एमएस गोलवलकर से मोहन भागवत तक, आरएसएस की 'चीन नीति'

 MS Golwalkar Bhagwat
अभिनय आकाश । Oct 27, 2020 6:00PM
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सीमाओं पर चीन ने जिस प्रकार से अपने आर्थिक व सामरिक बल में मदांध होकर अतिक्रमण का प्रयास किया और भारत की सरकार, सेना, प्रशासन व जनता ने करारा जवाब दिया, इससे उसे पूरी तरह धक्का लगा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) 2025 में जिसकी उम्र 100 बरस हो जाएगी। किसी भी संगठन के लिए करीब सौ साल का सफर अहम होता । लेकिन आरएसएस एक ऐसा नाम है जिसका जिक्र होते ही राजनीति के गलियारों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। समाज के भीतर देश के सबसे बड़े परिवार के तौर पर आरएसएस अपनी पहचान कराता है। इतिहास के पन्नों से गुलाम हिन्दुस्तान की यादों में हिंदुत्व की आस्था से भारतीयता की भावना में रचे-बसे इस संगठन का जन्म तो 95 साल पहले हुआ था। उस वक्त सिर्फ 12 लोग थे लेकिन आज करोड़ों-करोड़ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद संगठन की हामी हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ने वाले इस संगठन ने राजनीति से तो अपनी दूरी परस्पर बनाई रखी, लेकिन सत्ता की राजनीति में अपनी मौजूदगी की धमक को कुछ इस प्रकार बरकरार रखा कि जिसके इशारों को नजरअंदाज करना तख्त पर बैठे हुक्मरानों के लिए कभी आसान नहीं रहा। आरएसएस का इरादा अखंड भारत का है और संघ का वादा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पन्नों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहता है। 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। सांप्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं। वो कहते हैं न नजरे जितनी नजदीक जाती हैं उतनी ही तरेरती हैं और इसलिए शायद आरएसएस के गठन के बाद से ही यह संगठन सवालों के घेरे में फंसा रहा। लेकिन कई मौके ऐसे भी आए जब देश के प्रधानमंत्री ने इसी संघ का साथ लिया। चाहे वो पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू हों या फिर इंदिरा गांधी। अवसर था दशहरे का और साथ ही संघ के स्थापना दिवस का भी। विजयादशमी के अवसर पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने चीन की सैन्य आक्रामकता के अहम मुद्दे पर कहा कि सरकार, प्रशासन, रक्षा बल और भारत के लोगों ने जिस दृढ़ता और साहस के साथ जवाब दिया उससे चीन ‘स्तब्ध’ रह गया। सरसंघचालक ने पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार (ब्रह्मदेश) और नेपाल के साथ करीबी रिश्ते विकसित करने पर भी जोर दिया, जिनके साथ हमारे ‘साझा मूल्य और नैतिक संबंध’ हैं। संघ प्रमुख ने न केवल विदेश नीति से जुड़े विषयों पर टिप्पणी की है जो असंदिग्ध रूप से राजनीतिक हैं बल्कि उन्होंने अपने शब्दों में भी पूरी स्पष्टता रखी है। 

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आरएसएस हमेशा से चीन को लेकर सतर्कता बरते जाने की बात करता रहा है और उसने निरंतर सरकारों से चीन के मामले में लापरवाही नहीं बरतने का आग्रह किया है। आरएसएस 1950 के दशक से ही चीन के खिलाफ़ मुखर रहा है और उसने चीन के विस्तारवादी रवैये के विरुद्ध हमेशा एक मज़बूत ‘चीन नीति’ पर ज़ोर दिया। 23 दिसंबर 1962 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने कहा था कि चीन की विस्तारवादी प्रवृति का एक प्रमुख कारण है उसका कम्युनिस्ट शासन के अधीन होना और ‘विस्तारवाद साम्यवाद की एक प्रमुख विशेषता है। हमें इस वक्त सारे राजनीतिक मतभेदों को भुलाते हुए सिर्फ एक बात याद रखनी चाहिए कि हम शत्रु से युद्ध कर रहे हैं और हमें एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहना चहिए। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चीन नीति का विरोधी होने के बावजूद उन्होंने सभी पक्षों से अपने मतभेदों को भुलाते हुए चीन के खिलाफ़ नेहरू सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों के समर्थन का आह्वान किया था। चीन से युद्ध के दौरान ही गोलवलकर ने 5 नवंबर 1962 को नागपुर से एक पत्र जारी किया था जो वर्तमान परिस्थितियों में और भी अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने नेहरू सरकार को आगाह किया था कि चीन भारत के खिलाफ़ नेपाल का इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता है, इसलिए ‘हमें नेपाल के साथ करीबी और सौहार्दपूर्ण संबंधन बनाना चाहिए… यदि हम ऐसा नहीं कर पाए, तो हमारी मुश्किलें बढ़ जाएंगी। 

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सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी – सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता. जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया। 

चीन पर आरएसएस का 2012 का प्रस्ताव

भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के 50 साल पूरे होने के अवसर पर आरएसएस ने 2012 में चेन्नई में एक प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल (एकेबीएम) की एक बैठक में पारित किया गया, जोकि नीति निर्माण और निर्णय से जुड़े आरएसएस के सर्वोच्च निकायों में एक है। प्रस्ताव में चीन नीति पर आरएसएस के दृष्टिकोण का खुलासा किया गया था. चीन को लेकर गहरी चिंता के इजहार के साथ ही प्रस्ताव में चीन के विरुद्ध तत्काल ‘एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की आवश्यकता’ पर ज़ोर दिया गया था। प्रस्ताव में कहा गया, ‘चीन ने अपने सामरिक उद्देश्यों के अनुरूप भारत-तिब्बत सीमा पर आधारभूत ढांचों के निर्माण और उन्हें समुन्नत बनाने का काम किया है, जिनमें एयरबेसों का नेटवर्क, मिसाइल लॉन्चिंग पैड, कैटोनमेंट और अन्य भौतिक निर्माण शामिल हैं। एबीकेएम सरकार से मांग करता है कि सीमा पर चीन के आक्रामक क्रियाकलापों से कारण बढ़े ख़तरों के मद्देनज़र, भारत को भी सीमा प्रबंधन और सुरक्षा तैयारियों पर पर्याप्त निवेश करना चाहिए।’

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आरएसएस ने की चीन से संबंध तोड़ लेने की वकालत

अक्तूबर, 1962 में चीन के आक्रमण के बाद आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि 'जब तक हम अपनी ज़मीन चीन से छुड़ा नहीं लेते, उसके साथ बातचीत करने का कोई तुक नहीं है। इस वक्तव्य में ये भी कहा गया कि 'भारतीय ज़मीन को दोबारा पाने के अलावा चीन के विस्तारवाद को रोकने के और भारत की सीमाओं की सुरक्षा के लिए तिब्बत की आज़ादी भी ज़रूरी है। 

अगले साल आरएसएस की एक और इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने कोलंबो सम्मेलन के भारत और चीन के बीच मध्यस्तता के प्रस्ताव को ये कह कर ख़ारिज कर दिया कि हमें कम्युनिस्ट चीन के साथ अपने कूटनीतिक संबंध तोड़ लेने चाहिए और दलाई लामा का समर्थन कर तिब्बत के स्वतंत्रता आँदोलन की मदद करनी चाहिए।

आरएसएस के इन कट्टर प्रस्तावों को नेहरू ने तो नहीं माना लेकिन युद्ध के बाद पैदा हुए देशभक्ति के माहौल से आरएसएस को बहुत राजनीतिक फ़ायदा हुआ. इसका असर इस हद तक हुआ कि नेहरू ने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में उस आरएसएस के दल को भाग लेने की अनुमति दे दी, जिसका वो तब तक हर अवसर पर विरोध करते आए थे।

1962 में चीन के धोखे से किए गए हमले से देश सन्न रह गया था। उस वक्त आरएसएस ने सरहदी इलाकों में रसद पहुंचाने में मदद की थी। इससे प्रभावित होकर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में संघ को बुलाया था।

मोहन भागवत के संबोधन के मायने

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सीमाओं पर चीन ने जिस प्रकार से अपने आर्थिक व सामरिक बल में मदांध होकर अतिक्रमण का प्रयास किया और भारत की सरकार, सेना, प्रशासन व जनता ने करारा जवाब दिया, इससे उसे पूरी तरह धक्का लगा है। अब आगे हमें सजग रहना होगा। आंतरिक व वाह्य स्थिति को और मजबूत करनी होगी। संघ प्रमुख का प्रारूप अच्छी नीयत से है । आर्थिक रूप से, रणनीतिक तौर पर, अपने पड़ोसियों के साथ सहयोग सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में चीन से ऊपर उठना ही एक मात्र रास्ता है जिससे राक्षसी आकाक्षाओं का मुकाबला किया जा सकता है। 

एक जमाने तक आरएसएस पर रायसीना हिल से एक बार नहीं तीन-तीन बार पाबंदी लगी। वक्त का पहिया घूमा, समय चक्र तेजी से चल रहा था। आज संघ के लोग रायसीना हिल पर काबिज़ हैं। जो लोग समय को नहीं समझ पाते, समय उन्हें पीछे छोड़ देता है और जो वक्त से लड़ाई में नहीं हारते, वक्त उन्हें अपने सिर पर बिठा लेता है। - अभिनय आकाश

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