बड़ी राजनीतिक ताकत कैसे बनी एक देश के लिए जी का जंजाल और इस तरह से लग गई श्रीलंका की लंका, तारीखों के आइनें से समझें

बड़ी राजनीतिक ताकत कैसे बनी एक देश के लिए जी का जंजाल और इस तरह से लग गई श्रीलंका की लंका, तारीखों के आइनें से समझें
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श्रीलंका में मौजूदा संकट की शुरुआत 2019 में राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के तहत सरकार बनने के बाद शुरू हुई थी। श्रीलंका के खजाने में आमद की तुलना में अधिक बहिर्वाह देखा गया क्योंकि उन्होंने चुनावी वादे के तहत कर कटौती की घोषणा की।

श्रीलंका में जारी राजनीतिक उठापठक के बीच रानिल विक्रमसिंघे ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभाल ली है। उन्हें राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई है। रानिल विक्रमसिंघे इससे पहले भी चार बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लेकिन, इस बार उनकी नियुक्ति को काफी अहम माना जा रहा है। विक्रमसिंघे 1994 से यूनाइटेड नेशनल पार्टी के सर्वोसर्वा हैं। अनुभवी राजनेता माने जानेवाले विक्रमसिंघे चार  बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। हालांकि साल 2019 में आंतरिक कलह व अन्य कारणों से उनको प्रधानंत्री पद छोड़ना पड़ा था। विक्रमसिंघे राजपक्षे परिवार के करीबी माने जाते हैं। 

श्रीलंका का राजपक्षे परिवार 

श्रीलंका की राजनीति के वटवृक्ष यानी राजपक्षे परिवार की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे हैं। उनके तीन और सगे भाई हैं। इनमें सबसे बड़े हैं चमल राजपक्षे जो पुरानी सरकार में कृषि मंत्री थे। उनसे छोटे हैं महिंद्रा राजपक्षे जो कि श्रीलंका के प्रधानमंत्री थे। फिर गोटाबाया राजपक्षे का नंबर आता है। बासिल राजपक्षे का नंबर चौथे पर आता है और वो देश की सरकार में वित्त मंत्री का काम संभाल रहे थे। इसके अलावा महिंद्रा राजपक्षे के पुत्र नवल राजपक्षे भी सरकार में खेल मंत्री थे। कृषि मंत्री चमल राजपक्षे के पुत्र शशिद्र राजपक्षे भी सरकार में जूनियर मिनिस्टर हैं। इस हिसाब से देखें तो राजपक्षे परिवार के छह सदस्य सीधे तौर पर सरकार में मौजूद थे जिनमें एक राष्ट्रपति भी शामिल है। ये तो वे लोग हो गए जिनका सीधा खून का रिश्ता है। सरकार में ऐसे भी बहुत से मंत्री थे जिनका राजपक्षे परिवार से खून का रिश्ता तो नहीं लेकिन कोई न कोई दूर का रिश्ता तो जरूर है। हालांकि वर्तमान हालात में सभी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और रानिल विक्रमासिंघे नए प्रधानमंत्री बनाए गए हैं। 

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महिंदा राजपक्षे को देश की बहुसंख्यक सिंहली आबादी का नेता माना जाता है। श्रीलंका में लगभग तीन दशकों के गृहयुद्ध को समाप्त करने के लिए उन्हें वॉर हीरो के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने ही 2009 में राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान तमिल टाइगर विद्रोहियों को कुचल दिया था। हालांकि, उनके ऊपर नरसंहार करने का आरोप भी लगा, लेकिन सत्ता पर काबिज महिंदा ने इसे नकार कर उत्तरी श्रीलंका में सैन्य अभियान को जारी रखा। इसके साथ ही महिंद्र राजपक्षे पर भ्रष्टाचार के भी ढेरो आरोप लगे। एयरफोर्स का आरोप था कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान महिंद्रा राजपक्षे और उनके परिवार ने जनता के 22.78 लाख रूपये का इस्तेमाल अपनी निजी यात्रा के लिए किया। 

गोटबाया राजपक्षे 1971 में श्रीलंका की सेना में अधिकारी कैडेट के रूप में शामिल हुए। 1991 में वह सर जॉन कोटेलवाला रक्षा अकादमी के उप कमांडेंट नियुक्त किए और 1992 में सेना से सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर बने रहे। वह 2005 में अपने भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति चुनाव अभियान में मदद के लिए स्वदेश लौटे और श्रीलंका की दोहरी नागरिकता ली। 2015 में इंटरपोल ने खुलासा किया था कि गोटबाया राजपक्षे के रक्षा सचिव रहते हुए सैन्य खरीद में 10 मिलियन डॉलर का घपला हुआ था। 

बासिल राजपक्षे अपने भाई की सरकार में वित्त मंत्री रह चुके हैं। सरकारी ठेकों में कथित कमीशन लेने की वजह से उन्हें मिस्टर 10 परसेंट भी कहा जाता है। बासिल राजपक्षे को 2010 से 2015 तक महिंदा राजपक्षे प्रशासन का बौद्विक आधार स्तंभ माना जाता था। बासिल के पास अमेरिका और श्रीलंका की दोहरी नागरिकता है।

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श्रीलंका संकट 

श्रीलंका में मौजूदा संकट की शुरुआत 2019 में राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के तहत सरकार बनने के बाद शुरू हुई थी। श्रीलंका के खजाने में आमद की तुलना में अधिक बहिर्वाह देखा गया क्योंकि उन्होंने चुनावी वादे के तहत कर कटौती की घोषणा की। अब हालत यह है कि दूध, दाल, रोटी और ईंधन जैसी आवश्यक वस्तुओं के लिए नागरिक आसमान छूती कीमतों का भुगतान कर रहे हैं। कुछ दिन पहले तक एक लीटर नारियल तेल 350 रुपये में मिलता था। अब इसकी कीमत 900 रुपये प्रति लीटर हो गई है। द्वीप राष्ट्र अब कर्ज की बढ़ती स्थिति, एक खाली खजाना, अभूतपूर्व मुद्रास्फीति और हिंसक विरोध के साथ एक गंभीर स्थिति में है। 

श्रीलंका की गलतियां

नवंबर 2019 में सरकार बनने के बाद राष्ट्रपति राजपक्षे ने करों को 15 फीसदी से घटाकर आठ फीसदी कर दिया। इससे देश को सालाना राजस्व में 60 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एक और गलती उनके लिए प्रावधान किए बिना वादे करना था। श्रीलंका पर्यटन और आयात पर निर्भर देश है। जब कोविड -19 महामारी के दौरान पर्यटन ठप हो गया और सभी क्षेत्रों में आय में भारी गिरावट आई, तो बेरोजगारी बढ़ गई। खजाना खाली हो गया। श्रीलंका के लिए माल आयात करना मुश्किल हो गया। तीसरी बड़ी गलती अपने बढ़ते कर्ज पर कड़ी निगरानी रखी जा रही थी। श्रीलंका पर विदेशी कर्ज दो साल में 175 फीसदी तक बढ़ गया है।

श्रीलंका के राजनीतिक संकट

नवंबर 2019: चुनाव जीतते ही राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने टैक्स में भारी कटौती की।

2020: टैक्स कटौती से क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने श्रीलंका की रेटिंग गिरा दी।

2020: कोविड के कारण टूरिजम ठप हुआ, आय घटने लगी तो विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल होने लगा। 

अप्रैल 2021 : सरकार ने सभी केमिकल फर्टिलाइजर बैन कर दिए जिससे कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ।

फरवरी 2022: श्रीलंका के पास सिर्फ 2.31 अरब डॉलर बचे, जबकि 4 अरब डॉलर की कर्ज अदायगी करनी थी। सरकार ने आयात बंद कर दिया। महंगाई चरम पर पहुंच गई, कई घंटे का पावर कट लगने लगा, ईंधन की किल्लत हो गई। श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़कर 51 अरब डॉलर हो गया।

31 मार्च, 2022 : प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के निजी आवास पर ईंट फेंकी, आगजनी की।

1 अप्रैल: राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल की घोषणा की।

9 अप्रैल: हजारों लोगों ने राष्ट्रपति कार्यालय की ओर मार्च किया और उनसे इस्तीफे की मांग की।

9 मई: महिंदा राजपक्षे ने अपना इस्तीफा श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सौंप दिया

9 मई: देश भर में हिंसा भड़की, आठ लोग मारे गए, देश भर में कर्फ्यू लगा दिया गया।

12 मई: श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री घोषित किए गए। 






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