म्यांमार में उठ रही बाधित शांति प्रक्रिया शुरू करने की मांग

आंग सांग सू की की बाधित शांति प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने के मकसद से बुधवार को म्यांमार के जातीय विद्रोही समूहों के सैंकड़ों प्रतिनिधि राजधानी में वार्ता करने के लिये एकजुट हुए।

नैप्यीदा। म्यांमार में कई महीनों की भीषण लड़ाई के बाद आंग सांग सू की की बाधित शांति प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने के मकसद से बुधवार को म्यांमार के जातीय विद्रोही समूहों के सैंकड़ों प्रतिनिधि राजधानी में वार्ता करने के लिये एकजुट हुए। यह बातचीत, देश के संकटग्रस्त सीमाई क्षेत्रों में संघर्ष खत्म करने का सू की का दूसरा प्रयास है, जहां कई जातीय समूहों ने करीब सात दशक से देश के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है।

नोबेल पुरस्कार विजेता सू की को म्यांमार में कई पीढ़ियों बाद हुए आम चुनावों में स्वतंत्र रूप से चुनी गयी सरकार की पहली प्रमुख बने को एक साल से अधिक समय बीत गया लेकिन उनकी प्रमुख नीति पर मामूली प्रगति ही देखी गयी है। जातीय मामलों के विशेषज्ञ एमजी एमजी सोए ने कहा, ‘‘मौजूदा हालात में सबसे महत्वपूर्ण होगा अर्थपूर्ण सम्मेलन आयोजित करना।’’ उन्होंने कहा, ‘‘किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाते हैं तो हम इसे सफल बैठक नहीं कह सकेंगे।’’ कई सशस्त्र समूहों ने शिकायत है कि सू की ने उनकी चिंताएं नहीं सुनीं और वह उसी सेना के साथ बेहद करीब से काम कर रही हैं जिसने करीब आधी सदी से देश पर सख्त शासन किया।

गौरतलब है कि विद्रोही समूह सैन्य शासन को बेहद नापसंद करते हैं। इनमें से किसी के भी सू की द्वारा बढ़ाये गये राष्ट्रीय युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करने की संभावना नहीं है। इस विवादित समझौते को सबसे पहले पूर्ववर्ती सैन्य समर्थित सरकार ने पेश किया था। लेकिन वे राज्यों को अपना संविधान तैयार करने देने के मुद्दे पर पहली बार बात करेंगे। इस कदम को पर्यवेक्षकों ने महत्वपूर्ण और आगे बढ़ने की दिशा में प्रतीकात्मक कदम बताया है। इंस्टीट्यूट ऑफ पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज से आंग्सशुमान चौधरी ने कहा, ‘‘म्यांमार के औपनिवेशिक काल पश्चात के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक कदम है और यह संघवाद का नया स्तर दर्शाता है।’'

Disclaimer:प्रभासाक्षी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।


अन्य न्यूज़