बड़ी टेक कंपनियों पर चीनी सरकार का कसता शिकंजा, ड्रैगन को पछाड़ निवेशकों के लिए पसंदीदा डेस्टिनेशन बना भारत

बड़ी टेक कंपनियों पर चीनी सरकार का कसता शिकंजा, ड्रैगन को पछाड़ निवेशकों के लिए पसंदीदा डेस्टिनेशन बना भारत

भारत के फंडिंग में वृद्धि हुई है, वहीं चीन के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। चीनी रेगुलेटर्स ने एंट ग्रुप के 37 बिलियन डॉलर के आईपीओ पर रोक लगा दी।

साल 2021 में भारतीय टेक स्टार्टअप कंपनियों में वेंचर कैपिटल फंडिंग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिससे देश के डिजिटल इकोनॉमी में तेजी आई है। इस साल जनवरी तक चीन के 19 यूनिकॉर्न को पीछे छोड़ भारत में 30 से ज्यादा कंपनियां यूनिकॉर्न बनी और जोमैटो (Zomato) और नायका (Nykaa) जैसे आईपीओ का शानदार प्रदर्शन भारतीय स्टार्टअप के वैश्विक आकर्षण का एक स्पष्ट संकेत है। भारत के फंडिंग में वृद्धि हुई है, वहीं चीन के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। चीनी रेगुलेटर्स ने एंट ग्रुप के 37 बिलियन डॉलर के आईपीओ पर रोक लगा दी। अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत कंपनियों पर रेगुलेटरी कार्रवाई ने निवेशकों को डराने का संकेत दिया। अलीबाबा और टेनसेंट जैसे टेक दिग्गज तेजी से अधिकारियों के रडार पर आ गए हैं और कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में चीनी फर्मों के वैल्यूएशन में 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की कमी आई है।  टेनसेंट को मार्केट वैल्यू में 388 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, जबकि जून में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में एक ब्लॉकबस्टर आईपीओ के बावजूद चीन की राइड हेलिंग कंपनी दीदी ग्लोबल की किस्मत भी स्पष्ट नहीं है।

यूनिकॉर्न क्या होता है? 

यूनिकॉर्न का मतलब ऐसा स्टार्टअप है जिसका वैल्यूएशन एक अरब डॉलर तक पहुंच गया हो। वेंचर कैपिटल इंडस्ट्री में इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार काउबॉय वेंचर्स की फाउंडर ऐलीन ली ने किया था। 10 अरब डॉलर के वैल्यूएशन से अधिक के स्टार्टअप को डेकाकॉर्न कहा जाता है और 100 अरब डॉलर के वैल्यूएशन तक पहुंचने वाले स्टार्टअप को हेक्टोकॉर्न। 

भारत की सिलिकॉन वैली 

बंगलौर को भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है क्यूंकि यहाँ भारत की लगभग सभी सॉफ्टवेयर कंपनियां के अपने मुख्य कार्यालय हैं। जिस प्रकार अमेरिका का टेक्नोलॉजी हब माउंटेन व्यू में है जहां पर गूगल , एप्पल , फेसबुक समेत अन्य कई कंपनियों के मुख्य कार्यालय है। उसी प्रकार भारत की मुख्य सॉफ्टवेयर कंपनियां जैसे विप्रो, इनफ़ोसिस जैसी बड़ी - बड़ी कंपनियों के कार्यालय वहां है। लगभग 42 प्रतिशत भारतीय स्टार्टअप हर साल यहीं पैदा होते हैं। प्रतिभा के लिए ये एक प्रेरक माध्यम बन गया है। भारत का स्टार्टअप अब फल-फूल रहा है। इस साल अकेले देश में एक दर्जन से अधिक स्टार्टअप्स यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो गए हैं। इसमें रेजरपे, फार्मईजी, जिरोधा, नाइका डॉट कॉम, अनएकेडमी, पाइन लैब्स, पोस्टमैन, जेनोटी, ग्लांस, डेलीहंट, फर्स्टक्राई और कार्स-24 शामिल हैं। यह किसी एक साल में सबसे ज्यादा यूनिकॉर्न बनने का रिकॉर्ड है।  

भारत ने 2021 में प्रति माह तीन 'यूनिकॉर्न' जोड़े

 पिछले डेढ़ दशक के दौरान बहुत बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिला। हम आज इतनी अलग दुनिया में रहते हैं।  देश के कुल सात स्टार्टअप्स को यूनिकॉर्न बनने में सबसे ज्यादा 14.6 साल का समय लगा। 9 स्टार्टअप्स को यूनिकॉर्न बनने में 8.7 साल का समय लगा। 13 को यूनिकॉर्न बनने में 7.4 साल का समय लगा। 4 स्टार्टअप को यूनिकॉर्न बनने में 5.8 साल का समय लगा। 8 को यूनिकॉर्न बनने में 5 साल का समय लगा। 3 स्टार्टअप को यूनिकॉर्न बनने में 2.4 साल का समय लगा। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने 2021 में प्रति माह तीन 'यूनिकॉर्न' जोड़े, जो अगस्त के अंत तक 1 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक मूल्य के स्टार्टअप की कुल संख्या को लगभग दोगुना कर देता है। सितंबर 2020 से सितंबर 2021 के बीच में प्रति तीन माह में एक यूनिकॉर्न बनने से  इको सिस्टम की परिपक्वता के संकेत साफ मिलते हैं। 

पेटीएम आईपी का हश्र

देश की दिग्गज डिजिटल भुगतान सेवा प्रदान करने वाली कंपनी पेटीएम के आईपीओ का हश्र देखने के बाद दूसरी कंपनियों की चिंता बढ़ गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बाजार में पेटीएम की निराशाजनक शुरुआत के बाद  मोबिक्विक और ओयो द्वारा नियोजित आईपीओ की योजनाओं पर काले बादल मंडरा रहे हैं। एक रिपोर्ट में कहा गया कि निवेशकों को पेटीएम आईपीओ के मार्केट डेब्यू से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन उनकी उम्मीदें लिस्टिंग होने के साथ ही खत्म हो गईं। 

 डिफेंस इंडस्ट्री से हुई शुरुआत

आज कंपनी बनाने के लिए बहुत सारे बुनियादी ढांचे मौजूद हैं। चुनौतियां यह होंगी कि व्यवसाय में कैसे सफल हों। स्पीड और एक्सीक्यूशन सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। भारत की तकनीक की कहानी के लिए हम थोड़ा पीछे चलते हैं, यही कोई पांच से छह दशक पीछे।  जब सरकारी सशस्त्र बलों की जरूरतों को पूरी करने के लिए सरकार ने फैसला किया कि उसे रक्षा से संबंधित प्रौद्योगिकी कंपनियां शुरू करने के लिए एक रणनीतिक स्थान की आवश्यकता है। तब से ही बैंगलौर उन कंपनियों में से बहुतों का पसंदीदा स्थान बन गया। इसके साथ ही उन्हें सपोर्ट करने के लिए बंगलौर और उसके आसपास के क्षेत्र में शिक्षण संस्थान वक्त के साथ सामने आते गए। सरकार अपने रक्षा उद्योग के निर्माण के लिए बंगलौर को चुना क्योंकि दक्षिणी भारत के इस शहर को अपने प्रतिद्वंद्वी देशों पाकिस्तान और चीन से सुरक्षित दूरी माना जाता था। 

इंफोसिस की बेंगलुरु दस्तक के बाद खुले दरवाजें

1980 के दशक में कई छोटी निजी कंपनियों ने भी अपने ऑपरेशन को शहर में स्थानांतरित किया। इनमें इंफोसिस का नाम भी शामिल है। 1981 में 250 डॉलर की शुरुआती पूंजी के साथ सात इंजीनियरों ने भारत में निजी तकनीक उद्योग की शुरुआत करते हुए व्यवसाय स्थापित किया। आज ये 95 बिलियन के बाजार पूंजीकरण के साथदुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। इंफोसिस की जब शुरुआत हुई तो वो समाजवादी युग था और तब भारत व्यापार के प्रति मित्रवत नहीं था। उस वक्त कंपनी के सामने कई सारी चुनौतियां थी। मसलन, एक टेलीफोन का कनेक्शन लेने के लिए दो साल का वक्त लग गया। एक कंप्यूटर आयात करने के लिए आपको लाइसेंस लेने के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। फिर 1990 के दशक में आया आर्थिक उदारीकरण का दौर। सरकार ने बाजार को नियंत्रण मुक्त किया। आयात शुल्क में कटौती की गई। इंफोसिस और अन्य आईटी कंपनियां फलने-फूलने लगी।  1996 में, इन्फोसिस ने कर्नाटक राज्य में इन्फोसिस संस्थान बनाया। जो स्वास्थ्य रक्षा (health care), सामाजिक पुनर्वास और ग्रामीण उत्थान, शिक्षा, कला और संस्कृति के क्षेत्रों में कार्य कर रहा है। जिसके बाद से ही भारत के विभिन्न हिस्सों से बेंगलुरु में लोगों का जुटान होने लगा। एक समय था जब बेंगलुरु वर्ब बन गया था। अमेरिका में पूछा जाता था - हैव यू बीन बैंग्लोर्ड? मतलब अमेरिका में उसकी नौकरी छूट गई और उसका काम आउटसोर्स होकर बेंगलुरु चला गया। यही कारण है कि बेंगलुरु दुनियाभर से जॉब्स खींचने वाला शहर माना जाता रहा है। अब यह शहर स्टार्टअप कैपिटल है। हर दिन एक स्टार्टअप शुरू हो रही है। 

निवेशकों की उम्मीदों पर खरा उतरना चुनौती 

 जब आप भारत में पहली पीढ़ी की कंपनियों जैसे इंफोसिस और विप्रो आदि के संस्थापकों को देखते हैं, वे आर्थिक रूप से बहुत समझदार थे। उन्हें अपने बिजनेस से प्रॉफिट जेनरेट करना था और उसे वापस बिजनेस में ही लगाना था। क्योंकि पूंजी का एकमात्र स्रोत है कि हम पुनर्निवेश कर सकते हैं। भारतीय स्टार्टअप जगत को यह दिखाना होगा कि वे न केवल विकास कर रहे हैं बल्कि लाभप्रदता भी बना रहे हैं।

-अभिनय आकाश 






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