कब है विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि

कब है विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि

संकष्टी चतुर्थी 24 सितंबर 2021 (शुक्रवार) को है। इसे विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाऐं अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए व्रत रखती हैं। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने से श्रीगणेश सभी विघ्नों का नाश करते हैं।

हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस बार संकष्टी चतुर्थी 24 सितंबर 2021 (शुक्रवार) को है। इसे विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाऐं अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए व्रत रखती हैं। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने से श्रीगणेश सभी विघ्नों का नाश करते हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में खुशहाली आती है। आज के इस लेख में हम आपको संकष्टी चतुर्थी का महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि बताने जा रहे हैं-

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संकष्टी चतुर्थी का महत्व -

भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और सभी विघ्नों का नाश करते हैं। माताएं यह व्रत अपनी  संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन की कामना के लिए रखती हैं। संकष्टी चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा करने से केतु और बुध ग्रह की अशुभता भी दूर होती है। इस दिन गणेश जी की पूजा करने से भगवान जीवन में सुख-शान्ति का आशीर्वाद देते हैं।  

संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त-

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 24 सितंबर सुबह 8 बजकर 30 मिनट से

चतुर्थी तिथि समाप्त: 25 सितंबर सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक

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संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि-

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।

इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर साफ़ कपड़ा बिछाकर इस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।

अब भगवान गणेश के समक्ष धूप-दीप प्रज्वलित करें और उन्हें सिंदूर,अक्षत, दूर्वा और पुष्प अर्पित करें।

पूजा के दौरान ॐ गणेशाय नमः या ॐ गं गणपते नमः मंत्रों का उच्चारण करें।

इसके बाद भगवान गणेश की आरती करें और उन्हें मोदक, लड्डू या तिल से बने मिष्ठान का भोग लगाएं।

शाम को व्रत की कथा पढ़ने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।

- प्रिया मिश्रा