अमेरिका में SC के जज की नियुक्ति, क्या ट्रंप पद से हटने से कर सकते हैं इनकार?

SC judge in America
अभिनय आकाश । Oct 29, 2020 5:12PM
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से पहले एक अहम नियुक्ति में जज एमी कॉनी बैरट ने सुप्रीम कोर्ट के 115वें न्यायमूर्ति के तौर पर शपथ ली। ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि राष्ट्रपति चुनाव होने में केवल कुछ ही दिनका समय है।

वो 28 अगस्त 1963 की गर्म दोपहरी थी। जगह थी अमेरिका की राजधानी वाशिंटन डीसी। जहां लाखों लोग अश्वेत अमेरिकी नागरिकों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जुटे थे। इन लोगों की अगुवाई कर रहे थे- मार्टिन लूथर किंग। उसी दिन लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों से मार्टिन ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया था। जिसमें उन्होंने अपने सपनों के अमेरिका की कल्पना सभी के सामने रखी थी। I Have a Dream टाइटल से ये स्पीच बहुत ही मशहूर हुई थी। ऐसे न जाने कितने छोटे-बड़े संघर्षों, आंदोलनों और उनके असर से हुए बदलावों की बदौलत अमेरिका अपने मौजूदा स्वरूप तक पहुंचा है। उस स्वरूप तक जहां कहा जाता है कि "when America Sneezes world Catches A cold". 

जब भी अमेरिका में चुनाव होते हैं तो पूरी दुनिया से लेकर इंडिया तक में हर समाचार, अखबार और टेलीविजन, डिजिटल मीडिया का बाजार इन चुनावी खबरों की कवरेज से गुलजार रहता है। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस रूथ बेडर गिंसबर्ग के निधन के बाद से जारी सियासी विवाद नए जज की नियुक्ति से और तेज हो गया। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से पहले एक अहम नियुक्ति में जज एमी कॉनी बैरट ने सुप्रीम कोर्ट के 115वें न्यायमूर्ति के तौर पर शपथ ली। इससे पहले सीनेट ने उनकी सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति पद पर नियुक्ति की पुष्टि की थी। राष्ट्रपति चुनाव से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए इसे एक बड़ी जीत माना जा रहा है। रिपब्लिकन बहुमत वाले सीनेट ने 48 के मुकाबले 52 वोट देकर बैरट के नाम की पुष्टि की।

कौन है एमी

एमी को लेखक भी माना जाता है। मानवाधिकारों पर भी उन्होंने अपने विचार रखे हैं। बैरेट को रूढ़िवादी विचारों के जाना जाता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, लोगों का मानना है कि  एमी के सुप्रीम कोर्ट जज के तौर पर नियुक्त होने से अमेरिका में गर्भपात कानून में बदलाव की मांग वाले आंदोलन पर बदलाव आ सकता है। वहीं बैरेट की आजीवन नियुक्ति से आने वाले दशकों के लिए नौ सदस्यीय अदालत में वैचारिक तौर पर रूढ़िवादी बहुमत को मजबूती मिलेगी। बता दें कि अमेरिका में जजों की नियुक्ति लाइफटाइम के लिए होती है और अन्य कोर्ट से अलग यहां के जजों का कोई रिटायरमेंट उम्र भी नहीं होता। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में नौ जज होते हैं। किसी अहम फैसले के वक्त यदि इनकी राय 4-4 में विभाजित हो जाती है, तो सरकार द्वारा नियुक्त जज का वोट निर्णायक साबित होता है। 

अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय

भारत में जहां न्यायपालिका एकीकृत है, वहीं अमेरिका में संघीय और राज्य न्यायालय अलग-अलग हैं। 9 सदस्यीय अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट संघीय प्रणाली का शीर्ष मंच है। राज्य प्रणालियों के अपने शीर्ष न्यायालय हैं, और आमतौर पर राज्य सुप्रीम कोर्ट कहलाते हैं। पदानुक्रम के संदर्भ में देखें तो यूएस में सुप्रीम कोर्ट 13 सर्किट कोर्टों  (जो अपील की अदालत हैं) से ऊपर आता है। ये सर्किट कोर्ट 94 जिला स्तरीय ट्रायल कोर्ट से ऊपर स्तर के होते हैं। ये सर्किट और जिला संघीय अदालत पूरे देश भर में फैले हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय राजधानी वाशिंगटन, डीसी में स्थित है। जिला अदालतों द्वारा दिए निर्णय का सर्किट अदालतों में अपील किया जा सकता है। लेकिन संघीय सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर सर्किट कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील सुनने के लिए बाध्य नहीं है और यहां की गई करीब 1 फीसदी अपील स्वीकार की जाती है।

 अमेरिका में कैसे नियुक्त होते हैं जज

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में नौ सदस्यीय जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति और अमेरिकी सीनेट द्वारा की जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति किसी भी जज को सुप्रीम कोर्ट के लिए नामिनेट करते हैं। जिसके बाद से सीनेट में उसके नाम पर वोटिंग की जाती है। इसमें मिले वोटों से ही तय होता है कि नामांकित व्यक्ति अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का जज बनेगा कि नहीं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी रिपब्लिकन हैं और उनकी पार्टी की इस समय सीनेट में बहुमत है। ऐसी स्थिति में वे जिसे चाहें उसे सुप्रीम कोर्ट में जज बना सकते हैं।

इसे भी पढ़ें: भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक समझौता, राजनाथ सिंह ने BECA को बताया अहम उपलब्धि

एक नजर जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर...

  • सबसे पहले राष्ट्रपति किसी जज को नामित करते हैं।
  • उसके बाद जहां एक ओर सीनेट द्वारा जांच की जाएगी, वहीं दूसरी ओर FBI उम्मीदवार के बैकग्राउंड की जांच शुरू करती है।
  • इसके बाद कई सीनेटर द्वारा प्राइवेट क्लोज डोर मीटिंग होंगी जो 15 मिनट से घंटे भर तक की भी हो सकती हैं।
  • उसके बाद पब्लिक हियरिंग होगी, जो 22 सदस्यों वाली न्याययिक कमेटी करती है।
  • हियरिंग के बाद ज्यूडिशियरी कमेटी अपना मत देती है, उसके बाद सीनेट में मतदान होता है।
  • अंत में सीनेट उम्मीदवार पर मुहर लगाती है। चूंकि वर्तमान में सीनेट की स्थिति 53-47 के अनुसार रिपब्लिकन का पलड़ा भारी है, ऐसे में डेमोक्रेट्स चाहकर भी कुछ खास नहीं कर सकते हैं।
  • अगर किसी कारणवश उम्मीदवार को 50-50 फीसदी वोट मिलते हैं और मतदान बराबरी पर छूटता है तो ऐसे में उपराष्ट्रपति निर्णायक मतदान कर सकते हैं।
  • भारत में, न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारित है - सुप्रीम कोर्ट के लिए 65 और उच्च न्यायालयों के लिए 62। अमेरिका में, संघीय न्यायाधीश जीवन के लिए सेवा कर सकते हैं।
  • यदि वे इस्तीफा दे देते हैं, या फिर उनका निधन हो जाता है या यदि वे कांग्रेस द्वारा महाभियोग चलाए जाते हैं तो ही जजों का कार्यकाल समाप्त होता है। 
  • अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे पुराने सदस्य, जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स, जूनियर, 30 साल की सेवा के बाद 1932 में 90 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुए। जस्टिस गिन्सबर्ग 87 साल के थे और 27 साल से बेंच में थे।

जज की नियुक्ति का डेमोक्रेट क्यों कर रहे हैं विरोध

ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि राष्ट्रपति चुनाव होने में केवल कुछ ही दिनका समय है। इसलिए, नए जज की नियुक्ति का काम चुनाव के बाद नए राष्ट्रपति को करना चाहिए। डेमोक्रेट का विरोध इसलिए भी है क्योंकि 2016 में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे तब रिपब्लिकन ने लगभग एक साल तक सुप्रीम कोर्ट में नए जज की नियुक्ति नहीं होने दी। चुनाव बाद जब ट्रंप राष्ट्रपति बने तब उन्होंने नील गोरसच को जज नियुक्त किया था। ट्रंप अपने एक कार्यकाल के दौरान अब तक सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की नियुक्ति कर चुके थे और एमी के रूप में तीसरे जस्टिस की नियुक्ति की। जिसका आने वाले दिनों में बड़ा असर देखने को मिल सकता है। कोर्ट में ट्रंप के पक्ष में न्यायधीशों का झुकाव बढ़ सकता है और ट्रंप अपने एजेंडों को तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं। गर्भपात का अधिकार, आव्रजन, टैक्सेशन और क्रिमिनल जस्टिस के मुद्दे पर उनकी पार्टी को आगामी 30 साल के लिए बढ़त मिल जाएगी।

बिल क्लिंटन ने गिन्सबर्ग को बनाया था सुप्रीम कोर्ट का जज

गौरतलब है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने गिंसबर्ग को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश पद पर नामित किया था। वह करीब 27 साल से इस पद पर थीं और कुछ साल से कैंसर से पीड़ित थीं। गिंसबर्ग की मौत तीन नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव से 50 दिन से भी कम समय पहले हुई है।

इसे भी पढ़ें: जो बाइडेन ने बताया अमेरिका को कैसे राष्ट्रपति की है जरूरत? ट्रंप पर साधा निशाना

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट और न्यायधीशों का इतिहास 

अमेरिकी संविधान के अर्टिकल तीन के मुताबिक अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना 1789 में हुई है।

उस समय तात्कालिक राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने छह न्यायधीशों की नियुक्ति की थी, इन जजों को तब तक सेवा के लिए नियुक्त किय गया था जब तक इनकी मृत्यु नहीं हो जाती या जब तक ये रिटायर नहीं होते।

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना से लेकर अब तक 114 जज अमेरिका के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बन चुके हैं।

अब तक के 114 न्यायधीशों में 108 श्वेत रहे हैं।

231 वर्षों के सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में महज 5.3% जस्टिस ही महिला या अल्पसंख्य वर्ग के रहे हैं।

5.3% में चार महिला जस्टिस थीं और दो अल्पसंख्य थे।

वर्तमान में US सुप्रीम कोर्ट में न्यायधीशों की संख्या नौ होती है।

रूथ गिन्सबर्ग के निधन के बाद अभी जो आठ जस्टिस हैं उनमें से 3 को जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने, 2 को ट्रंप ने, 2 को ओबामा ने और एक को बिल क्लिंटन ने नॉमिनेट किया था।

इसे भी पढ़ें: पाक विदेश मंत्रालय का बयान, कहा- भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में पाकिस्तान का जिक्र अवांछित

क्या कोर्ट की मदद से ट्रंप पद से हटने से कर सकते हैं इनकार?

हाल ही में अमेरिकी सीनेट में सुप्रीम कोर्ट के नए जज के लिए वोट हुआ, जिसमें ट्रंप की नामित एमी कोनी बैरेट जीतीं। इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट वाले ट्रंप के बयान को नए सिरे से तौला जा रहा है। ऐसी अटकलों का भी दौर शुरू हो गया कि क्या चुनाव के नतीजे उनके मुताबिक न होने पर सुप्रीम कोर्ट उनकी मदद करेगा? 

ट्रंप और कोर्ट पर बयान 

सितंबर के आखिर में ट्रंप ने कहा था कि शायद ये चुनाव सुप्रीम कोर्ट में जाकर रुकेगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि हमें इसके लिए कोर्ट में पूरे 9 जजों की जरूरत होगी। नई जज एमी कोनी बैरेट को ट्रंप ने ही वोट किया था। इससे पहले भी एमी और ट्रंप के घनिष्ठ संबंधों की बात होती रही है।

जज की ये नियुक्ति ट्रंप को कैसे देंगी फायदा ?

इस बारे में समझने के लिए साल 2000 का मामला देख सकते हैं। तब “बुश बनाम गोर (Bush v Gore)” मामले में सुप्रीम कोर्ट का विवादित फैसला अभी भी डेमोक्रेटिक पार्टी को परेशान करता है। उस दौरान जॉर्ज डब्ल्यू बुश रिपब्लिकन्स, जबकि अर्नाल्ड गोर डेमोक्रेट्स की ओर से उम्मीदवार थे। तब बराबर वोटों को लेकर दोनों पार्टियों के बीच तनातनी चलती रही। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोरिडा में वोटों की दोबारा गिनती पर रोक लगाते हुए जॉर्ज डब्ल्यू. बुश को राष्ट्रपति बना दिया। अब भी ये फैसला मीडिया और संविधान के जानकारों के बीच बहस का विषय है।

क्या हालात हो सकते हैं

अगस्त में एक प्रेस वार्ता में ट्रंप ने अजीबोगरीब बयान दिया,जिसके मुताबिक जरूरी नहीं कि हारने पर भी वे सत्ता को शांति से छोड़ देंगे। द अटलांटिक में छपी एक रिपोर्ट में कानूनविद लॉरेंस डगलस की राय इसी ओर इशारा करती है। अमेरिकी संविधान में सत्ता के शांतिपूर्वक हस्तांतरण की बात नहीं करता है, बल्कि वो इसका अनुमान लगा लेता है कि ऐसा ही होगा. ऐसे में अगर कोई प्रेसिडेंट हार के बाद भी सत्ता जीती पार्टी को देने से इनकार कर दे तो इसके लिए अमेरिकी संविधान में कोई अलग बात नहीं कही गई है। संविधान की इसी कमी पर किताब भी लिखी जा चुकी है। विल ही गो (Will He Go?) नाम से इस किताब में अनुमान लगाया गया है कि अगर कोई अमेरिकी प्रेसिडेंट हार के बाद पद छोड़ने से इनकार कर दे तो क्या हालात बन सकते हैं। इस पर एक्सपर्ट बहस कर रहे हैं लेकिन चूंकि संविधान में इसके लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं, इसलिए फिलहाल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं कि ऐसा होने पर क्या हो सकता है। - अभिनय आकाश

अन्य न्यूज़