• स्पेशल फ्रंटियर फोर्स: रहस्यमय कमांडो की खुफिया यूनिट और उसकी शौर्य गाथा

अभिनय आकाश Sep 09, 2020 19:45

प्रधानमंत्री नेहरू ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के फांउडर डायरेक्टर भोलानाथ मलिक और बीजू पटनायक की सलाह पर एक अलग फोर्स के गठन को मंजूरी दे दी। 14 नवंबर 1962 को ये फोर्स अस्तित्व में आई। जिसे इस्टैब्लिशमेंट 22 नाम दिया गया।

लद्दाख में पैंगोंग झील के पास शहीद हुए स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के तिब्बती जवान नीमा तेंजिन को लेह में अंतिम विदाई दी गई। वह पिछले सप्ताह चीन के खिलाफ ऐक्शन के दौरान एक पुराने लैंडमाइन पर पैर पड़ जाने की वजह से शहीद हो गए। बीजेपी सांसद राम माधव सहित बड़ी संख्या में लोगों ने तेंजिन को सैल्यूट करते हुए विदाई दी। तेंजिन को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। लोग हाथों में तिरंगा और तिब्बत का झंडा लिए हुए नजर आए। इस दौरान सभी भारत माता की जय के साथ तिब्बत देश की जय के नारे लगा रहे थे। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के जवान के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग उमड़े। कौन है ये एसएफएफ, जिसने चीन को बैकफुट पर ला दिया है? क्या ये भारतीय सेना का हिस्सा है? क्या है इसका इतिहास? आज के इस विश्लेषण में इन सभी चीजों को समझने की कोशिश करेंगे।

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चीन और तिब्बत का लंबा संघर्ष और लड़ाकों की फौज

तिब्बत का इतिहास बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। कभी वो एक खुदमुख़्तार इलाके के तौर पर रहा तो कभी मंगोलिया और ताक़तवर राजवंशों ने उस पर हुकूमत की। लेकिन साल 1950 में चीन ने इस इलाके पर अपना झंडा लहराने के लिए हज़ारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। तिब्बत के प्रतिनिधियों ने 1951 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।  इसके तहत तिब्बत को ‘पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का स्वायत्त क्षेत्र’ घोषित करने का वादा किया गया। 1957 की शुरुआत में, गोम्पो ताशी आंद्रुगत्संग की अगुआई में सेंट्रलाइज्ड आर्म्ड रेसिस्टेंस (प्रतिरोध) संगठित हुआ। इसका नाम 'चुशी गंगद्रुक' (चार नदियां, छह रेंज) रखा गया। 1958 के मध्य में, मुख्य तौर पर पूर्वी तिब्बत की सुरक्षा के लिए खड़ा किया गया यह रेसिस्टेंस फोर्स, ऑल-तिब्बत फोर्स में बदल गया और इसका नाम नेशनल वॉलन्टियर आर्मी (NVDA) रखा गया। लेकिन इसकी पहचान 'चुशी गंगद्रुक' के तौर पर ही अधिक बनी रही। चुशी गांगड्रुक, चीन के ख़िलाफ थी और इसी खिलाफत ने चीन के दुश्मन अमेरिका को उसके करीब लाया। ऐसा कहा जाता है कि चुशी गांगड्रुक के गुरिल्ला लड़ाकों से अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने संपर्क किया। जिसके बाद सीआईए ने चुशी के लड़ाकों को ट्रेनिंग देने के लिए पहले तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में कैंप लगाए। फिर बाकायदा अपने देश में कैंप चलाए।  लड़ाकों को वहां ले जाकर ट्रेनिंग दी जाती, फिर वापस तिब्बत भेज दिया जाता। इस अवधि के दौरान, तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू भारत की धरती से चीन विरोधी गतिविधियों को अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे, और भारत की ओर से तिब्बती छापामारों को कोई मदद नहीं दी गई थी।

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अमेरिका की चुस्त-दुस्त इंटेलिजेंस एजेंसी से ट्रेनिंग पाए तिब्बत के लड़ाकों को लगा कि अब तो वो चीन को तिब्बत से खदेड़ देंगे। 20 हजार के आस-पास संख्या बल भी हो गई थी और साथ ही ये भ्रम भी कि ट्रेनिंग देने वाला अमेरिका हथियारों से भी उसकी मदद करेगा। लेकिन ऐसा हो न सका और विद्रोह असफल हो गया। जिसके बाद साल 1959 में चीन के ख़िलाफ़ नाकाम विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी जहां उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया। उनके साथ तमाम चुशी लड़ाके भी कथित तौर पर भारत आ गए।

 1962 का भारत-चीन युद्ध 

 अक्टूबर 1962 में, चीन ने भारत पर पूर्वी और उत्तरी सीमाओं से हमला किया। यह युद्ध भारत के लिए विनाशकारी था और नेहरू ने हथियारों की मदद के लिए अमेरिका से संपर्क किया। 1962 के युद्ध के साथ ही हिंदुस्तान ने याद रखा था एक सबक कि दोबारा 62 जैसी नौबत ना आए। उस जंग में चीन भारी पड़ा था और भारत को बहुत कुछ खोना पड़ा था। भविष्य में ऐसे हालात न बने इसके लिए प्रधानमंत्री नेहरू ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के फांउडर डायरेक्टर भोलानाथ मलिक और बीजू पटनायक की सलाह पर एक अलग फोर्स के गठन को मंजूरी दे दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से प्लान डिस्कस किया गया। मेजर जनरल सुजान सिंह उबन को जिम्मा दिया गया, वह दूसरे विश्वयुद्ध में 22 माउंटेन रेजिमेंट के कमांडर थे। उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था और ब्रिटिश भारतीय सेना में उनका अच्छा-खासा कद था। इस यूनिट को इस्टैब्लिशमेंट 22  नाम दिया गया। 1967 में जिसका नाम बदलकर स्पेशल फ्रंटियर फोर्स रखा गया। 

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कुछ इस तरह से दी गई ट्रेनिंग 

14 नवंबर 1962 को ये फोर्स अस्तित्व में आई। शुरू में इसमें 5,000 जवान थे जिनकी ट्रेनिंग के लिए देहरादून के चकराता में नया ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया। शुरुआत में पहाड़ों पर चढ़ने और गुरिल्‍ला युद्ध के गुर सीखे। इनकी ट्रेनिंग में राॅ के अलावा अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का भी अहम रोल था। 1963 से, सीआईए के प्रशिक्षकों के एक ग्रुप ने नियमित अंतराल पर सुविधा से बाहर रोटेट कर तिब्बतियों को गुरिल्ला वारफेयर और अनियमित युद्ध के लिए ट्रेंड किया, जिसमें पैरा-जंपिंग भी शामिल थी। गुप्त ऑपरेटर के तौर पर उनकी भूमिका को ध्यान में रखते हुए, पूरी फोर्स को पैराशूट दक्ष होना अपेक्षित था। आगरा में पैरा-जम्पिंग ट्रेनिंग दी गई। यूनिट को बाकी सेना से सीक्रेट रखा गया था, और एक राज के रूप में, यह दिखाने का प्रयास किया गया कि काल्पनिक 12 गोरखा राइफल्स के सैनिकों को पैरा-जंपिंग में प्रशिक्षित किया जा रहा था।

ऑपरेशन ईगल, ऑपरेशन मेघदूत और ऑपरेशन विजय

1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में ऑपरेशन ईगल को सफल बनाने में इस फोर्स का अहम रोल था। इस ऑपरेशन में इस फोर्स के 46 जवान शहीद हुए थे। मिजोरम के सीमावर्ती शहर डेमागिरी से पूर्वी पाकिस्तान में दाखिल होकर, एसएफएफ ने चटगांव हिल ट्रैक्ट क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ गुरिल्ला रेड्स कीं और इन्फैंट्री ब्रिगेड के एस्केप रूट को ब्लॉक कर दिया था। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार में भी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के कमांडोज शामिल थे। सियाचीन की चोटियों पर ऑपरेशन मेघदूत लांच किये जाने के वक्त भी इस फोर्स के कमांडो ने अहम भूमिका निभाई थी। साल 1999 में कारगिल युद्ध के वक्त भी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ऑपरेशन विजय का हिस्सा थी। 

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जब चीन को मैदान छोड़ भागने पर किया मजबूर

भारत और चीन के बीच एलएसी वाला झगड़ा मई के महीने में शुरू हुआ। उसके बाद जून और जुलाई में बातचीत के जरिये कुछ तनाव कम हुआ। दोनों सेनाएं इन इलाकों में थोड़ा पीछे भी हटी। लेकिन 15 जुलाई के बाद से ये प्रक्रिया भंग सी हो गई। रिपोर्ट के अनुसार पैंगोंग झील इलाके में चीन की सेना ने पिछले कई महीनों से फिंगर 4 से फिंगर 8 के बीच कब्जा कर रखा है। यहां डिसइंगेजमेंट के लिए भारत चीन को लगातार कहता रहा लेकिन चीन टालमटोल करता रहा।

पहले पूरी बात समझाने के लिए एक नक्शा दिखाते हैं। लद्दाख में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी है। ये एलएसी पैंगोंग झील से होकर गुजरती है। पेंगोंग त्सो लेक की लंबाई 135 किलोमीटर है। बेहद सुंदर ये झील पर्यटकों के बीच बेहद आकर्षक का केन्द्र है। थ्री-ईडि़यट्स फिल्म के क्लाईमेक्स को यहां फिल्माए जाने से ये और भी पॉपुलर हुई है। 135 किलोमीटर लंबी इस झील का दो-तिहाई हिस्सा चीन के पास है और एक-तिहाई यानि 30-40 किलोमीटर भारत के पास है। तिब्बत की राजधानी, ल्हासा यहां से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर की दूरी पर है तो चीन की राजधानी तीन हजार छह सौ किलोमीटर। भारत और चीन के बीच मई-जून महीने में हुए झड़प झील के उत्तरी इलाके में हुआ। पेंगोंग लेक से सटी आठ पहाड़ियां हाथ की उंगलियों के आकार की हैं, इसलिए इन पहाड़ियों को 'फिंगर एरिया' कहा जाता है। एक से लेकर चार नंबर तक की फिंगर पर भारत का अधिकार है जबकि पांच से आठ पर चीन का कब्जा है। मई में जब चीन फिंगर फोर की तरफ आ गया तो यहीं से झगड़ा शुरू हुआ। ये तो पेंगोंग झील के उत्तर के झगड़े की बात हुई लेकिन झील के दक्षिण इलाके मं भी कुछ हो रहा था। पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे के पास ही चुशूल है। वहीं से थोड़ी दूर पर रेजांग ला (पास) है।  भारतीय सेना के बयान के अनुसार, पैंगोंग त्सो एरिया में 29/30 अगस्त की दरम्यानी रात को पीएलए के सैन्य दलों ने उस सहमति का उल्लंघन किया जो पूर्वी लद्दाख में जारी तनाव के दौरान सैन्य एवं कूटनीतिक बातचीत के दौरान बनी थी। सेना अलर्ट पर थी इसलिए चीन की ये कोशिश कामयाब नहीं हो पाई। जिसके बाद चीन तो जैसे बौखला सा गया कई बयान भी दिए कि भारत तो हमारे इलाके में घुस गया, पहले की सहमतियों और करार भी तोड़ दिया गया। फिर ये चर्चा चल पड़ी की क्या सच में भारत ने चीन पर कोई बड़ी कार्रवाई की इसपर हालांकि भारतीय सेना का कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया। लेकिन खबरों के अनुसार भारतीय सेना ने रणनीतिक इतिहास से सबसे अहम ऊंची चोटियां अपने कब्जे में ले ली हैं। ये सब हुआ चुशूल सेक्टर में जहां रेजांग ला, रेजिंग ला और ब्लैक टाॅप है। बता दें कि 1962 की जंग में भारतीय सेना की 13 कुमाऊं बटालियन ने आखिरी दम तक चीनी सैनिकों से लोहा लिया था। कंपनी का नेतृत्‍व मेजर शैतान सिंह कर रहे थे जिन्‍हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया। उस जंग में 120 जवानों की टुकड़ी ने शहादत देने से पहले 1,300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। झड़प वाली जगह रेजांग ला से 20 किलोमीटर की रेंज में है। बिना एक भी गोली चलाए भारत ने चीन से उसका सारा गुरूर एक झटके में छीन लिया। ये एक ऐसा ऑपरेशन था जिसने चीन की सेना को भी हैरान कर दिया। चोरी-छिपे घुसपैठ की कोशिश वाली आदतों के साथ जबतक चीनी जवानों के पांव पैगोंग त्‍सो के दक्षिणी किनारे तक पहुंचते, उससे पहले ही भारतीय सेना की स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स  ने अपना काम कर दिया। स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स की 'विकास' रेजिमेंट के आगे चीनी टिक नहीं सके। 

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खुफिया यूनिट की तरह करती है काम

इस फोर्स की खास बात ये है कि इसमें भारत के रह रहे तिब्बती मूल के जवान शामिल होते हैं। जिन्हें Mountain Warfare में महारत हासिल होती है। पहाड़ी चोटियों पर चढ़ने या फिर दुश्मन के इलाके में जाकर लड़ने दोनों में माहिर होते हैं। इसके ऑपरेशन्स की तरह ही ये फोर्स इतनी खुफिया है कि इसके मूवमेंट की जानकारी भारतीय सेना को भी नहीं होती है। इस फोर्स के जवानों को बहादुरी दिखाने पर सार्वजनिक रूप से सम्मानित नहीं किया जाता है। ये खुफिया फोर्स भारतीय खुफिया एजेंसी के अधीन काम करती है।  इनकी भर्ती प्रोसेस अलग होती है। ट्रेनिंग अलग होती है। महिलाएं भी एसएफएफ का हिस्सा होती हैं. एसएफएफ में रैंक्स भी भारतीय आर्मी के समकक्ष होती हैं। एसएसएफ के खुफिया यूनिट है इसलिए अब तक जितने भी मोर्चों पर इसने भारतीय सेना की मदद की है, उसे अक्सर छिपाकर ही रखा गया है और इससे जुड़ी सारी जानकारी जो भी मीडिया रिपोर्ट्स में हैं वो सेवानिवृत्तसैन्य अफसरों या एसएसएफ के रिटायर्ड जवानों से ऑफ द रिकार्ड बातचीत के आधार पर ही जुटाई गई। लेतिन 29-30 अगस्त के बाद आप इस फोर्स की चर्चा देश में ज्यादा इसलिए भी होने लगी क्योंकि कंपनी कमांडर नाइमा तेनजिंग की मौत लद्दाख के पास ही एक लैंडमाइन ब्लास्ट में हुई। उसके बाद से ही इस खुफिया यूनिट के इस पूरे ऑपरेशन में शामिल होने की बात सामने आने लगी। इंडिया टुडे ने भी अपनी रिपोर्ट में नाइमा तेनजिंग की मौत का जिक्र करते हुए उन्हें 7 विकास बटालियन का हिस्सा बताया है। विकास बटालियनों के नंबर एक से सात हैं और उन्हें ही एसएसएफ कहा जाता है। - अभिनय आकाश