हिन्दी के असली सेवक (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Sep 25 2018 4:53PM
हिन्दी के असली सेवक (व्यंग्य)
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हिन्दी मंथ सितंबर हिन्दी के ज़्यादा विकास के लिए रखा गया है इसलिए हिन्दी माह में जिन विभागों की बिल्डिंग्स का उद्घाटन होता है उनमें से एक दो के नामपट्ट हिन्दी को खुश करने के लिए हिन्दी में भी लिखवा दिए जाते हैं।

जिम्मेदार राजनीतिज्ञों ने आपस में और दूसरी पार्टी के नेताओं के साथ, अपने भाषाई मतभेद लड़ाए रखने के बावजूद हिन्दी विकास की राह नहीं छोड़ी। हिन्दी विकास के साथ ही उनके व्यक्तिगत व सामाजिक स्वार्थों का निकास भी हो पाता है तभी यह लोग बहुत ईमानदारी से मेहनत करते हैं। आम तौर पर सरकारी इमारतों के नामपट्ट अँग्रेजी में ही लिखे होते हैं। हिन्दी मंथ सितंबर हिन्दी के ज़्यादा विकास के लिए रखा गया है इसलिए हिन्दी माह में जिन विभागों की बिल्डिंग्स का उद्घाटन होता है उनमें से एक दो के नामपट्ट हिन्दी को खुश करने के लिए हिन्दी में भी लिखवा दिए जाते हैं। हमारे ज़िला मुख्यालय नगर स्थित, ज़िला भाषा अधिकारी को यह महत्त्वपूर्ण कार्य सौंपा गया कि वह शहर में नवनिर्मित, ‘वर्किंग वूमेन होस्टल’ की तरफ आने वाली सड़क के मोड़ पर और बिल्डिंग के बाहर लगने वाले नामपट्ट को सही हिन्दी में लिखवाएं। क्यूंकि कई बार ऐसा हो जाता है कि ज़िम्मेदारी निभाने के दौरान, फेसबुक खेलते हुए या यू टयूब पर गाने देखते, सुनते हुए ध्यान भटक जाता है। पेंटर और ब्रश मिलकर कुछ का कुछ लिख देते हैं । सरकारी भाषा अधिकारी जिनके कार्यालय सम्बन्धी उत्तरदायित्त्वों में हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार भी शामिल है, का नाम संभव कुमार आज़ाद रहा। वे हिन्दी व उर्दू की मां कही जाने वाली संस्कृत के भी अनुभवी ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाते हुए नामपट्ट का मसौदा हिन्दी में बनाकर, लिखने को दे दिया।
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पेंटर समझदार पढ़ा लिखा रहा व फेकबुक पढ़ते हुए काम नहीं करता था, उन्होंने अधिकारी को सुझाव दिया कि ‘वर्किंग वूमेन होस्टल’ को हिन्दी में ‘कार्यकारी महिला छात्रावास’ न लिखकर यदि ‘कामकाजी महिला छात्रावास’ लिखा जाए तो ज्यादा बेहतर रहेगा क्यूंकि कार्यकारी का अर्थ, आम लोगों द्वारा एग्ज़ीक्यूटिव लिया जाएगा। यह सुनकर ज़िला भाषा अधिकारी के दिमाग़ का संकीर्ण हिस्सा तुरंत सावधान हो गया, उन्होंने तपाक से कहा कामकाज तो उर्दू भाषा का शब्द है। पेंटर ने कहा हमारा देश हिन्दुस्तानी ही तो बोलता, लिखता है और फिर कई शहरों में जहां जहां ऐसे होस्टल हैं, मैंने खुद पढ़ा है, वर्किंग को कामकाजी लिखा गया है जोकि प्रचलित शब्द है। हिन्दी के प्रचार प्रसार में कर्मठता व संजीदगी से कार्य कर रहे भाषा अधिकारी ने कहा कामकाजी शुद्ध हिन्दी का शब्द नहीं है आप इसकी जगह कार्यरत, कर्मरत या प्रशासनिक कुछ भी लिख दें।
 


पेंटर की सामान्य समझ गलत शब्द के प्रयोग को रोक रही थी। उसने फिर निवेदन किया कि हिन्दी भाषा में उर्दू, संस्कृत, अंग्रेज़ी, अरबी, फारसी, पश्तो, तुर्की, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, यूनानी व इटेलियन जैसी अनेक भाषाओं के शब्द खप चुके हैं तभी यह भाषा समृद्ध हुई है। एक दूसरी भाषा के शब्दों को पचा जाने की सामर्थ्य ही किसी भाषा को समृद्ध बनाकर उसकी स्वीकार्यता बढ़ाते हैं। हमें हिन्दी की पाचन शक्ति बनाए रखनी चाहिए।
 
भाषा के अधिकृत अधिकारी, जो पेंटर को अब ज़्यादा तुच्छ नज़रों से देख रहे थे, को लगा कि यह आम आदमी अपने तुच्छ ज्ञान से उनके उच्च स्तरीय ज्ञान व सरकार को चैलेंज कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट पूछा, ‘सरकारी अफसर मैं हूं या तुम हो’। ‘आप हैं सर’, पेंटर ने सोचा भैंस के आगे बीन बजाने से आज भी क्या होगा। उसने बड़े अदब से सरकारी कुर्सी से माफी मांग कर, हुक्म बजा कर अपनी रोज़ी सलामत रखने में ही भलाई समझी। सरकार ने जैसा चाहा वैसा ही हुआ। हिन्दी में लिखे नामपट्ट का चित्र अगले दिन अखबारों में भी शान से छपा मगर सरकार कहां परवाह करती है। हां, ज़िला भाषा अधिकारी महाराज को जब यह पता लगा कि उनके नाम के साथ चिपका आज़ाद शब्द उर्दू भाषा का है तो उन्होंने इसे भी अपने से अलग किया क्यूंकि उन्होंने पूरी ईमानदारी से हिन्दी की सेवा करनी थी। भाषा के ऐसे असली सेवक, काश सैंकड़ों वर्ष पहले पैदा हुए होते और भाषा के ठेकेदार भी होते तो मज़ाल इस भाषा का कोई शब्द उस भाषा के शब्द को छूने की भी हिम्मत करता।
 
-संतोष उत्सुक


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