रक्षाबंधन पर क्या है भाई की पूजा का सही समय? कैसे करें पूजा?

By शुभा दुबे | Publish Date: Aug 24 2018 5:29PM
रक्षाबंधन पर क्या है भाई की पूजा का सही समय? कैसे करें पूजा?

इस दिन बहनें अपने भाई के हाथ पर राखी बांधकर जहां उनकी उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं वहीं भाई भी सदैव अपनी बहन की रक्षा की प्रतिज्ञा लेता है और उपहार स्वरूप बहन की मनपसंद वस्तु देकर उसे प्रसन्न करता है।

भाई बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है रक्षा बंधन पर्व। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के हाथ पर राखी बांधकर जहां उनकी उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं वहीं भाई भी सदैव अपनी बहन की रक्षा की प्रतिज्ञा लेता है और उपहार स्वरूप बहन की मनपसंद वस्तु देकर उसे प्रसन्न करता है।
 
रक्षा बन्धन के दिन अनुष्ठान का समय- 5.59 से 17.25
रक्षा बन्धन के लिए दोपहर का मुहूर्त- 13.39 से 16.12
 


इस बार रक्षा बन्धन के दिन भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी
 
बहनें इस तरह करें भाई की पूजा
 
बहनों को चाहिए कि वह सुबह हनुमानजी और पितरों की पूजा करें और उनके ऊपर जल, रोली, मोली, चावल, फूल, प्रसाद, नारियल, राखी, दक्षिणा, धूपबत्ती, दीपक जलाकर पूजा करें यदि घर में ठाकुर जी का मंदिर हो तो उसकी पूजा भी करें।
 


सुबह तैयार होकर पूजा की थाली सजाएं। इस थाली में राखी, रोली, हल्दी, चावल और मिठाई रखी जाती है। भाई की आरती उतारने के लिए थाली में दीपक भी रखा जाता है। इस पर्व के दिन बहनें व्रत भी रखती हैं और भाई को राखी बांधने के बाद ही कुछ खाती हैं। भाई को साफ आसन पर बिठा कर उसे टीका करना चाहिए और फिर राखी बांधनी चाहिए। इसके बाद उस पर से कोई भी वस्तु अथवा पैसा न्यौछावर करके उसे गरीबों में दे दें।
 
रक्षाबंधन पर बनते हैं घेवर और शकरपारे
 
इस पर्व की एक और खासियत यह है कि यह धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे है। राखी के रूप में बहन द्वारा बांधा गया धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में समर्थ माना जाता है। रक्षा बंधन के अवसर पर कुछ विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं जैसे घेवर, शकरपारे, नमकपारे और घुघनी। घेवर सावन का विशेष मिष्ठान्न है।


 
रक्षाबंधन पर्व से जुड़ी बड़ी बातें
 
इस पर्व से जुड़े कुछ पौराणिक प्रसंग भी हैं जिनमें प्रमुख है भविष्य पुराण में वर्णित देव दानव युद्ध का प्रसंग। इसमें कहा गया है कि एक बार देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी हो रहे थे। यह देख भगवान इन्द्र की पत्नी इंद्राणी ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर अपने पति के हाथ पर बांध दिया। वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इंद्र इस लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्ति से विजयी हुए थे। माना जाता है कि उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है।
 
रक्षाबंधन से जुड़ा ऐतिहासिक प्रसंग
 
रक्षा बंधन पर्व से जुड़ा एक ऐतिहासिक प्रसंग भी काफी लोकप्रिय है जिसके अनुसार, मेवाड़ की महारानी कर्मावती को एक बार बहादुर शाह की ओर से मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली। रानी चूंकि लड़ने में असमर्थ थीं तो उन्होंने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंच कर बहादुर शाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की।
 
रक्षाबंधन से जुड़ा आध्यात्मिक प्रसंग
 
रक्षा बंधन पर भाई की ओर से बहन की रक्षा का वचन लेने से भी एक प्रसंग जुड़ा हुआ है जिसमें कहा गया है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने इस उपकार का बदला चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया।
 
ऐतिहासिक तथ्य
 
रक्षाबंधन जीवन को प्रगति और मैत्री की ओर ले जाने वाला एकता का एक बड़ा पवित्र त्योहार है। रक्षा का अर्थ है बचाव। मध्यकालीन भारत में जहां कुछ स्थानों पर, महिलाएं असुरक्षित महसूस करती थीं, वे पुरूषों को अपना भाई मानते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधती थीं। इस प्रकार राखी भाई और बहन के बीच प्यार के बंधन को मजबूत बनाती है, तथा इस भावनात्मक बंधन को पुनर्जीवित करती है। इस दिन ब्राह्मण अपने पवित्र जनेऊ बदलते हैं और एक बार पुनः धर्मग्रन्थों के अध्ययन के प्रति स्वयं को समर्पित करते हैं।
 
-शुभा दुबे

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