बंगाल में जिन सीटों पर राहुल गांधी ने किया था प्रचार, वहां भी कांग्रेस उम्मीदवार की नहीं बची जमानत

बंगाल में जिन सीटों पर राहुल गांधी ने किया था प्रचार, वहां भी कांग्रेस उम्मीदवार की नहीं बची जमानत

आजादी के बाद यह पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल में लेफ्टकांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली है। पश्चिम बंगाल के 292 सीटों पर हुए चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस वाले तीसरे मोर्चे के 49 उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा पाए हैं।

हाल में संपन्न 1 केंद्र शासित प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावी नतीजे कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं है। असम, केरल, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में उसकी हालत खराब रही। तमिलनाडु में डीएमके के गठबंधन के सहयोगी होने के नाते वह सत्ता में आने में कामयाब हो सकी। चुनाव में सबसे ज्यादा ध्यान लोगों का पश्चिम बंगाल पर था। पश्चिम बंगाल में माना जा रहा था कि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर होगी। हालांकि नतीजों में तृणमूल कांग्रेस ने एकतरफा जीत हासिल की। भाजपा के लिए अच्छी खबर यह रही कि वह 3 से 77 सीटों पर पहुंचने में कामयाब हुई। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन को हुआ। लेफ्ट, कांग्रेस और आईएसएफ के गठबंधन यानी कि पश्चिम बंगाल का तीसरा फ्रंट बुरी तरह से इस चुनाव में पिट गया। गठबंधन के 50 फ़ीसदी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सबसे बड़ा झटका कांग्रेस के लिए यह भी रहा कि जिस सीट के लिए राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार किया था वहां भी उम्मीदवार अपना जमानत नहीं बचा पाया।

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आजादी के बाद पहली बार लेफ्ट कांग्रेस गठबंधन को बंगाल में एक भी सीट नहीं

आजादी के बाद यह पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल में लेफ्टकांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली है। पश्चिम बंगाल के 292 सीटों पर हुए चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस वाले तीसरे मोर्चे के 49 उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा पाए हैं। नियम कहता है कि अगर कोई उम्मीदवार 16.5 फ़ीसदी वोट भी हासिल नहीं कर पाया तो उस सीट पर उसकी जमानत जब्त मानी जाती है। यह आजादी के बाद पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट हो या फिर कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई है। थर्ड फ्रंट के तीसरे घटक दल आईएसएफ एक सीट जीतने में कामयाब रही। कांग्रेस के लिए सबसे हैरानी की बात तो यह रही कि नक्सलबाड़ी और गोलपोखर में कांग्रेस के उम्मीदवार अपनी जमानत जब्त होने से भी नहीं बचा पाए। यह वह जगह है जहां राहुल गांधी ने उम्मीदवारों के लिए 14 अप्रैल को प्रचार किया था। आपको यह भी बता दें कि मटियारा नक्सलबाड़ी एक दशक से कांग्रेस का गढ़ रहा है लेकिन इस बार मौजूदा विधायक शंकर मालाकार तीसरे नंबर पर पहुंच गए। उन्हें केवल 9 फ़ीसदी ही वोट मिल पाए। कांग्रेस की बात करें तो सिर्फ 11 सीटों पर ही वह अपनी जमानत बचा सकी। थर्ड फ्रंट की बात करें तो 170 सीटों में से सिर्फ 21 सीटों पर ही लेफ्ट अपनी जमानत बचा सकी, कांग्रेस 90 में से सिर्फ 11 सीटों पर जबकि आईएसएफ 30 में से 10 सीटों पर अपनी जमानत बचा सकी। 

कांग्रेस के लिए झटका हैं चुनाव नतीजे, बढ़ सकती हैं दिक्कतें

पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक चुनावी शिकस्त से उबरने की कोशिश में लगी कांग्रेस को इस बार चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में हुए इन चुनावों में, खासकर असम एवं केरल में, बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। लेकिन जो नतीजे आए हैं उससे पार्टी की दिक्कतें कम होने के बजाय बढ़ने के आसार बन रहे हैं। असम, केरल और पुडुचेरी में चुनावी हार तथा पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का सफाया होना न सिर्फ पार्टी, बल्कि पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी झटका है। उनके शुभचिंतक मान रहे थे कि केरल और असम में पार्टी यदि सरकार बनाने में सफल रही तो राहुल गांधी के फिर से अध्यक्ष पद संभालने का रास्ता साफ हो जाएगा। संभावित परिणामों को ध्यान में रख अब कांग्रेस नेतृत्व को एक बार फिर असंतुष्ट खेमे की ओर से सवाल पूछे जाने की आशंका सता रही है। राहुल गांधी के लिए ये नतीजे इस मायने में बड़ा झटका हैं क्योंकि उन्होंने केरल में पूरी ताकत झोंक दी थी। वह कई गुटों में बंटी नजर आ रही राज्य इकाई को एक छतरी के नीचे लाने में संभवत: विफल रहे जिसकी पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी। 

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लोकसभा चुनाव में केरल से कांग्रेस अधिकतम सीटें जीती थीं और खुद राहुल गांधी भी प्रदेश से वायनाड लोकसभा सीट से निर्वाचित हैं। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की अगुवाई में एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) केरल में शानदार जीत हासिल कर हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की परिपाटी को तोड़ता नजर आ रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के विजेता बनने के बाद आने वाले दिनों में विपक्ष की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की दावेदारी में कई नाम जुड़ जाएंगे, हालांकि कांग्रेस का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का वह एकमात्र विकल्प है। चुनाव बाद अब कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ सकती है। जनवरी, 2021 में कांग्रेस कार्य समिति ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि इस साल जून में ‘किसी भी कीमत पर नया अध्यक्ष चुन लिया जाएगा।’ इन नतीजों की वजह से गांधी परिवार का नेतृत्व एक बार फिर से पार्टी के असंतुष्ट धड़े के निशाने पर आ जाएगा। माना जा रहा है कि गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी वाला ‘जी 23’ समूह अपना अगला कदम उठाने का इंतजार कर रहा है।





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