1980 से 2020 तक कब किसने संभाली भाजपा की कमान?

1980 से 2020 तक कब किसने संभाली भाजपा की कमान?

हिंदुत्व और राम के नाम पर बीजेपी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी। 1984 में 2 सीटों पर सिमटी महज सात वर्षों में ही देश की नंबर दो पार्टी बन गई थी। ये सब हुआ लाल कृष्ण आडवाणी की बदौलत। साल 1993 में आडवाणी एक बार फिर बीजेपी के अध्यक्ष बनते हैं।

बीजेपी में बहुत कुछ बदल रहा है। बीजेपी सत्ताधारी दल भी है और इन सब के बीच बीजेपी के सामने राजनीति की ऐसी चुनौतियां भी हैं जिनमें उसे चुनावी जीत चाहिए। क्योंकि 2019 का लोकसभा चुनाव एक इतिहास इस देश में दोहरा चुका है और ये इतिहास रचने वाले शख्स और कोई नहीं नरेंद्र मोदी हैं। 

केंद्र में अपनी सरकार, 16 राज्यों में अपनी या गठबंधन सरकार 303 सांसद, देशभर में 1 हजार से ज्यादा विधायक और 10 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ता। कहने की जरूरत नहीं हम देश ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की बात कर रहे हैं। 39 साल पहले बीजेपी की स्थापना हुई थी तब शायद किसी ने ये सोचा भी नहीं होगा कि पार्टी शोहरत और कामयाबी के इस मुकाम तक पहुंचेगी। जनसंघ से बीजेपी तक, अटल युग से मोदी युग तक। 10 सदस्य से 10 करोड़ सदस्य तक। बीजेपी के 39 साल की संघर्ष यात्रा। राजनीति की रपटीली रातों पर संघर्ष के 39 साल। तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक की यात्रा।

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6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी छोड़कर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी बनाई थी। तब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ये सपना देखा था कि गांधीवादी समाजवाद के रास्ते वे सत्ता के शिखर तक पहुंचेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष चुने गए।

लेकिन 1984 के चुनाव में दो सीटों पर ही सिमट कर रह गई बीजेपी। 1984 की हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर किया। आखिर वाजपेयी तक हार गए थे।


लालकृष्ण आडवाणी (1986 से 1991)

थोड़े कट्टर छवि के माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी के नए अध्यक्ष बन गए। अब बीजेपी में नेतृत्व आडवाणी का था और नियंत्रण संघ का। इसलिए बीजेपी ने हिंदुत्व का रास्ता अख्तियार किया। इसके बाद ये रास्ता बनता हुआ खुद पर खुद बनता चला गया। 


मुरली मनोहर जोशी (1991 से 1993)

1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं। इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई। बीजेपी को लग गया कि सत्ता की संजीवनी चाहिए तो राम नाम से राष्ट्रवाद पर जाना होगा। इसी दौर में बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष बन गए थे। दिसंबर 1991 में उनकी तिरंगा यात्रा निकली जिसका मकसद 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना था।

लालकृष्ण आडवाणी (1993 से 1998)

हिंदुत्व और राम के नाम पर बीजेपी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी। 1984 में 2 सीटों पर सिमटी महज सात वर्षों में ही देश की नंबर दो पार्टी बन गई थी। ये सब हुआ लाल कृष्ण आडवाणी की बदौलत। साल 1993 में आडवाणी एक बार फिर बीजेपी के अध्यक्ष बनते हैं। आडवाणी को ये अंदाजा था कि पार्टी को नंबर टू से नंबर 1 बनाने और इससे भी आगे प्रधानमंत्री देने के लिए कोई उदार छवि वाला चेहरा चाहिए। 1995 में वाजपेयी जी से बगैर पूछे ही उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उनके इस ऐलान के बाद सब के सब हैरान रह गए थे। 

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कुशाभाऊ ठाकरे (1998 से 2000)

अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी में पितृ पुरुष कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे की बीजेपी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होती है। मध्यप्रदेश में बीजेपी को मजबूत बनाने में कुशाभाऊ ठाकरे का बड़ा योगदान भी माना जाता है। 

बंगारू लक्ष्मण (2000 से 2001)

2000 में आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण बीजेपी के अध्यक्ष बनाए जाते हैं। लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसते हैं जिसके बाद न सिर्फ उनकी कुर्सी गई बल्कि पार्टी की छवि पर भी सवाल उठा। 


जेना कृष्णमूर्ति  (2001 से 2002)

बंगारू लक्ष्मण के हटने के बाद 2001 से 2002 तक जेना कृष्णमूर्ति रहे।

वेंकैया नायडु (2002 से 2004)

भारत के वर्तमान उपराष्ट्रपति और 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के युवा शाखा के अध्यक्ष रहे वेंकैया नायडू को साल 2002 में  भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाता है। 

लालकृष्ण आडवाणी (2004 से 2006)

साल 2004 में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में आ जाती है। लेकिन आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी को 2009 के चुनाव में भी शिकस्त ही मिलती है। 

इस दौरान बीजेपी ने राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी तक अपने अध्यक्ष बदले। लेकिन पार्टी में बड़ा बदलाव मोदी लेकर आए। जिनके नाम और छवि पर बीजेपी पूर्ण बहुमत पाने में कामयाब हो पाई। 

चुनौती बड़ी है और उस चुनौती पर क्या लोकसभा चुनाव की तर्ज पर बीजेपी पार पा सकती है। इस रिपोर्ट के जरिए जानेंगे बीजेपी के सफर को साथ ही जगत प्रकाश नड्डा को बीजेपी नई जिम्मेदारी दे रही है और इन सब के बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष पद जब संभालेंगे और ताजपोशी जब हो जाएगी तो सामने चुनौतियां कैसी-कैसी हैं। 

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव 20 जनवरी को हुआ और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा की इस दिन से अगले तीन साल के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हुई। जेपी नड्डा को 17 जून 2019 को पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। 

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नरेंद्र मोदी सरकार पार्ट 2 के शपथ ग्रहण सामरोह में एक नाम ऐसा था जिस पर हर किसी निगाहें टिकी थी, वो नाम था मोदी के सिपहसालार अमित शाह का। यह कयास लगाए जा रहे थे कि शाह मंत्री पद संभालेंगे कि नहीं। लेकिन तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए जून की तपती गरमी में पहली तारीख को राष्ट्रपति भवन की लाल कालीन से नरेंद्र मोदी के साथी, सहयोगी और सारथी अमित शाह ने सरकार पार्ट 2 में एक अहम जिम्मेदारी संभाली। शाह को गृह मंत्रालय का जिम्मा मिला तो बीजेपी के गृह यानी पार्टी की कमान कौन संभालेगा इसको लेकर तमाम अटकलें चलती रहीं। तमाम तैरते नामों के बीच जगत प्रकाश नड्डा को बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। साथ ही बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में अगले कुछ महीने तक अमित शाह के बीजेपी अध्यक्ष बने रहने को लेकर भी निर्णय किया गया। पिछले मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे जगत प्रकाश नड्डा के इस बार मंत्री नहीं बनने के बाद से ही उनका नाम भाजपा के अध्यक्ष पद के लिए सबसे आगे चल रहा था। कुशल रणनीतिकार होने के साथ ही नड्डा पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विश्वासपात्र भी माने जाते हैं। कठिन से कठिन कामों को सूझबूझ और सरलता से सुलझाने में माहिर नड्डा भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए। पीएम मोदी और अमित शाह दोनों के साथ जेपी नड्डा के रिश्ते काफी अच्छे रहे हैं। बता दें कि नरेंद्र मोदी जब हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे उस वक्त जेपी नड्डा और मोदी साथ में काम किया करते थे। दिल्ली के अशोक रोड स्थित भाजपा के पुराने मुख्यालय के आउट हाउस में दोनों एक साथ रहा करते थे। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह से भी नड्डा की करीबी काफी पुरानी है। शाह जब जनता युवा मोर्चा के कोषाध्यक्ष थे तो नड्डा भाजयुमो के अध्यक्ष थे। गौरतलब है कि जब लोकसभा चुनाव अपने चरम पर था और उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा-रालोद की तिकड़ी महागठबंधन के जरिए चमत्कार के सपने संजो रही थी और सभी राजनीतिक पंडित इस चुनाव में भाजपा के यूपी में खराब प्रदर्शन करने की भविष्यवाणी करते दिख रहे थे। उस वक्त एक शख्स बूथ लेवल से लेकर प्रदेश की सियासी गलियों को भापंने व नांपने में लगे था। वो नाम था हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के प्रभारी जेपी नड्डा। परिणाम जब सामने आए महागठबंधन का कुनबा ही बिखड़ गया और भाजपा ने सूबे की 62 सीटें अपने नाम कर ली। ऐसा ही कुछ करिश्मा साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने कर दिखाया था जब यूपी की 80 में से 71 सीटें बीजेपी को जितवाकर मोदी को सत्ता का सिकंदर बना दिया और जिसके बाद पार्टी के शीर्ष पद संभालने का अवसर प्राप्त किया। वैसे तो एक बात राजनीति में अक्सर कही जाती है कि देश की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है। लेकिन ये कहे तो गलत नहीं होगा कि बीजेपी के अध्यक्ष की गद्दी का रास्ता भी यूपी से ही होकर जाता है। 

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के रहने वाले जेपी नड्डा का जन्म बिहार के पटना में हुआ था। उनके पिता पटना विश्वविद्यालय के कुलपति थे। जय प्रकाश आंदोलन से प्रभावित होकर छात्र राजनीति की ओर कदम बढ़ाने वाले नड्डा बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़ गए। साल 1977 में पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में वह सचिव चुने गए और फिर 13 साल तक विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे। साल 1993 में बिलासपुर के विधायक के रूप में पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले नड्डा 6 बार बिलासपुर सदर से विधायक चुने गए। जेपी नड्डा 1998 से 2003 तक हिमाचल के स्वास्थ्य मंत्री भी रहे। साल 2012 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया और कई संसदीय कमिटियों में जगह दी गई। 

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लेकिन इन सात महीनों में जैसे मौसम में बदलाव आ गया है और ठंड ने दस्तक दे दी है, कुछ ऐसे ही असर को परिणामों के आधार पर बीजेपी में भी महसूस कर सकते हैं। राजनीति में परिणाम सफलता और असफलता को परखने का पैमाना माना जाता है। वहीं राजनीति में सबसे बड़े सबक चुनावों में ही मिलते हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश के सात महीने बाद महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव परिणाम आए। दोनों ही राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी जहां हरियाणा में गठबंधन के सहारे सरकार बनाने में कामयाब रही वहीं महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सत्ता से दूर हो गई। इस जख्म पर झारखंड की बुरी हार ने और गहरा घाव दे दिया।

बीजेपी का अतीत आने, लड़ने और जीतने का रहा है। 2019 में जब बीजेपी ने सरकार बनाई तो कमान अमित शाह के हाथ में थी। अब बीजेपी के सामने अपने स्वर्णीम युग को बरकरार रखने की चुनौती है। अध्यक्ष बनने के बाद जेपी नड्डा के सामने कई राजनीतिक चैलेंज हैं। अपने स्वर्णिम काल में चल रही भाजपा को इससे भी आगे लेकर जाने के साथ ही उन राज्यों में भगवा झंडा लहराने का लक्ष्य है जहां आरएसएस से लेकर भाजपा के प्रयोग भी उतने कारगर साबित नहीं हुए हैं। हालांकि, बंगाल में भाजपा ने अपने पैर पसार लिए हैं और ममता के अखंड राज पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। लेकिन दक्षिण के राज्यों में भी भाजपा की गाड़ी को दौड़ाना और केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व तमिलनाडू जैसे प्रदेश को भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश बनाना जेपी नड्डा की सबसे बड़ी चुनोती होगी। बहरहाल, इसमें तो अभी वक्त है लेकिन नड्डा की अग्नि परीक्षा अगले महीने होने वाले दिल्ली चुनाव और फिर इस साल के आखिर के बिहार विधानसभा चुनाव में होंगे। विस चुनाव में नड्डा के सांगठनिक कौशल की परीक्षा होगी। हालांकि नड्डा को संगठन का व्यापक अनुभव है, इसलिए उनके लिए राह ज्यादा मुश्किल नहीं होगी।

- अभिनय आकाश






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