क्या है RCEP समझौता, बिना भारत कितना प्रभावी है?

  •  अभिनय आकाश
  •  नवंबर 21, 2020   15:31
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क्या है RCEP समझौता, बिना भारत कितना प्रभावी है?
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डील के मुताबिक आरईसीपी अगले 20 सालों में कई तरह के सामानों पर टैरिफ खत्म करेगा। इम्पोर्ट एक्सपोर्ट ड्यूटीज हटाई जाएंगी। इसमें बौद्धिक संपदा, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएं, ई कामर्स और व्यवसायिक सेवाएं भी शामिल होंगी। मोटा-माटी कहे तो ये डील फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का एक विस्तृत स्वरूप मानी जा सकती है।

आरसीईपी पिछले कई दिनों से लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना हुआ है। ये एक प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट है या व्यापारिक समझौता है। सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम जैसे दस आसियान देशों के अलावा इसमें चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी शामिल हैं। भारत ने चीन के साथ व्यापार समझौते वाला समूह (क्षेत्रीय समग्र आर्थिक सहयोग समझौता) जॉइन करने से इनकार कर दिया है। भारत वास्तव में विकसित देशों के साथ कारोबारी समझौते करना चाहता है जिनमें अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजार शामिल हैं। भारत की कोशिश यह है कि इन बाजारों में भारत के उत्पाद और सेवाएं अन्य देशों की तुलना में प्रतियोगी कीमत जुटा सकते हैं, आसियान देशों में इसकी संभावना कम है। एशिया प्रशांत के 15 देशों ने रीजनल कंप्रिहेंसिव इकनामिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट ज्वाइन कर लिया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 नवंबर 2019 को बैंकॉक में आरसीईपी के शिखर सम्मेलन में साफ़ तौर से कहा कि, ‘आरसीईपी का मौजूदा समझौता इसकी बुनियादी भावना को प्रकट नहीं करता न ही ये इस मुद्दे पर पहले तय हुए साझा दिशा-निर्देशों को प्रतिपादित करता है।

सबसे पहले आपको 5 लाइनों में बताते हैं कि क्या है आरईसीपी?

  • आरसीईपी में दस आसियान देश और उनके छह मुक्त व्यापार भागीदार चीन, भारत, जापान, दक्षिण, कोरिया, भारत, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।
  • अगर आरसीईपी समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाता तो यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र बन जाता।
  • इसमें दुनिया की करीब आधी आबादी शामिल होती और वैश्विक व्यापार का 40 फीसदी और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का करीब 35 फीसदी इस क्षेत्र के दायरे में होता।
  • भारत को छोड़कर आरसीईपी के सभी 15 सदस्य देश शिखर सम्मेलन के दौरान करार को अंतिम रूप देने को लेकर एकमत थे।
  • समझौते को लेकर हालांकि बातचीत 2012 से ही चल रही थी 15 नवंबर 2020 को वियतनाम की राजधानी हनोय में इस पर हस्ताक्षर हुए।

जब आरसीपी की बातचीत चल रही थी तो भारत भी इसमें शामिल था। लेकिन सात साल विभिन्न दौरे की बातचीत चलने के बाद जब चीजें निर्णायक चरण में पहुंचकर ठोस शक्ल लेने लगी तो भारत को एहसास हुआ कि लाख कोशिशों के बावजूद प्रस्तावित समझौते को एक हद से ज्यादा बदला नहीं जा सकता। और अपने अंतिम रूप में यह भारतीय खेती तथा कृषि आधारित उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित करेगा। तब भारत सरकार ने कहा था कि 'इससे देश में सस्ते चीनी माल की बाढ़ आ जायेगी और भारत में छोटे स्तर पर निर्माण करने वाले व्यापारियों के लिए उस क़ीमत पर सामान दे पाना मुश्किल होगा, जिससे उनकी परेशानियाँ बढ़ेंगी। अब भारत के बगैर 15 देशों ने ट्रेड डील साइन की है। जिसमें भारत के पक्के दोस्त जापान और आस्ट्रेलिया भी हैं। कुछ विश्लेषक ये कह रहे हैं कि डील से बाहर रहकर भारत ने अपना नुकसान कर दिया है तो दूसरा पक्ष भारत सरकार का है कि डील हमारे हित में नहीं थी तो हमने साइन नहीं किया। ज्यादा सही बात क्या है इसका एमआरआई स्कैन करेंगे। पहले आरसीईपी का मकसद आपको समझाते हैं।

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ट्रेड डील का मकसद क्या है और सदस्य देशों को कैसे फायदा होगा

डील के मुताबिक आरईसीपी अगले 20 सालों में कई तरह के सामानों पर टैरिफ खत्म करेगा। इम्पोर्ट एक्सपोर्ट ड्यूटीज हटाई जाएंगी। इसमें बौद्धिक संपदा, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएं, ई कामर्स और व्यवसायिक सेवाएं भी शामिल होंगी। मोटा-माटी कहे तो ये डील फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का एक विस्तृत स्वरूप मानी जा सकती है। आरसीईपी के कई सदस्य देशों में पहले से ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी एफटीए हैं। उसके बावजूद भी वो आरसीईपी में अपना फायदा ढूंढ रहे हैं। दो देशों के बीच एफटीए के बावजूद प्रोडक्ट का कोई हिस्सा किसी तीसरे देश से लिया गया है तो टैरिफ छूट नहीं मिलती है। मसलन थाईलैंड और इंडोनेशिया में एफटीए है और थाइलैंड से जो चीज इंडोनेशिया में निर्यात हो रही है उसमें कोई टैरिफ नहीं लगते हैं लेकिन अगर इसमें कोई पार्ट आस्ट्रेलिया का लगा हो तो टैरिफ की ये छूट नहीं मिलेगी। आरसीईपी के सदस्य देशों के बीच अब ऐसी दिक्कते नहीं आएगी क्योंकि वो सब एक बड़े एफटीए का हिस्सा बन गए।

भारत के बिना आरसीईपी

जो लोग भारत के आरसीईपी में शामिल होने के समर्थक हैं, वो ये विचार रखते हैं कि भारत को इस में शामिल होने से फ़ायदा होगा. क्योंकि आज अमेरिका के टीटीपी से अलग होने की वजह से भारत को कोई मुनाफ़ा नहीं हो रहा है। ऐसे में आरसीईपी की मदद से विश्व व्यापार का एक वैकल्पि ढांचा खड़ा होगा। इसका विश्व की सामरिक राजनीतिक व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। बहुत से जानकार ये भी मानते हैं कि चीन का बीआरआई प्रोजेक्ट दुनिया में अपने सामरिक और रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए बनाया गया है। चीन, सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों के विशाल नेटवर्क के माध्यम से दुनिया के एक बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। भारत के आरसीईपी से हटने का फ़ैसला उस समय आया है जब चीन पर ये आरोप है कि वो आरसीईपी के शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते पर आख़िरी मुहर लगवाने में जुटा हुआ था। इस बात के निश्चित रूप से व्यापक रणनीतिक आयाम हैं। चीन के लिए ये आर्थिक मक़सद भी है और भौगोलिक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम भी। आरसीईपी समझौते पर आख़िरी मुहर के माध्यम से चीन कई लक्ष्य हासिल करना चाहता है।

दूसरी बात ये है कि आरसीईपी के माध्यम से चीन पश्चिमी देशों को ये संदेश भी देना चाहता है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के पास भी आर्थिक शक्ति है। ये बात भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमेरिका के आपसी समझौते के संदर्भ में भी कही जा सकती है। क्योंकि इस के तीन सदस्य देश आरसीईपी में शामिल होने के लिए परिचर्चा में भागीदार हैं। इसी के साथ-साथ जापान, सिंगापुर और आसियान भी अब ये मान रहे हैं कि अब एक नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है।

आरसीईपी से भारत पर क्या पड़ता असर?

इस डील में भागीदार बनने पर भारत में आयात की जाने वाली 80 से 90 फीसदी चीजों पर इंपोर्ट ड्यूटी कम हो जाती। भारतीय इंडस्ट्री में ये भी डर है कि इंपोर्ट ड्यूटी कम होने से भारत के बाजार में विदेशी सामान की भरमार हो जाएगी, खासकर चीन से। ऐसी सूरत में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है। भारत का आरसीईपी के अन्य सदस्य देशों के साथ भी व्यापार घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

कमजोर पड़ सकता था आत्मनिर्भर भारत अभियान

भारत के आरसीईपी से अलग होने के बाद, आरसीईपी की चमक धूमिल हो गई है। आरसीईपी का मुख्य लक्ष्य भारत के विशाल बाज़ार तक पहुंच बनाने का था। बाक़ी दुनिया के लिए भारत की 1.4 अरब की आबादी एक बड़ा बाज़ार है, जिसके नागरिकों की आमदनी पिछले कई वर्षों से 6 से 8 फ़ीसद की दर से बढ़ रही है। इससे भारत को अपनी आबादी के रूप में एक बहुत बड़ा फ़ायदा मिलता है, जिस के पास युवा ग्राहकों की बड़ी तादाद है। और ये ग्राहक दिनों दिन अमीर हो रहा है। इसके अलावा कमज़ोर घरेलू उद्योगों की वजह से आज इस युवा ग्राहकों के बाज़ार की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं. क्योंकि इनकी अलग-अलग मांगों को घरेलू उद्योग पूरा नहीं कर पा रहे हैं। मौजूदा औद्योगिक उत्पाद बेहद कम है. अकुशल उत्पादन प्रक्रिया और सप्लाई चेन की बाधाएं भारत के उद्योगों को विदेशी मुक़ाबले के लिए तैयार होने से रोक रही हैं। अब जबकि भारत की सरकार देश की अर्थव्यवस्था को 5 ख़रब तक पहुंचाने के लक्ष्य की आकांक्षा रखती है, तो इस मक़सद को पूरा करने के लिए भारत के पास सबसे बड़ी ताक़त इसका अपना उपभोक्ता बाज़ार ही है।

इससे ये सवाल भी पैदा होता है कि जिस कारण से मोदी सरकार ने पिछले साल नवंबर में 'द रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप' यानी आरसीईपी वार्ता से बाहर होने का एलान किया था - वो फ़ैसला सही था या नहीं. ये फ़ैसला भारत को आत्मनिर्भर करने और घरेलू बाज़ार को बाहर की दुनिया से सुरक्षित और ज़्यादा मज़बूत बनाने की वजह से लिया गया था। आरसीईपी पर मोदी सरकार का फ़ैसला पीएम मोदी की मज़बूत लीडरशिप दर्शाता है।- अभिनय आकाश







हर दिल जो जिहाद करेगा पहचाना जाएगा, धर्म छुपाकर शादी करने वाला जेल की सजा पाएगा

  •  अभिनय आकाश
  •  नवंबर 25, 2020   16:59
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हर दिल जो जिहाद करेगा पहचाना जाएगा, धर्म छुपाकर शादी करने वाला जेल की सजा पाएगा
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देशभर में लंबे समय से विवादों का सबब बन रहे 'लव जिहाद' पर अब भाजपा शासित राज्यों में कानूनी शिकंजा कसने वाला है। दरअसल, दूसरे धर्मों की युवतियों खासकर हिंदू युवतियों से मुस्लिम युवकों द्वारा जबरिया, प्रलोभन देकर या धोखाधड़ी पूर्वक किए जाने वाले विवाहों के मामले सामने आते रहे हैं।

क्या वाकई हमारे देश में लव जिहाद पूरी तरह से पैर जमा चुका है। क्या इसे खत्म करने के लिए देश में एक कड़े कानून की आवश्यकता है। लव जिहाद का मुद्दा एनसीआर के नोएडा ही नहीं बल्लभगढ़ की निकिता हो या कानपुर से लेकर इंदौर तक, भोपाल से लेकर बागपत तक जिधर भी देखो लव जिहाद की खबर सामने आ रही है। साहिल खान साहिल सिंह बन जाता है और एक मासूम को अपने प्यार के जाल में फंसाता है और फिर एक शर्मनाक खेल खेला जाता है। ये खेल बागपत, भोपाल, केरल, इंदौर देश के हर कोने में होता है। ऐसे में क्या इस पर देशव्यापी कानून बनने का वक्त आ चुका है। देशभर में लंबे समय से विवादों का सबब बन रहे 'लव जिहाद' पर अब भाजपा शासित राज्यों में कानूनी शिकंजा कसने वाला है। दरअसल, दूसरे धर्मों की युवतियों खासकर हिंदू युवतियों से मुस्लिम युवकों द्वारा जबरिया, प्रलोभन देकर या धोखाधड़ी पूर्वक किए जाने वाले विवाहों के मामले सामने आते रहे हैं। इसके अलावा युवतियों द्वारा इंकार करने पर उनकी जघन्य हत्याएं भी हुई हैं। हरियाणा के बल्लभगढ़ में कथित लव जिहाद की आड़ में हुई युवती की हत्या इसका ताजा उदाहरण है, जिसके बाद से ही कई राज्यों में लव जिहाद कानून बनाने की तैयारी की जा रही है।

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22 साल की एक लड़की अपने फिटनेस के लिए जिम जाती है। आरोप के मुताबिक साहिल खान नाम का फिटनेस ट्रेनर उससे साहिल सिंह के नाम से मिलता है। उसे भावनात्मक तौर पर अपने से जोड़ता है। अपने घर पर छूठा दुख दर्द बताकर उससे हजारों रुपए ऐंठता है। प्यार भरा जीवन का झांसा देकर लड़की की मां-बाप की जानकारी के बगैर उससे शादी करता है। शादी करने के बाद लड़की के पैरों चले जमीन खिसक जाती है तब उसे पता चलता है कि जिसने उससे शादी की वो साहिल सिंह ने बल्कि साहिल खान है। फिर शुरु होता है लड़की को प्रताड़ित करने का सिलसिला और आखिर में जब लड़की उससे पीछा छुराना चाहती है तो आरोप है कि साहिल खान 25 लाख रुपए की मांग करता है। ये पूरी घटना नोएडा के सेक्टर 15ए में रहने वाली एक लड़की के साथ घटी है। इतना ही नहीं साहिल खान ने मुस्लिम होता हुए हिन्दू नाम से आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज भी बनवा लिए। नोएडा पुलिस ने आरोपी साहिल खान के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। । उत्तर प्रदेश के ही बागपत में लवन जिहाद के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए डाक्टर और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। महिला ने डाक्टर पर पहचान छिपाकर शारिरिक शोषण करने और शादी के लिए धर्म परिवर्तन करने के लिए दवाब बनाने का आरोप लगाया था। हाल ही में भोपाल में लव जिहाद का मामला सामने आया था जिसका खुलासा तब हुआ जब पीड़ित लड़की की संदिग्ध हालत में मौत हो गई। यूपी के झांसी में रहने वाली एक नाबालिग लड़की को भोपाल का एक लड़का करीब डेढ़ साल पहले बहला-फुसलाकर ले आया था। भोपाल आने के बाद लड़की का हिन्दू नाम बदलकर तरन्नुम कर दिया। 

क्या है लव जिहाद का मतलब?

इस्लाम में जिहाद शब्द का अर्थ धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना है। वर्तमान हालात में लव जिहाद एक गढ़ा हुआ शब्द है, जिसका मतलब शादी या प्रेम का झांसा देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन करवाने से समझा जाता है। माना जाता है कि लव जिहाद वह धोखा है, जिसके तहत कोई मुस्लिम युवक या आदमी किसी गैर मुस्लिम युवती या महिला को प्रेम का जाल बिछाकर मुस्लिम बनने पर मजबूर करता है। हालांकि यह संगठित रूप से किया जाता हो, ऐसा सबूत नहीं है। लेकिन पहचान छिपाकर शादी करना और धर्म बदलने के लिए दबाव बनाने के कई मामले देश के विभिन्न कोने से लगातार सामने आए हैं। 

क्या है लव-जेहाद की पृष्ठभूमि?

‘लव-जेहाद’ की पृष्ठभूमि उस विषैले दर्शन में निहित है, जिसमें विश्व को ‘मोमिन’ और ‘काफिर’ के बीच बांटा गया है।  जिसके अनुसार, प्रत्येक सच्चे अनुयायी का यह मजहबी कर्तव्य है कि वह काफिरों की झूठी पूजा-पद्धति को नष्ट कर तलवार, छल, फरेब और प्रलोभन के माध्यम से उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करे या फिर मौत के घाट उतार दे- चाहे इसके लिए अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े। इसी मानसिकता ने मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, गौरी, तैमूर, बाबर, अलाऊद्दीन खिलजी आदि कई विदेशी आक्रांताओं को भारत पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया। इसी जेहाद ने 70 वर्षों में पाकिस्तान की जनसंख्या को शत-प्रतिशत इस्लाम बहुल कर दिया है। क्या यह सत्य नहीं कि विभाजन के समय जिस पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में 15-16 प्रतिशत आबादी हिनदू, सिख और जैन आदि अनुयायियों की थी, वे आज एक प्रतिशत रह गए हैं? पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के प्रति जेहाद आसान है। जहां 79 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है,  इसलिए यहां पाकिस्तान की भांति तौर-तरीके अपनाकर गैर-मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन करना कठिन है। इसी कारण यहां जेहाद के लिए तथाकथित प्रेम का प्रयोग किया जा रहा है।

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कहां से हुई लव जिहाद की शुरूआत?

साल 2009 में, रिटायर्ड जस्टिस केटी शंकरन ने माना था कि केरल और मैंगलोर में जबरन धर्म परिवर्तन के कुछ संकेत मिले थे। तब उन्होंने केरल सरकार को इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान करने की बात कही थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रेम के नाम पर, किसी को धोखे या उसकी मर्ज़ी के बगैर धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

लव जिहाद के कुछ चर्चित केस

साल 2009 में एक केस चर्चा में आया था जब एक लड़की को इस्लाम में कन्वर्ट किए जाने के आरोप लगे थे। स्पेशल ब्रांच के हवाले से उस वक्त आई खबरों में कहा गया था कि नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट और कैंपस फ्रंट जैसे कुछ समूह कई शहरों में, खास तौर से कॉलेजों में योजनाबद्ध ढंग से हिंदू और ईसाई लड़कियों को इस्लाम में कन्वर्ट करवाने के लिए 'प्रेम के झांसे' का खेल खेल रहे थे।

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राष्ट्रीय स्तर की शूटर तारा शाहदेव ने खुलकर कहा था कि उसके ससुराल पक्ष ने इस्लाम कबूल करने के लिए प्रताड़ना दी। तारा ने कहा था कि उसने जिस व्यक्ति से शादी की थी, यह समझकर की थी कि वह हिंदू था। इस मामले में सीबीआई जांच हुई और पीड़िता के पति समेत ससुराल पक्ष के खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई।

हादिया केस भी लव जिहाद का एक बेहद चर्चित केस था। हादिया केस में लव जिहाद के तार सीरिया के आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़े थे। हाई कोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए से जांच को कहा था और एनआईए ने कहा था कि 'लव जिहाद नकारा नहीं' जा सकता. इसके बाद ताज़ा मामलों में कानपुर और बल्लभगढ़ के कुछ मामले सुर्खियों में रहे।

क्या हैं कानूनी प्रावधान?

लव जिहाद के ज़्यादातर केसों में यौन शोषण संबंधी कानूनों के तहत मुकदमे चलते रहे हैं। आरोपी को पेडोफाइल मानकर पॉक्सो और बाल विवाह संबंधी कानूनों के तहत भी केस चलते रहे हैं। इसके अलावा, बलपूर्वक शादियों के मामले में कोर्ट आईपीसी के सेक्शन 366 के तहत सज़ा दे सकते हैं. महिला की सहमति के बगैर यौन संबंध बनाने का आरोप साबित होने पर 10 साल तक की कैद की सज़ा हो सकती है।

ऐसे मामलों में कानूनी पेंच यहां फंसता रहा है कि मुस्लिम शादियां शरीयत कानून और हिंदू शादियां हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कानूनन होती हैं। चूंकि मुस्लिम शादियों में सहमति दोतरफा अनिवार्य है इसलिए इन शादियों में अगर यह साबित हो जाता है कि सहमति से ही शादी हुई थी, तो कई मामले सिरे से खारिज होने की नौबत तक आ जाती है।

एमपी में तैयार है संभावित कानून की रूपरेखा

मध्य प्रदेश में कानून की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। एमपी सरकार के एक मंत्री ने बताया कि लव जिहाद के खिलाफ संभावित कानून में अपराधी को 5 साल की सजा का प्रावधान किया गया है। मामले में गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज किया जाएगा। संभावित कानून के मुताबिक, धर्म परिवर्तन के लिए एक महीने पहले ही अनुमति लेनी होगी। मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा सत्र में इस प्रस्ताव को सदन में पेश किया जा सकता है।

 यूपी में लव जिहाद कानून

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार 'लव जिहाद' के विरुद्ध अध्यादेश लेकर आई है। अध्यादेश में योगी सरकार ने लव जिहाद जैसा घिनौना कृत्य करने वालों पर सख्त रुख अख्तियार किया है। अध्यादेश के अनुसार धोखे से धर्म परिवर्तन कराने पर 10 साल की सजा का प्रावधान है। साथ ही अध्यादेश में इस बात पर भी बल दिया गया है कि यदि धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो इसकी सूचना जिले के जिलाधिकारी को दो महीने पहले देनी होगी।

लव जिहाद पर यूपी के क़ानून में क्या?

उप्रविधि विरुद्ध प्रतिषेद अध्यादेश 2020

धोखा या लालच देकर शादी करना अपराध

शादी के बाद जबरन धर्म बदलवाने पर सज़ा

दोषी को 5 से 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान

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हरियाणा : कानून बनाने की तैयारी

लव जिहाद के खिलाफ हरियाणा में भी कानून बनाने पर विचार चल रहा है। राज्य के गृह मंत्री अनिल विज ने इसी माह ट्वीट कर यह जानकारी दी थी। बता दें कि फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में हुए निकिता तोमर हत्याकांड के बाद लव जिहाद का मामला नए सिरे से गरमाया है। विज ने यह भी कहा था कि इस मामले की धर्म-परिवर्तन और लव जिहाद की दृष्टि से भी जांच करवाई जाएगी। राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने निकिता हत्याकांड पर पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा था कि यह बेहद गंभीर मामला है। इसे धर्मांतरण से जोड़कर देखा जा रहा है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें ऐसे प्रावधान करने पर विचार कर रही हैं, ताकि ऐसा मामलों की पुनरावृत्ति न हो।

कर्नाटक : लव जिहाद पर लगेगी लगाम

मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने भी कहा है कि राज्य सरकार 'लव जिहाद' के नाम पर धर्मांतरण पर लगाम के लिए कड़े कदम उठाएगी। पांच नवंबर को दिए बयान में उन्होंने कहा 'हाल ही में कर्नाटक में लव जिहाद के नाम पर धर्मांतरण की खबरें आई हैं। मैंने इस बारे में अधिकारियों से बात की है। दूसरे राज्य क्या कर रहे हैं या क्या नहीं कर रहे, यह अलग बात है। लेकिन कर्नाटक में इस पर लगाम लगाई जाएगी। जब ‘जिहादी’ राज्य में महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ कर रहे हैं तो सरकार चुप नहीं बैठेगी।' येदियुरप्पा ने कहा कि राज्य की युवा लड़कियों का प्यार और पैसे के नाम पर बहला-फुसलाकर धर्मातंरण किया जा रहा है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 'लव जिहाद' को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा और कहा कि यह शब्द उसने देश को बांटने व सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने के लिए गढ़ा है. गहलोत ने इस बारे में एक ट्वीट में लिखा, लव जिहाद शब्द भाजपा ने देश को बांटने व सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए गढ़ा है। इसी बारे में एक और ट्वीट में गहलोत ने लिखा है कि वे देश में ऐसा माहौल बना रहे हैं जहां वयस्कों की आपसी सहमति राज्य सरकार की दया पर निर्भर होगी. शादी विवाह व्यक्तिगत निर्णय होता है और वे इस पर लगाम लगा रहे हैं जो कि व्यक्तिगत आजादी छीनने जैसा ही है।

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ये एक बड़ा सवाल है कि कौन-सा मजहब है, जो अपना संख्या-बल बढ़ाने की कोशिश नहीं करता ? वे ऐसा इसीलिए करते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि ईश्वर, अल्लाह या यहोवा को प्राप्त करने का उनका मार्ग ही एक मात्र मार्ग है और वही सर्वश्रेष्ठ है। सिर्फ हिंदू धर्म के अनुयायी ही सारी दुनिया में एक मात्र ऐसे हैं, जो यह मानते हैं कि ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’ याने सत्य एक ही है लेकिन विद्वान उसे कई रूप में जानते हैं। इसीलिए भारत के हिंदू या बौद्ध या जैन या सिख लोगों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी तन, तलवार या तिजोरी का सहारा नहीं लिया।  वास्तव में, ‘‘लव-जेहाद’’ देश की बहुलतावादी और पंथनिरपेक्षता के लिए बड़ा खतरा है। 2 वयस्क प्रेमियों के बीच मजहब की दीवार कभी नहीं बननी चाहिए परंतु यदि तथाकथित ‘‘प्यार’’ के माध्यम से एक वयस्क मजहबी कारणों से दूसरे को अपने प्रेम के प्रपंच में फंसाए, तो उसे धोखा ही कहा जाएगा। क्या इस प्रकार के धोखे को स्वीकार करने से सभ्य समाज स्वस्थ रह सकता है?- अभिनय आकाश







भगवान मुरुगन के मंदिरों तक BJP की यात्रा, क्यों हो रहा है विरोध?

  •  अभिनय आकाश
  •  नवंबर 19, 2020   15:23
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भगवान मुरुगन के मंदिरों तक BJP की यात्रा, क्यों हो रहा है विरोध?
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तमिलनाडु में भाजपा की ‘वेल यात्रा’ से वहाँ की द्रविड़ पार्टियाँ भयभीत हो गई हैं। यहाँ तक कि राजग में उसकी सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके ने भी इस मामले में भाजपा के खिलाफ रुख अख्तियार कर लिया है। एआईएडीएमके सरकार ने राज्य में धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए इस रैली की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।

बिहार का चुनावी रण में रणवीर बनकर उभरने के बाद भारतीय जनता पार्टी की निगाहे अब तमिलनाडु पर है। दक्षिण के इस राज्य में चुनाव में तो अभी करबी करीब पांच-छह महीने का समय शेष है और सूबे में अगले वर्ष अप्रैल-मई के महीने में चुनाव हो सकते हैं। तमिलनाडु की राजनीति को देखें तो यहां वर्षों से करूणानिधि की डीएमके और एमजीआर की बनाई पार्टी एआईडीएमके जिसकी कमान जयललिता के हाथों में रही। लेकिन इन दोनों नेताओं के निधन के बाद राज्य की राजनीति में बने वैक्युम में देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कवायद में लगी है। इसी कवायद में से एक है वेत्री वेल यात्रा। 

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तमिलनाडु में भाजपा की ‘वेल यात्रा’ से वहाँ की द्रविड़ पार्टियाँ भयभीत हो गई हैं। यहाँ तक कि राजग में उसकी सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके ने भी इस मामले में भाजपा के खिलाफ रुख अख्तियार कर लिया है। एआईएडीएमके सरकार ने राज्य में धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए इस रैली की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। पार्टी ने कहा कि ‘भगवा झंडा लहराने वालों द्वारा धार्मिक घृणा फैलाने’ की अनुमति नहीं दी जाएगी। 

अपने मुखपत्र नमादु अम्मा के माध्यम से पार्टी ने कहा कि राज्य में जाति-धर्म के आधार पर लोगों को विभाजित करने वाली यात्रा नहीं निकालने दी जाएगी। उसने कहा कि सभी सम्बंधित लोगों को समझ लेना चाहिए कि तमिलनाडु के लोगों ने बार-बार साबित किया है कि द्रविड़ प्रदेश में धर्म मानवता के लिए दिशा-निर्देशक प्रकाश-पुँज हैं, न कि घृणा और विभाजन का माध्यम। उसने कहा कि सही मजहब शांति और प्यार का ही सन्देश देते हैं। 

एआईएडीएमके भाजपा की सहयोगी पार्टी है। भाजपा को भरोसा है कि एक माह तक चलने वाली यह धार्मिक यात्रा आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को खासा राजनीतिक डिविडेंड देगी। भाजपा की यह यात्रा इस बात का भी साफ संकेत है कि शेष भारत में चला मर्यादा पुरूषोत्तम राम का भावनात्मक कार्ड तमिलनाडु में बेअसर है। तमिल राम को भगवान तो मानते हैं, पर उस रूप में नहीं, जिस रूप में वो भगवान मुरूगन को मानते हैं। 

पहले भगवान मुरूगन के बारे में बताते हैं। आप सभी जानते है। कि मुरुगन या कार्तिकेय भगवान शिव और पार्वती के दूसरे पुत्र हैं। तमिलनाडु में भगवान कार्तिकेय को भगवान मुरुगन के रूप में पूजा जाता है। ‘मुरुगन’ शब्द बना तमिल शब्द ‘मुरुकन’ से. इसका मतलब होता है ‘युवा’ तमिल साहित्य की सबसे पुरानी किताबों, जैसे ‘तोलकप्पियम’ में भी इनका वर्णन मिलता है। तमिलनाडु में मुरुगन के छह सबसे महत्वपूर्ण निवास स्थान हैं, जिन्हें अरु पदई विदु के नाम से जाना जाता है। यहाँ तमिलनाडु में सिक्कल सिंगारवेलन मंदिर के साथ भारत में सबसे प्रसिद्ध भगवान मुरुगन मंदिरों के बारे में भी बताया गया है। 

पलानी मुरुगन मंदिर, डिंडीगुल : पलानी मुरुगन मंदिर पलानी पहाड़ियों पर डिंडीगुल के पलानी शहर में स्थित है। पलानी का पहाड़ी मंदिर भारत में भगवान मुरुगन का सबसे पवित्र मंदिर है। 

स्वामीमलाई मुरूगन मंदिर, कुंभकोणम: स्वामीमलाई मुरूगन मंदिर कुंभकोणम के पास एक नदी के किनारे स्वामीमलाई में स्थित है। कुंभकोणम का स्वामीमलाई मंदिर तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के छह पवित्र मंदिरों में से एक है। 

तिरुचेंदुर मुरुगन मंदिर, तूतीकोरिन: तिरुचेंदुर मुरुगन मंदिर दक्षिण भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक है, जो तिरुचेंदूर में समुद्र के किनारे स्थित है। यह तमिलनाडु के चौथे हिंदू मंदिरों में से एक है। 

थिरुप्पुरमकुंरम मुरुगन मंदिर, तिरुप्पुरनकुमारम: थिरुप्पुरमुकुमारम मुरुगन मंदिर मदुरई शहर के पास स्थित है और ये मंदिर खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान शिव और विष्णु जी की एक साथ मूर्ति राखी हुई है। 

थिरुथानी मुरुगन मंदिर, थिरुट्टानी: थिरुथानी मुरुगन मंदिर चेन्नई के पास थिरुट्टनी की पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर तमिल नाडु में भगवान मुरुगन के छह पवित्र मंदिरो में से एक है। 

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यात्रा के धार्मिक और राजनीतिक महत्व 

भगवान मुरूगन की 6 अधिष्ठानों (निवास) की यात्रा तमिलनाडु का महत्वपूर्ण धार्मिक इवेंट है। खासकर ओबीसी और दलितों में मुरूगन के प्रति अगाध श्रद्धा है। यकीनन इस यात्रा से बीजेपी का द्रविड पार्टियों के साथ विवाद बढ़ेगा। द्रविड पार्टियां भी भाजपा के इस नए ‘यात्रा कार्ड’ से चौकन्नी हो गई हैं। बीजेपी का ये दांव तमिलनाडु में राजनीतिक दृष्टि से कामयाब होता है या नहीं, देखने की बात है। द्रविड राजनीति की दृष्टि से भी भगवान मुरूगन का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि डीएमके के दिग्गज नेता करूणानिधि ने 1982 में मदुराई से थिरूचेंदुर ( मुरूगन मंदिर) तक ऐसा ही लंबा मार्च एआईएडीएमके के तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन के जमाने में निकाला था। तब उसका मकसद थिरूचेंदूर मंदिर के एक अधिकारी की संदिग्ध मौत पर परिजनों को न्याय दिलाना तथा भगवान मुरूगन के भाले में जड़ा हीरा गायब होने की जांच की मांग करना था। भगवान शिव पु‍त्र कार्तिकेय जिनका तमिल नाम है मुरूगन न्हें तमिलभूमि का रक्षक भी माना जाता है। तमिलनाडु में हर साल तमिल पंचांग के थाई माह (जनवरी-फरवरी के बीच) में ‘अरूप्पदई वीरू यात्रा’ का आयोजन होता है। इसके तहत भक्त गण लाखों की संख्‍या में पैदल ही नंगे पैर भगवान मुरूगन के मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 

बीजेपी का यात्रा प्लान 

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नवंबर 21, 2020 को तमिलनाडु की यात्रा पर हैं, जहाँ भाजपा के नए विस्तार का बिगुल फूँका जाना है। तमिलनाडु में 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 1957 से लेकर 2018 तक 61 सालों में 13 विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव जीतने वाले एम करूणानिधि के निधन के बाद ये पहला चुनाव होगा। साथ ही 27 सालों में 6 विधानसभा क्षेत्रों से 9 चुनाव जीतने वाली जयललिता भी इस बार नहीं होंगी। ऐसे में दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के बिना हो रहे इस चुनाव में भाजपा अपनी पैठ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। 6 नवंबर को शुरू हुई यात्रा 6 दिसंबर को खत्म करने का प्लान है। यात्रा में तिरुत्तनी से शुरू होकर तिरुचेंदुर पर खत्म होगी। इस दौरान बीजेपी भगवान मुरुगन के मंदिरों से होकर गुजरेगी। इस दौरान तमिलनाडु बीजेपी के कई नेता यात्रा में मौजूद रहेंगे और लोगों से मिलते और संबोधित करते हुए आगे बढ़ेंगे.इस यात्रा के लिए बाकायदा यूट्यूब कैंपेन और एंथम सॉन्ग भी लॉन्च किया गया है. चूंकि ये पवित्र स्थान पूरे तमिलनाडु में फैले हैं, इस लिहाज से इसे इलेक्शन से पहले माहौल बनाने वाली यात्रा भी कहा जा रहा है। 

वेत्रीवेल यात्रा उस रथ यात्रा की तरह ही है जिसे बीजेपी देश के अन्य हिस्सों में समय-समय पर निकालती रही है। तमिलनाडु में भी बीजेपी यह प्रयोग अपना रही है। इस यात्रा के तहत बीजेपी तमिलनाडु के अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों में अपना जनसंपर्क तेज करेगी। सत्तारूढ़ एआईएडीएमके सरकार की मनाही के बावजूद बीजेपी यह यात्रा निकाल रही है। सरकार का कहना है कि कोविड महामारी में ऐसी किसी गैदरिंग की इजाजत नहीं दी जा सकती, जबकि बीजेपी इसे भगवान मुरुगन का काम बता कर आगे बढ़ रही है। अमित शाह के दौरे के दौरान वेत्रीवेल यात्रा के और जोर पकड़ने की संभावना है। 6 नवंबर को उत्तरी तमिलनाडु स्थित तिरुतन्नी मंदिर से शुरू हुई यात्रा दक्षिणी तमिलनाडु के तिरुचेंदूर मंदिर में संपन्न होगी। 

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एआईएडीएमके क्यों है खिलाफ 

तमिलनाडु सरकार इस यात्रा को रोकने के पीछे कोविड 19 की समस्या बता रही है। उसका कहना है कि अब भी तमिनलाडु के कई इलाके कोविड के संकट से बचे हुए हैं। लेकिन अगर इस तरह से लंबी यात्राएं की गईं, तो एक जगह से दूसरी जगह संक्रमण फैलने का खतरा है। 

यात्रा के पीछे की राजनीति 

पिछले दो बार चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो बीजेपी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है। उसका वोट शेयर 2014 में 5.56 प्रतिशत रहा वहीं 2019 के चुनाव में वो गिरकर 3.66 प्रतिशत पर आ गया। 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 134 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन वोट उसे मात्र 2.8 फीसदी ही मिले थे। ऐसे में अपने जनाधार को धार देने के लिए बीजेपी हिंदू वोटों को एकजुट करने का अच्छा मौका देख रही है। 







क्या है गुपकार डिक्लेरेशन और क्या है इसका 'गुप्त' एजेंडा?

  •  अभिनय आकाश
  •  नवंबर 18, 2020   15:54
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क्या है गुपकार डिक्लेरेशन और क्या है इसका 'गुप्त' एजेंडा?
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14 महीने पहले ये ऐलान तो नजरबंदी के अंधेरे में गुम हो गया। फारूक, उमर और महबूबा तीनों को जिस अंदेशे से केंद्र ने नजरबंद किया था वो अब सच होता नजर आ रहा है। आजाद हवा में सांस लेते ही कश्मीर के नेता अपने पुराने एजेंडे पर लौट आए हैं।

जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषदों के लिए चुनाव और पंचायतों के लिए उपचुनाव के लिए अधिसूचना 5 नवंबर को जारी हुई थी। जिसमें पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन जिसमें जम्मू कशमीर की क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं और कांग्रेस ने घोषणा की है कि वो इस चुनाव में हिस्सा लेंगे। जम्मू कश्मीर राज्य चुनाव आयुक्त केके शर्मा ने 20 जिलों में डीडीसी यानी जिला विकास परिषद चुनाव के लिए अधिसूचना जारी की थी। डीडीसी 28 नवंबर से 22 दिसबंर तक आठ चरणों में संपन्न होंगे। 

जम्मू कश्मीर में जैसे-जैसे सर्दी आ रही है वैसे ही 370 को लेकर सूबे का राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है। जम्मू कश्मीर के अमन चैन के दुश्मन एकजुट होते हुए दिखाए दे रहे हैं। उनका एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट है गुपकार डेक्लेरेशन को आगे बढ़ाना। जम्मू कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और फिर महबूबा मुफ्ती की रिहाई के बाद से ही राजनीति शुरू हो गई है। महबूबा-अब्दुल्ला की नफरती जोड़ी की 370 पर रस्सी जल गई लेकिन एठन नहीं गई। महबूबा-फारूक 370 का राग अलापते हुए राजनीतिक लामबंदी में लगे हैं जिनका मकसद एक ही है केंद्र के विरोध को हवा देना। 370 पर आक्रोश भड़काना और सियासत चमकाना। 

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अनुच्छेद 370 के पौरोकार कश्मीरी नेताओं की पिछले 14 महीने से बोलती बंद थी। लेकिन नजरबंदी से आजादी मिलते ही उम्मीदों के पंख फड़फड़ाने लगे। श्रीनगर में नेताओं का मिलन समारोह शुरू हो गया। एक बार फिर कश्मीर की स्वायत्ता का जज्बाती मुद्दा भड़काने की चाल चली जा रही है। लेकिन फारूक और महबूबा शायद ये भूल रहे हैं कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ सकती। वो एक बार फिर देश का मूड भांपने में गलती कर रहे हैं। कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां 370 के कवच की आड़ में सालों से सियासी रोटियां सेंकती रही और 5 अगस्त को मोदी सरकार ने वो रास्ता बंद कर दिया था। नजरबंदी में नेताओं की चली नहीं लेकिन आजाद होते ही गुपकार घोषमा के कागजात बाहर निकाल लाए हैं और खुलकर लामबंदी भी होने लगी है। 

देश की संसद ने तय किया और जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मुक्ति मिल गई। एक हिन्दुस्तान, एक संविधान, एक विधान के दायरे में कश्मीर भी आ गया। लेकिन कश्मीर के नेता सकते में आ गए। 370 के अंत का मतलब स्वायत्ता का सब्जबाग दिखाने वाली सियासत का अंत था। अब्दुल्ला परिवार हो या मुफ्ती खानदान 370 खत्न करने पर बेचैनी हर तरफ थी। कश्मीरियों के जज्बात से खेलने वाली राजनीति का बोरिया बिस्तर बंधने जा रहा था। संसद में प्रस्ताव पारित होने से ठीक एक दिन पहले यानी 4 अगस्त 2019 को फारूक अब्दुल्ला के घर कश्मीर के राजनीतिक दलों की बैठ हुई थी। बैठक में अनुच्छेद 370 हटाने की मुखालफत का संकल्प लिया गया। संकल्प को गुपकार घोषणा का नाम दिया गया क्योंकि फारूक अब्दुल्ला का घर गुपकार इलाके में ही है। गुपकार रोड के एक तरफ़ भारत और पाकिस्तान के लिए यूएन का दफ़्तर है और दूसरी तरफ़ कश्मीर के अंतिम राजा का घर है। गुपकार बहुत ही सुरक्षित इलाक़ा है और हमेशा से ही यहां पर सत्ता में शामिल या उनसे जुड़े लोगों का आवास रहा है। राज्य के सारे बड़े नेता और नौकरशाह इसी जगह रहते हैं।

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गुपकार घोषणा में कौन-कौन दल

गुपकार घोषणा पर जम्मू कश्मीर के छह बड़े नेताओं के हस्ताक्षर थे। नेशनल काफ्रेस के फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस के जीए मीर, सीपीएम के एमवाई तारीगामी, पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद गनी लोन,आवामी नेशनल कांफ्रेस के मुजफ्फर शाह। यानी वो तमाम पार्टियों के नुमाइंदे जिनको अपनी नैया डूबती दिख रही थी।

अब जरा घोषणापत्र का मजबून भी देखिए..

हम अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली के लिए कटिबद्ध हैं। राज्य का बंटवारा हमें कतई मंजूर नहीं। 

अब इन पार्टियों ने अपनी 2019 की गुपकार घोषणा को बरकरार रखा है और इस गठबंधन को नाम दिया है "पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डेक्लेरेशन।" एनसी और पीडीपी के अलावा इसमें सीपीआई(एम), पीपल्स कांफ्रेंस (पीसी), जेकेपीएम और एएनसी शामिल हैं।

अभियान की घोषणा करते हुए जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि हमारी लड़ाई एक संवैधानिक लड़ाई है, हम चाहते हैं कि भारत सरकार जम्मू और कश्मीर के लोगों को उनके वो अधिकार वापस लौटा दे जो उनके पास पांच अगस्त 2019 से पहले थे। अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से जो छीन लिया गया था हम उसे फिर से लौटाए जाने के लिए संघर्ष करेंगे। 2019 की 'गुपकार घोषणा' वाली बैठक की तरह यह बैठक भी अब्दुल्ला के श्रीनगर के गुपकार इलाके में उनके घर पर हुई।

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गुपकार घोषणा-2 में खुलकर सामने आए इरादे

22 अगस्त, 2020 को फिर से छह राजनीतिक दलों- नैशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, सीपीआई(एम) और अवामी नैशनल कॉन्फ्रेंस ने फिर से गुपकार घोषणा दो पर दस्तखत किया। इन सभी ने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35ए की वापसी की लड़ाई साथ लड़ने का संकल्प लिया।

राष्ट्रीय पार्टियों का स्टैंड

राष्ट्रीय स्तर की दो पार्टियों कांग्रेस और सीपीआई(एम) की जम्मू-कश्मीर इकाई ने तो गुपकार घोषणा का समर्थन किया है, लेकिन नैशनल लीडरशिप ने इसपर चुप्पी साध रखी है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में 'अलोकतांत्रिक तरीके' से जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा छीने जाने की आलोचना तो की, लेकिन आर्टिकल 370 की वापसी पर कुछ नहीं कहा। इतना ही नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऑन रेकॉर्ड कहा कि कांग्रेस पार्टी जम्मू-कश्मीर से उसका विशेष दर्जा खत्म करने के विरोध में कभी नहीं थी, लेकिन इसे जिस तरह वहां की जनता पर थोपा गया, उसका विरोध जरूर करती है। 

बीजेपी की तीखी प्रतिक्रिया

वहीं, गुपकार घोषणा के लिए मीटिंग को लेकर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने कहा कि तीन पूर्व मुख्यमंत्री घाटी में परेशानी खड़ी करने के लिए साथ आए हैं। बीजेपी चीफ रविंदर रैना ने गुपकार घोषणा को 'ऐंटी-नैशनल' और 'पाकिस्तान प्रायोजित' बताया है। उन्होंने कहा कि अब्दुल्ला और मुफ्ती ने अपनी ताजा बैठक में गुपकार घोषणा के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का फैसला किया है, जिसकी बीजेपी कभी अनुमति नहीं देगी। 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्‍मू और कश्‍मीर में हाल ही बने राजनीतिक मोर्चे को आड़े हाथों लिया है।  शाह ने गुपकार गठबंधन को 'गुपकार गैंग' करार देते हुए ट्वीट किया कि गुपकर गैंग ग्लोबल हो रहा है! वे चाहते हैं कि विदेशी ताकतें जम्मू-कश्मीर में हस्तक्षेप करें। क्या सोनिया जी और राहुल जी इस तरह के कदमों का समर्थन करते हैं? उन्हें अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। कांग्रेस और गुपकार गैंग जम्मू-कश्मीर को आतंक और अशांति के युग में वापस ले जाना चाहते हैं। वे दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों को छीनना चाहते हैं जिन्हें हमने अनुच्छेद 370 को हटाकर सुनिश्चित किया है। इसीलिए हर जगह लोगों द्वारा इन्हें खारिज किया जा रहा है। 

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गुपकार का चीन-पाक कनेक्शन 

गुपकार घोषणा को चीन और पाकिस्तान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने गुपकार घोषणा की सराहना करते हुए इसे महत्वपूर्ण कदम बताया था। हालांकि फारूक अब्दुल्ला ने यह कहकर इस पर पानी डालने की कोशिश की थी कि हम किसी के इशारे पर यह काम नहीं कर रहे हैं।

इस बीच, फारूक अब्दुल्ला ने चीन को लेकर भी एक बयान दिया था, जो काफी सुर्खियों में रहा था। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि अनुच्छेद 370 की फिर से बहाली में चीन से मदद मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा था कि कश्मीर के लोग चीन के साथ रहना चाहेंगे।

कश्मीर की पार्टियों को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

नई दिल्ली में कश्मीर पर नजर रखने वाले तबके को लग रहा है कि पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन राजनीतिक मजबूरी है। पिछले सालभर ये नेता हिरासत में रहे। इस दौरान उन्हें जमीनी स्तर पर कोई सपोर्ट नहीं मिला। ऐसे में वे इस अलायंस के जरिए अपनी विश्वसनीयता को लोगों के बीच कायम करना चाहते हैं। नई दिल्ली में सरकारी सूत्र यह भी कहते हैं कि कश्मीर में मोटे तौर पर कानून व्यवस्था अच्छा काम कर रही है। आतंकवादियों के जनाजों को लेकर होने वाले टकराव भी खत्म हो गए हैं। इस वजह से कश्मीर के कुछ नेता पहले ही मर चुके अनुच्छेद 370 का जनाजा निकालना चाहते हैं। हकीकत यही है कि 370 अब कभी लौटने वाला नहीं है। कहीं न कहीं कश्मीर की मुख्य धारा की क्षेत्रीय पार्टियां अब भी उम्मीद कर रही है कि अनुच्छेद 370 लौट सकता है। गुपकार डिक्लेरेशन पर साइन करने वालों ने संकेत दिए हैं कि यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट में चलेगी।

टिकेगा नहीं मगर राजनीति का देगा मौका 

एक बात ये भी कही जा रही है कि इस अभियान के तहत ये राजनीतिक दल एक साथ आएंगे और एक लक्ष्य के लिए अपने मतभेदों को भूलाकर एक साथ काम करेंगे मगर ये भी तय मना जा रहा है कि ये अभियान अधिक समय तक टिकेगा नहीं, मगर राजनीतिक दलों को एक साथ आने का मौका जरूर देगा। इससे ये बात भी पता चल जाएगी कि भविष्य में ये दल किस तरह से गठबंधन बनाकर काम कर सकेंगे। अब्दुल्ला-मुफ्ती के भाईचारे ने कई लोगों को चौंकाया है। पिछले एक साल में एनसी और पीडीपी नेता नजरबंद थे। उनके समर्थन में न कोई बड़ा प्रदर्शन हुआ और न ही कोई लॉकडाउन। इससे यह साफ है कि जमीन पर उनके लिए कोई सपोर्ट नहीं बचा है।

14 महीने पहले ये ऐलान तो नजरबंदी के अंधेरे में गुम हो गया। फारूक, उमर और महबूबा तीनों को जिस अंदेशे से केंद्र ने नजरबंद किया था वो अब सच होता नजर आ रहा है। आजाद हवा में सांस लेते ही कश्मीर के नेता अपने पुराने एजेंडे पर लौट आए हैं। गुपकार ऐलान के बहाने कश्मीर की शांति को पटरी से धकेलने की सियासत हो रही है।- अभिनय आकाश