कक्षा में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी को बेहतर बनाना होगा

By शैल्जा चौधरी | Publish Date: Sep 14 2017 9:52AM
कक्षा में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी को बेहतर बनाना होगा
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स्कूल की हिन्दी को देखें तो सच में निराशा हाथ लगती है। हिन्दी को दुरुस्त करना है तो हमें कक्षा की हिन्दी को बेहतर करना होगा। वह तभी हो सकेगा जब हमारे शिक्षक शिद्दत से हिन्दी को कक्षा में बरतें।

यह आलेख हिन्दी दिवस पर भाषण के रूप में लिखना मकसद नहीं है। बल्कि हिन्दी कैसी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है उसकी ओर नजर आकर्षित करना है। अकसर हिन्दी शिक्षण वाला पक्ष हमसे छूट-सा जाता है। हम कविता और कहानी या फिर उपन्यास के जरिये हिन्दी को बचाने की बात करते हैं जबकि हमें इस बात को नज़रंदाज़ नहीं करना चहिये कि किस प्रकार की हिन्दी प्राथमिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण पाठ्यक्रम में एक केंद्रीय भूमिका निभाती है। इसे समझने की आवशकता है। किसी बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में और लोगों के साथ संवाद में, भाषा के आधारभूत कौशल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो क्रमशः सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना आदि, हैं।

भाषा का सबसे महत्वपूर्ण कौशल सुनना है। अगर किसी भाषा को हम सीखना चाहते हैं तो उसे सुनने और बोलने का मौका मिलने पर हम आसानी से उस भाषा को सीख सकते हैं। स्कूल में बच्चे की पढ़ाई हिंदी माध्यम में होती है तो बच्चे को पहली कक्षा से ही हिंदी भाषा सुनने का ज्यादा से मौका देना चाहिए ताकि बच्चे इस भाषा में सहज हो सकें। इसके लिए बच्चे को कहानी सुनाने और बालगीत सुनने और बोलने का मौका दिया जा सकता है। इससे बच्चे के मन में हिंदी भाषा का व्याकरण अपने आप बनता जाएगा। एक समय के बाद बच्चा बहुत आसानी से हिंदी भाषा के छोटे-छोटे वाक्यों का इस्तेमाल कर पाएगा। मगर इसके लिए कक्षा में बच्चे के घर की भाषा को भी जगह देनी होगी ताकि बच्चे अपने अनुभवों को कक्षा में व्यक्त करने में किसी तरह की झिझक या संकोच का अनुभव न करें। बच्चे के घर की भाषा (होम लैंग्वेज) नई भाषा सीखने में बाधक नहीं बल्कि सहायक है। संदर्भ के माध्यम से किसी भाषा को सीखने में काफी आसानी होती है।
 
भाषा को अकसर अभिव्यक्ति का माध्यम भर माना जाता है। इसी के अनुरूप भाषा की कक्षाओं की शिक्षण प्रक्रिया संचालित होती है जहाँ भाषा को केवल एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। पाठ्यपुस्तक साधन की बजाय साध्य बनकर रह जाती हैं और सारा ध्यान भाषा सीखने की बजाय पाठ के पीछे के अभ्यास हल करने तथा उच्चारण और लिपि की शुद्धता तक सीमित होकर रह जाता है। यदि भाषा की प्रकृति और इसके उद्देश्यों को समझा जाए तो विचारों की अभिव्यक्ति भाषा का एक बेहद छोटा व सीमित क्षेत्र है। भाषा हमारे जीवन में इससे कहीं बढ़कर काम करती है। भाषा हमारी समझ का आधार है। यह विचार करने, तर्क करने, चिन्‍तन करने, दूसरे की बात समझने जैसे बहुत से काम करती है। दूसरे शब्दों में भाषा हमारे समूचे जीवन का आधार है। भाषा हमें समाज से जोड़ती है, समाज में अपना स्थान सुनिश्चित करने में मदद करती है और भाषा को इस स्तर तक विकसित करने की जिम्मेवारी विद्यालयों की मानी जाती है। बच्चे जब विद्यालय में आते हैं तो उनकी अपनी भाषा पर (मौखिक) उनका पूर्ण अधिकार होता है, वह अपनी भाषा में वाक्यों की रचना और व्याकरण की पूर्ण समझ रखते हैं। हाँ, किताबों या विद्यालय की भाषा जरूर उनके लिए अपरिचित हो सकती है, उन्हें उसे सीखने में प्रारंभिक स्तर पर कठिनाई भी महसूस हो सकती है। यहाँ बच्चों की भाषा और पुस्तकों की भाषा (मानक भाषा) के बीच पुल बनाने और बच्चों को आसानी से इस पार लेकर आने के लिए भाषा शिक्षक की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। इन कक्षाओं का माहौल और शिक्षण प्रक्रियाएँ ऐसी होनी चाहिए जो बच्चे की भाषा सीखने में रुचि बढ़ाए।
 


कहानियाँ बच्चों की कल्पनाओं को विस्तार देती हैं, उनमें अनुमान लगाने के कौशल को विकसित करती हैं, घटनाओं को क्रमबद्ध करके रखने में मदद करती हैं और कहानी की संरचना को समझने में मदद करती हैं। इसके लिए कक्षा में कहानियाँ सुनने-सुनाने की गतिविधियों को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। शिक्षक के पास विविध कहानियों का संग्रह होना चाहिए जिन्हें वह समय-समय पर कक्षा में सुना सके। यूँ तो यह आदर्श स्थिति मानी जा सकती है लेकिन कक्षा में ऐसा नहीं दिखाई देता। कहानी सुनाते समय उसे किसी स्थान पर रोक देना और आगे क्या हुआ होगा? या इस कहानी को पूरा करो जैसे प्रश्न बच्चों के सामने रखे जा सकते हैं जो बच्चों को काल्पनिक संसार की अनुभूति करने और उसे शब्द देने को प्रेरित करेंगे। चित्र कहानी बनाना, चित्र कहानी को शब्द देना, दो चित्रों में अन्‍तर खोजना आदि इसी तरह की गतिविधियाँ हो सकती हैं जो भाषा को निखारने में मदद कर रही होंगी।
 
स्कूल की हिन्दी को देखें तो सच में निराशा हाथ लगती है। हिन्दी को दुरुस्त करना है तो हमें कक्षा की हिन्दी को बेहतर करना होगा। वह तभी हो सकेगा जब हमारे शिक्षक शिद्दत से हिन्दी को कक्षा में बरतें। जहाँ से बच्चे स्कूल में आते हैं वहां की हिन्दी और स्कूल की हिन्दी में एक फर्क साफ़ देखा जा सकता है। किसी भी साहित्यिक रचना को पढ़ाते समय स्वयं अर्थ बताने की बजाय उसके सन्‍दर्भों को बच्चों के पूर्व ज्ञान से जोड़कर, अनुमान लगाकर चर्चा द्वारा बच्चों से ही अर्थ निर्माण करवाने का प्रयास करवाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे विषयवस्तु को केवल रटने की बजाय समझकर पढ़ पा रहे होंगे, अर्थ समझने के कारण रचना में निहित भाव को भी ग्रहण कर पा रहे होंगे और इस अर्थ को स्वयं सृजित करने का आनन्‍द भी ले पा रहे होंगे। जब उन्हें विविध प्रकार के साहित्य से परिचित करवाया जाए (पुस्तकों या अन्य रचनाओं की कटिंग के द्वारा) तो वे स्व प्रयास से उनमें निहित अन्‍तर को समझ सकें और उनका आनन्‍द ले सकें यहीं शिक्षक का प्रयास होना चाहिए। भाव किस तरह अभिव्यक्ति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं यह भी उदाहरणों द्वारा बताया जा सकता है, किसी नाटक या कहानी की भावपूर्ण प्रस्तुति द्वारा भी इस बात को सामने रखा जा सकता है।
 
आज की तल्ख़ हकीकत यह है कि बच्चों को हिन्दी लिखने और पढ़ने में खासा दिक्कत आती है। ऐसा इसलिए भी होता है कि हमारे बच्चों को सही हिन्दी सुनने और लिखने का अवसर ही नहीं मिलता। जिस तरह की हिन्दी बच्चों के परिवेश में मिलती है उसी से उनकी हिन्दी बनती और संवरती है। सुसंगत लिखना भाषा के आवश्यक कौशलों में से एक है मगर यहाँ सुसंगतता का आशय केवल लिपि या व्याकरण की शुद्धता से ही नहीं है वरन बच्चे अपनी बात को कितनी अच्छी तरह से लिखकर बता पा रहे हैं यह देखना महत्वपूर्ण है। प्राथमिक कक्षाओं में अपनी बात लिखने के अवसर उपलब्ध कराए जाने आवश्यक हैं। बच्चे जो कुछ लिखते हैं उनमें की गई वर्तनीगत गलतियों के लिए बार-बार टोकने या कापी पर लाल निशान बनाने से बच्चे हतोत्साहित हो सकते हैं और अपने मन की बात लिखने में संकोच करने लगते हैं। इससे बचने के लिए भाषा शिक्षक का यह दायित्व बनता है कि वह बच्चे की अभिव्यक्ति को वर्तनीगत अशुद्धियों से अधिक महत्व दें, गलतियों को केवल निशान लगाकर अंकित करने की बजाय उनके कारणों को समझें (बच्चे वह गलती क्यों कर रहे हैं) और उनका निदान करने का प्रयास करें। अक्सर देखा गया है कि बच्चे को जितने अधिक लिखने-पढ़ने के अवसर मिलते हैं, शब्दों की छवियाँ उसके मस्तिष्क में अंकित हो जाती हैं और वह अपने ही प्रयासों से वर्तनीगत अशुद्धियाँ दूर कर लेता है। यहाँ शिक्षक को बस इतना करना होता है कि उसमें पढ़ने-लिखने की रुचि भर जागृत करें।
 


वास्तव में भाषा हमारे जीवन का आधार है अतः भाषा शिक्षकों को बहुत संवेदनशील और रचनात्मक होना चाहिए ताकि वे न केवल भाषा शिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकें वरन बच्चे को सुसंगत भाषा का उपहार भी प्रदान कर सकें। हिन्दी को नारों से बाहर निकल कर भाषा के तकनीक पक्ष की और बढ़ने की जरूरत है। विभिन्न तकनीक के मार्फ़त आज हिन्दी वैश्विक हो रही है। उसे हमें उदार मन से स्वीकार करना होगा। शुद्धता के आग्रह को छोड़ कर हिन्दी की कक्षायी हकीकत को स्वाकीर करने होगा। वर्ना हर वर्ष तो हिन्दी दिवस मनाया ही जाता है यह एक वर्ष और सही। लेकिन इससे हिन्दी और हिन्दी पढ़ने वाले बच्चों को कोई ख़ास हासिल नहीं हो सकेगा।
 
शैल्जा चौधरी 
हिन्दी भाषा विशेषज्ञ 
इन सर्विस टीचर्स एजुकेशन इंस्टिट्यूट 


डेल्ही 

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