कट्टरवादी विचारों से समझौता नहीं करता है अखुंद, बामियान को कर चुका है बर्बाद, मिली अफगानिस्तान की बागडोर

Mullah Mohammad Hasan Akhund

तालिबान के शुरुआती वर्षों में अखुंद ने आंदोलन और शूरा बैठकों की व्यवस्था करने के लिए वित्तीय और रसद सहायता प्रदान की। पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ तालिबान के राजनयिक संपर्क स्थापित करने का श्रेय भी अखुंद को दिया जाता है।

नई दिल्ली। तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जे के लगभग तीन हफ्ते बाद सात सितंबर को सरकार का ऐलान करते हुए अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को देश की बागडोर सौंप दी। तालिबान की पिछली सरकार में विदेश मंत्री समेत कई अहम पद संभाल चुके अखुंद को संगठन की शक्तिशाली सूरा परिषद के सदस्य के तौर पर ‘बामियान में बुद्ध प्रतिमाओं को बर्बाद’ करने वाले फैसले समेत फतवों की फेहरिस्त के लिए भी जाना जाता है। तालिबान ने वर्ष 2001 में बामियान घाटी में चट्टानों और चूना पत्थरों से बनी बुद्ध की दो विशाल खड़ी मूर्तियों को नष्ट कर दिया था। लगभग 71 वर्ष के अखुंद तालिबान के सबसे पुराने नेताओं में से एक हैं और उन्हें संगठन के संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर समेत उन तीन लोगों में शुमार किया जाता है जिन्होंने तालिबान आंदोलन के विचार की कल्पना की। इंटरनेट पर प्रसारित तस्वीरों में अखुंद परंपरागत अफगान परिधान में आम अफगान की तरह ही नजर आते हैं, लेकिन रुतबे और रुआब में वह तालिबान के तमाम दूसरे ओहदेदारों पर ‘बीस’ साबित हुए हैं। 

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तालिबान के शुरुआती वर्षों में अखुंद ने आंदोलन और शूरा बैठकों की व्यवस्था करने के लिए वित्तीय और रसद सहायता प्रदान की। पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ तालिबान के राजनयिक संपर्क स्थापित करने का श्रेय भी अखुंद को दिया जाता है। मुल्ला मोहम्मद उमर और अन्य तालिबान नेताओं के उलट अखुंद 1980 के दशक के सोवियत-अफगान युद्ध शामिल नहीं रहे। तालिबान ने 90 के दशक में जब काबुल पर कब्जा किया तो संगठन ने मुल्ला रब्बानी के नेतृत्व में अपनी पहली सरकार गठित की, जिसमें अखुंद को विदेश मंत्री बनाया गया। कैंसर से रब्बानी की मृत्यु के बाद अखुंद कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। पूरे देश पर काबिज नहीं हो पाने के कारण तालिबान ने 1996 से 2001 तक रही अपनी इस सरकार को कार्यवाहक सरकार कहा। तालिबान की सरकार को अमेरिका नीत बलों द्वारा 2001 में सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद भी अखुंद ने संगठन और इसकी सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था रहबरी शूरा में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति बनाए रखी।

मुल्ला उमर के निधन के बाद, उन्होंने संगठन के अगले प्रमुख मुल्ला मंसूर के करीबी सहयोगी के रूप में भी काम किया। एक ड्रोन हमले में मंसूर की मौत के बाद, मुल्ला हेबतुल्लाह अखुंदजादा तालिबान प्रमुख बने। अखुंद को वर्तमान में तालिबान के शीर्ष नेता मुल्ला हेबतुल्लाह अखुंदजादा का करीबी माना जाता है। अखुंद संगठन में कितने प्रभावशाली है इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर उनके नाम का प्रस्ताव अखुंदजादा ने रखा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आंकड़ों व विवरण के अनुसार मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद का जन्म दक्षिणी अफगानिस्तान के पशमुल में हुआ। तब यह इलाका पंजवेई जिले में था और अब कंधार प्रांत के झारी जिले के तहत आता है। 

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अखुंद को 1747 में दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना करने वाले अहमद शाह दुर्रानी के पश्तून वंश का माना जाता है। अखुंद के चेहरे से भले ही पहली नजर में सौम्यता झलकती नजर आ सकती है, लेकिन अपने कट्टरवादी विचारों और मान्यताओं को लेकर वह कोई समझौता करते नहीं दिखे हैं। एक रूढ़िवादी धार्मिक विद्वान अखुंद की मान्यताओं में महिलाओं पर प्रतिबंध और धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिक अधिकारों से वंचित करना शामिल रहा है। 1990 के दशक में तालिबान द्वारा अपनाए गए उनके आदेशों में महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाना, लैंगिक अलगाव को लागू करना और सख्त धार्मिक परिधान को अपनाना शामिल था। हालांकि इस बार तालिबान द्वारा अपना रवैया बदलने और पिछली गलतियों को नहीं दोहराने की बात कही जा रही है। तालिबान के अन्य नेताओं की तरह अखुंद पर भी संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगाया है। अखुंद ने इस्लाम पर कई पुस्तकें भी लिखी हैं।

डिस्क्लेमर: प्रभासाक्षी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।


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