कांग्रेस ने टंट्या भील जैसे आदिवासी प्रतीकों को नजरअंदाज किया और केवल नेहरू-गांधी परिवार का महिमामंडन किया: CM शिवराज

कांग्रेस ने टंट्या भील जैसे आदिवासी प्रतीकों को नजरअंदाज किया और केवल नेहरू-गांधी परिवार का महिमामंडन किया: CM शिवराज

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इंदौर से 35 किलोमीटर दूर पातालपानी में टंट्या भील के 'बलिदान दिवस' या पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने के लिए एक आदिवासी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर केवल नेहरू-गांधी परिवार का महिमामंडन करने का आरोप लगाते हुए शनिवार को कहा कि देश की आजादी की लड़ाई में टंट्या भील उर्फ टंट्या मामा जैसे आदिवासी क्रांतिकारियों के योगदान को बड़ी आसानी से भूल गई।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इंदौर से 35 किलोमीटर दूर पातालपानी में टंट्या भील के 'बलिदान दिवस' या पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने के लिए एक आदिवासी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगू भाई पटेल की उपस्थिति में 'अष्टधातु' (आठ धातुओं) से बनी टंट्या भील की एक प्रतिमा का भी अनावरण किया।

ऐसा माना जाता है कि पातालपानी में टंट्याभील का अंतिम संस्कार किया गया था। इस क्षेत्र के लोग तांत्या भील को भगवान के रूप में पूजते हैं। लेकिन मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं, जिसने लंबे समय तक देश और मध्य प्रदेश पर शासन किया, उसने कभी भी तांत्या भील की इस पवित्र भूमि को नमन किया और उसका स्मारक क्यों नहीं बनाया?

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह इस देश का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने केवल नेहरू-गांधी वंश का महिमामंडन किया और स्थापित किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने टंट्या भील जैसे आदिवासी क्रांतिकारियों को कभी याद नहीं किया जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

टंट्या भील को "भारत माता का वीर सपूत" बताते हुए चौहान ने कहा कि भील ने अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि अंग्रेजों ने उन्हें धोखे से एक गद्दार की मदद से गिरफ्तार कर लिया और उन्हें मौत की सजा दी गई।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस आदिवासी क्रांतिकारी पर आधारित पार्क एवं पुस्तकालय के अलावा पातालपानी में टंट्या भील को समर्पित स्मारक के विकास की भी घोषणा की।

इतिहास के विशेषज्ञों के अनुसार, "आदिवासियों के रॉबिन हुड" के रूप में जाना जाता है, टंट्या भील को अंग्रेजों ने 4 दिसंबर, 1889 को जबलपुर जेल में देशद्रोह के आरोप में फांसी पर लटका दिया था।





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