सही वही जो महाजन कही (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Aug 28 2018 4:18PM
सही वही जो महाजन कही (व्यंग्य)
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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आम लोग ज़्यादा हैं ख़ास लोग कम। यह ख़ास बड़े लोग समय समय पर बहुत शक्तिशाली वक्तव्य देते हैं जिनसे इतिहास की आंखें खुल जाती हैं और वह बदलने को व्याकुल हो उठता है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आम लोग ज़्यादा हैं ख़ास लोग कम। यह ख़ास बड़े लोग समय समय पर बहुत शक्तिशाली वक्तव्य देते हैं जिनसे इतिहास की आंखें खुल जाती हैं और वह बदलने को व्याकुल हो उठता है। कभी कहते हैं फलां युद्ध में ‘वह’ नहीं ‘हम’ जीते थे। वह लड़ाई ‘वहां’ नहीं ‘यहां’ हुई थी। यह हेरा फेरी ‘उनके’ समय की है। एक विशिष्ट महा जन दिलचस्प रहस्योद्घाटन कर चुके हैं कि इंसानों के विकास से सम्बंधित महा जन चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से ग़लत हैं। उनके इस कहने का बुरा माना गया बल्कि यह तो महत्वपूर्ण घोषणा थी जिस पर सही तरीके से सोचकर एक कमेटी खड़ी करने  का संजीदा काम होना चाहिए था।

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मानव विकास के इतिहास में कुछ मूल्यवान संशोधन होने से रह गए। स्कूल कालेज के पाठ्यक्रमों से भी अनेक झूठ भरे अध्याय हटा देने की ज़रुरत है। जो बात सच कहने देखने बोलने लिखने पढ़ने में है वह झूठ में कहां। पूर्वजों ने कहीं भी मौखिक या लिखित रूप से किसी बंदर के इंसान बनने का उल्लेख नहीं किया है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि मेरी दादी मुझे बचपन में प्यार से बंदर ज़रूर बुलाती थी पर तब भी मेरी पूंछ नहीं थी अब भी नहीं है, हां रोज़ाना कई बार मुझे लगता ज़रूर है कि जानवर होना अब ज़्यादा सुरक्षित हो चुका है। ख़ास तौर पर कुत्ता हो जाना क्योंकि अभी भी मिसाली वफादारी की जन्मजात प्रवृति उसमें ज्यों की त्यों है। वैसे यह भी सही हो सकता है कि सभी इंसान बंदरों से विकसित न हुए हों क्योंकि कुछ की आदत शेर, भेड़िए या सांप या सियार या अन्य से भी मिलती हैं।
 
खैर, महाजन को उनसे भी ज्यादा महाजन समझाते रहते हैं कि विकास के मौसम में वैज्ञानिक सिद्धांतों को गंभीरता से लेना चाहिए। नए वक़्त में जब नए सिद्धांत उगा लिए गए हों तो सभी अवांछित सिद्धांतों को कलम कर नए सिद्धांतों की पौध रोप देनी चाहिए। ईमानदार आकलन किया जाए तो दुनिया व हमारे देश के अनेक किस्म के इतिहासों में कितने ही ऐसे अध्याय हैं जो ज्ञानी जनों को ग़लत लगते हैं उन्हें तत्काल हटाना चाहिए। आज चहुँ ओर दिन रात चौबीस घंटे हर लम्हा विकास का डंका बज रहा है, सेंसेक्स व निफ्टी बड़ी बड़ी कुलांचे मारते रहते हैं, धर्म में युग सफलता से गतिमान है नए सुलझे हुए ज्ञानी जन सर्वत्र उपलब्ध हैं। समाज की ज़्यादातर समस्याएं डर के मारे बेहोश हैं। देश में सोशल मीडिया पर, दर्जनों चैनलों पर असली मंथन के लिए हमेशा नए विचारों व मुद्दों की ज़रुरत रहती है। देश के इतिहास में बार बार परिवर्तन संभव हो गए तो प्रेरित होकर दुनिया के अन्य लोग भी अपने इतिहास में तरह तरह के सही संशोधन करने की प्रेरणा हम से लेंगे।


 
यह भी ज्ञानी जन ही कहते रहे हैं कि अच्छा आदमी ज़रूरी नहीं बड़ा भी हो हां बड़ा आदमी तो अच्छा ही होगा। महाजन जो भी एक बार कह देते हैं उसे आम जन बार बार जपते हैं। अच्छा आदमी संभवतः बड़ा आदमी न हो इसलिए उसकी बात मानना लाज़मी नहीं होता। अभी हाल ही की बात है मुझ जैसे छोटे व आम आदमी ने स्कूल के अध्यापकों व सरकारी अफसरान को कितनी बार गुज़ारिश की कि किसी भी कार्यक्रम के विजेताओं को घर के आसपास सहजता से पनपने वाले यदि हो सके तो औषधीय पौधे पुरस्कार में दिया करें ताकि उनके अड़ोस पड़ोस में हरियाली बढ़े और प्रकृति से उनका प्रेम, मगर कोई नहीं माना। अधिकतर ने कहा अजी पुरस्कार में सब ट्रॉफी या नकद चाहते हैं ताकि विजेता उसे मेहमान कक्ष में रखें और हर मेहमान उसे देखे। कुछ ने कहा आपने क्या लेना। मगर मगर मगर अभी हाल में ही एक ज्यादा  उच्च अधिकारी ने अधिकारियों की मीटिंग लेते हुए कहा तो देर नहीं हुई। पिछले कल ही हुए राज्य स्तरीय उत्सव में सभी विजेताओं को पुरस्कार स्वरूप औषधीय पौधे प्रस्तुत किए गए जिसे सभी ने नाखुश होते हुए उच्च अधिकारी के हाथों मुस्कुराते हुए प्राप्त किया। कुछ को अच्छा भी लगा। बहुतों ने दबी ज़बान से कहा, ‘क्या ज़माना आ गया है अब पुरस्कार स्वरूप पौधे मिलने लगे हैं’ दूसरे बोले, ‘समाज के लिए जो बड़े लोग सोचें, करें, दें सब सोच समझ कर ही किया जाता है’ कुल मिलाकर बढ़िया बात यही है कि सही वही है जो महाजन सोचें कहें करें।
 
-संतोष उत्सुक

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