कुदरत की मेहरबानी है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Oct 1 2018 11:34AM
कुदरत की मेहरबानी है (व्यंग्य)
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सुबह उठकर जब लोग काम पर जाने लगे तो यह दृश्य देख कर उनकी आँखें खुली रह गई उनका दिल बहुत प्रसन्न और मोबाइल एक्शन में दिखे। फटाक से कितने ही खूबसूरत चित्र फेस बुक, व्हत्सएप पर चिपका दिए गए।

बरसात ने नाले को फिर से नदी बना दिया और उसे धुले हुए, स्वच्छ, उम्दा व सफ़ेद बादलों से भर दिया। नदी को अपने पुराने मौसम याद आ गए। सुबह उठकर जब लोग काम पर जाने लगे तो यह दृश्य देख कर उनकी आँखें खुली रह गई उनका दिल बहुत प्रसन्न और मोबाइल एक्शन में दिखे। फटाक से कितने ही खूबसूरत चित्र फेस बुक, व्हत्सएप पर चिपका दिए गए। लाइक और लाइक आने शुरू हो गए। कुछ लोगों ने सोचा बरसात के मौसम में मां प्रकृति ने नदी का दामन बर्फ से भर दिया। वाह क्या उजला नज़ारा रहा। कुछ ज़्यादा समझदार लोगों को समझ आया कि अब चूंके कुदरत ने मौसम का पैटर्न बदल दिया है शायद इसलिए हमारे यहां ऐसा हुआ। यहां तक कि पड़ोसी प्रदेशों में रहने वाले पर्यटन प्रेमी फेसबुक पर बर्फ के फोटो देख कर घूमने का कार्यक्रम बनाने लगे।
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मगर यह क्या अखबार ने तो कुछ और ही छाप दिया। जिसे देखकर दो तीन बार लगा कहीं यह फेक या फेंक न्यूज़ तो नहीं। हे अभगवान ! यह तो बेलगाम उद्योगों द्वारा, कर्मठ प्रदूषण विभाग की लंबी नाक तले कैमिकल युक्त पानी की झाग के बादल निकले। हमें कहां याद कि यह सिलसिला कब से चल रहा है, पहली बार ऐसा नहीं हुआ है कि इतनी सुंदर लुभावनी झाग बनी है। यहां प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की हमेशा से खुली हुई पोल का ढोल बजता दिखा। जहां पानी ऊंचाई से गिर रहा था वहां सुंदर झाग के विशाल आश्चर्य में डालने वाले विशाल गुबार बन रहे थे। यह बच्चों को इतने लुभावने व बहुत अच्छे लगे कि स्कूल जाते समय अपने अभिभावकों से आलू भी नहीं मांगे। युवक युवतियों ने बाल ठीक करते हुए यादगार सेलफ़ी ली। ऐसा दृश्य आंखें रोज़ रोज़ कहाँ देख पाती हैं भला। कुछ गलत लोगों ने प्रदूषण विभाग व विकास के प्रणेता बेलगाम उद्योगों को भला बुरा कहा जिनकी तरफ ज़्यादा लोगों ने बिलकुल ध्यान नहीं दिया। वे घिसी पिटी बातें करने लगे कि किसानों के लिए वरदान, जीवन दायिनी माँ समान नदी में कैमिकल युक्त वेस्ट डालने से इनका अस्तित्व खत्म हो चुका है। किसी युग में इसका पानी कपड़े धोने के काम आता था अब डराने के काम आता है।
 


बताते हैं ज़्यादा पानी आ जाने के कारण दो तीन महान उद्योग (जिसका नाम लिखने से पंगा हो सकता है) का चैंबर लीक हो रहा है। वैसे पहले ज़्यादा ज़ोर से हवा चलने, तेज़ धूप होने या शाम को अंधेरा जल्दी होने के कारण भी चैंबर लीक होता रहा है। चाहे कुछ भी हो जी इसी बहाने इतना सुंदर दृश्य तो देख पाए नहीं तो यहां आस पास ही नहीं, राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के विज्ञापन बोर्ड के पड़ोस में भी कूड़ा कचरा ही बिखरा रहता है। प्रदूषण विभाग के जिम्मेदार अफसर का जिम्मेदाराना अखबारी बयान कहता है कि संबन्धित उद्योगों को कारण बताओ नोटिस, चेतावनी नोटिस देकर नकेल भी कसनी शुरू कर दी है। पानी का नमूना सही जगह से लेकर प्रयोगशाला में भेजा जाएगा। उद्योग को कसकर पकड़ लिया जाएगा और हमेशा की तरह नियमानुसार सख्त व वांछित कारवाई की जाएगी। जो उद्योगपति मानते नहीं हैं उनकी बिजली काटने का भी प्रस्ताव है। दिलचस्प है कि जिस उद्योग को इस खूबसूरत झाग, सफ़ेद बादल या सौम्य बर्फ के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है उसका बयान कितना संतुलित व पारदर्शी रहा। बड़े अदब से उन्होंने बताया कि हमारा कोई चैंबर नहीं टूटा, यह झाग कहाँ से, कब और कैसे आई हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है। कंपनी की मेहनती तकनीकी टीम ने समझदारी से सभी चैंबर चैक कर बताया है कि पानी लेने के हमारे समय से, झाग उठने का समय बिलकुल मेल नहीं खाता। सरकार जब चाहे इस का संज्ञान ले सकती है और ठोस कारवाई करने के निर्देश दे सकती है।
 
पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से संबन्धित लगभग दो सौ क़ानूनों में सख्त सज़ा का प्रावधान है फिर भी ज़रूरत पड़े तो अविलंब नया कानून भी बना सकती है। लेकिन इस मामले में कुल मिला कर यही साबित किया गया कि इतना सुंदर दृश्य रचने में आदमी का हाथ नहीं हो सकता यह केवल कुदरत ही कर सकती है। कुदरत ने कब क्या करना है यह कोई नहीं जानता। हम इतना सब अच्छा देने के लिए कुदरत का शुक्रिया अदा कर सकते हैं जो हमें करना भी चाहिए।
 
-संतोष उत्सुक


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