठी तिथि है जिसमें सांध्य अर्घ्य दिया जाता है उसके बाद सप्तमी तिथि को ऊषा अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य देवता को अर्घ्य देकर विधिवत पूजा की जाती है उसके बाद छठ महापर्व सम्पन्न हो जाता है तो आइए हम आपको सांध्य तथा ऊषा अर्घ्य के बारे में खास बातें बताते हैं।

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शाम का अर्घ्य

छठ पर्व के तीसरे दिन शाम को अर्घ्य दिया जाता है उसे संध्या अर्घ्य भी कहा जाता है। यह संध्या अर्घ्य चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस पवित्र दिन लोग पूरे दिन पूजा की तैयारियां करते हैं और शाम को नदी या तालाब किनारे परिवार सहित प्रसाद को लेकर जाते हैं। छठ पूजा में खास तौर से प्रसाद बनाया जाता है जिसमें ठेकुआ और कचवानिया बनाया जाता है। प्रसाद में ठेकुआ और कचवानिया के अलावा सभी तरह के मौसमी फल भी रखे जाते हैं। छठ पूजा के दौरान सभी प्रसाद को बांस की टोकरी में रखा जाता है जिसे दउरा कहा जाता है। घर में पूजा करने के बाद एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल, तथा पूजा का सामान दउरा में रख कर घर के पुरुष सदस्य घाट की ओर जाते हैं। प्रसाद के दउरा को सिर पर इसलिए रखा जाता है क्योंकि वह अपवित्र न हो।

नदी या तालाब के किनारे स्थान बनाकर महिलाएं बैठती हैं तथा नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बनाया जाता है और वहां नारियल के साथ पूजा का सामान रखा जाता है। सूरज डूबने से थोड़ी देर पहले व्रती पूजा का सामान लेकर पानी में खड़े हो जाते हैं। उसके बाद अर्घ्य देने के बाद कुछ लोग घाट पर रात भर रूकते हैं लेकिन कुछ लोग अपने दउरा का प्रसाद लेकर घर चले जाते हैं। उसके बाद सप्तमी की सुबह अर्घ्य दिया जाता है। 

सुबह का अर्घ्य 

छठ पर्व के चौथे दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय भक्त उगते सूर्य की पूजा कर अर्घ्य देते हैं। कुछ लोग शाम के अर्घ्य में चढ़ाए गए पकवानों को नए पकवानों से बदल देते हैं लेकिन फलों को नहीं बदला जाता रहै। इस समय भी शाम की तरह ही विधिवत पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। उसके बाद वहां खड़े लोगों को प्रसाद बांट कर घर आते हैं। घर आंकर प्रसाद को अपने पड़ोसियों में वितरित किया जाता है। घर के पास पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है और व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रत तोड़ते हैं। इस तरह व्रत तोड़ने को पारण कहा जाता है। इसके व्रती कुछ अन्न-जल ग्रहण करते हैं।

ऐसे दें अर्घ्य 

सबसे पहले व्रती नदी, तालाब या नहर के पानी में उतर कर खड़े होकर सूर्य का ध्यान करते हैं। उसके बाद बांस और पीतल के बर्तनों में रखे गए प्रसाद को हाथ में लेकर सूर्य भगवान को तीन बार दिखाकर जल को स्पर्श कराते हैं। उसके बाद परिवार के लोग लोटे में दूध भरकर प्रसाद के ऊपर अर्पित करते हैं।

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अर्घ्य का मुहूर्त 

छठ पूजा में अर्घ्य देने का मुहूर्त होता है तथा उसी मुहूर्त के समय अर्घ्य दिया जाता है।

इस साल 20 नवंबर: दिन शुक्रवार- को संध्या अर्घ्य शाम 05:26 बजे दिया जाएगा।

21 नवंबर: दिन शनिवार-  06:49 बजे सुबह का अर्घ्य दिया जाएगा। 

छठ का सामाजिक महत्व

छठ महापर्व की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सादगी तथा पवित्रता को खास महत्व दिया जाता है। इसके अलावा पर्यावरण को प्राथिमकता देते हुए नदी के किनारे बांस की टोकरी में सूर्य भगवान की पूजा होती है। इसके अलावा प्रसाद बनाने में चावल, गुड़ और गेहूं का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही इस महापर्व की विशेषता है कि इसमें वेद और पुराण को प्राथमिकता न देकर किसानों, ग्रामीण जन जीवन और परम्पराओं को महत्व दिया जाता है। 

प्रज्ञा पाण्डेय