जो कभी अफगानिस्तान की सुरक्षा में तैनात थे, आज उन्हें सुरक्षा की जरूरत है

Those who protected Afghanistan now need protection for themselves
प्रतिरूप फोटो
कुछ साल पहले काबुल में चलती हुई मिनी बस पर विस्फोटकों से भरी सेडान चला रहे आत्मघाती आतंकियों ने हमला किया था। हमले में एक नेपाली सुरक्षाकर्मी अमृत रोकाया छेत्री के बाएं कान में छर्रे का एक टुकड़ा चुभ गया था, वो बच गया और इन दिनों अपने गांव रह रहा है।

कुछ साल पहले काबुल में चलती हुई मिनी बस पर विस्फोटकों से भरी सेडान चला रहे आत्मघाती आतंकियों ने हमला किया था। हमले में एक नेपाली सुरक्षाकर्मी अमृत रोकाया छेत्री के बाएं कान में छर्रे का एक टुकड़ा चुभ गया था, वो बच गया और इन दिनों अपने गांव रह रहा है। वहीं 2016 में अफगानिस्तान में कनाडा के दूतावास के सामने बस में ब्लास्ट हुआ, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई थी। मरने वालों में 13 नेपाली थे।

41 वर्षीय छेत्री कहते हैं कि उस घटना को आज भी नहीं भुला पाया हूं। वे अफगानिस्तान के सिक्योरिटी में थे। इन दिनों अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में नेपाली गोरखा सुरक्षाकर्मी फंसे हुए हैं, अब उन्हें वहां से निकलने के लिए मदद की जरूरत है। नेपाल अपने हजारों लोगों को अफगानिस्तान से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है, कुछ रिपोट्स के मुताबिक तालिबान पश्चिमी देशों के साथ काम करने वालों पर नजर रख रहा है।

नेपाल के नए प्रधान मंत्री, शेर बहादुर देउबा की सरकार पश्चिमी देशों से नेपाली सुरक्षा गार्डों को बचाने के लिए आग्रह कर रही है। नेपाल के कानून, न्याय और संसदीय मामलों के मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की ने कहा कि हमने उन्हें निकालने के लिए राजनयिक प्रयास किए हैं। अफगानिस्तान में काम कर रहे नेपाल के एक सुरक्षा गार्ड कमल दीप भारती ने पिछले हफ्ते कहा कि हवाई अड्डे तक पहुंचना मुश्किल है। हम पहले ही तालिबान को अपने हथियार सौंप चुके हैं। तालिबान ने उस होटल को घेर लिया है, जहां हम ठहरे हुए हैं। नेपाल ने पिछले हफ्ते राहत की सांस ली, जब उसके 100 से अधिक नागरिकों को संयुक्त राज्य अमेरिका ने वहां से निकाला।  

गोरखा सैनिकों ने तालिबान के खिलाफ, ब्रिटिश या अन्य बलों के साथ लड़ाई लड़ी थी। गोरखाओं के इतिहास के लेखक टिम आई गुरुंग के अनुसार, 2001 -14 के बीच ये कई लड़ाईयों में शामिल थे। नेपाल ने 2016 के आत्मघाती बम विस्फोट के बाद अफगानिस्तान में अपने नागरिकों को निजी सुरक्षा कार्य से रोकने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में पश्चिमी देशों द्वारा दबाव बनाने के बाद नेपाल ने प्रतिबंध हटा लिया था।    

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