दलित उत्पीड़न: विपक्ष का केंद्र पर मौन रहने का आरोप

देश के विभिन्न हिस्सों में दलितों पर अत्याचार पर केंद्र सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए विपक्षी कांग्रेस, वामदलों एवं अन्य पार्टियों ने आज सरकार को घेरा।

देश के विभिन्न हिस्सों में दलितों पर अत्याचार पर केंद्र सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए विपक्षी कांग्रेस, वामदलों एवं अन्य पार्टियों ने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए बजटीय आवंटन में कटौती की गई है और देश की एक चौथाई आबादी वाले इन वर्गों के लोग आज भय के वातावरण में जी रहे हैं। भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि केवल आंकड़ों का उल्लेख करने से दलितों के उत्पीड़न को खत्म नहीं किया जा सकता है क्योंकि आजादी के बाद से कांग्रेसी और गैर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर जघन्य अत्याचार के मामले बढ़े हैं। जरूरत इस बात की है कि हम सब मिलकर दलितों के उत्पीड़न के स्रोत और विचारधारा को तोड़ें।

लोकसभा में दलितों पर अत्याचार के बारे में पी करूणाकरण और शंकर प्रसाद दत्ता के प्रस्ताव पर नियम 193 के तहत चर्चा की शुरूआत करते हुए माकपा के पीके बीजू ने कहा कि भारत आज दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था है लेकिन दलितों पर अत्याचार की घटना बदस्तूर जारी हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक 18 मिनट में दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले आते हैं। दलितों की हत्या, दलित महिलाओं के बलात्कार के मामले भी लगातार आते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में गुजरात के उना में दलितों पर हमला, उत्तर प्रदेश और बिहार में दलित उत्पीड़न की घटनाओं का जिक्र किया। बीजू ने कहा कि 33 प्रतिशत थानों में दलित नहीं जा पाते हैं, काफी स्कूलों में दलित छात्रों को अलग बैठना पड़ता है, 21 प्रतिशत दलित बच्चे कम वजन के हैं और बड़ी संख्या में कुपोषित हैं। फिर भी इनकी अनदेखी गंभीर विषय है। माकपा सदस्य ने कहा कि संविधान में दलितों की सुरक्षा एवं उनके अधिकारों का प्रावधान किया गया है। लेकिन गौरक्षा एवं अन्य मुद्दों पर उनके खिलाफ अत्याचार जारी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस विषय पर हाल ही में कहा कि दलितों को नहीं मारो, मारना है तो मुझे गोली मार दो। साथ ही प्रधानमंत्री ने गौरक्षा से जुड़े लोगों में असामाजिक तत्वों के होने का जिक्र किया। लेकिन ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

बीजू ने कहा कि प्रधानमंत्री के पास ऐसी जानकारी है लेकिन फिर भी दलितों की सुरक्षा के लिए ठोस पहल केंद्र सरकार क्यों नहीं कर रही है? उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का बयान नहीं बल्कि कठोर कार्रवाई जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके साथ ही वर्तमान सरकार के दौरान अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए बजटीय आवंटन में कटौती की गई है।

कांग्रेस के केएच मुनियप्पा ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार के दौरान देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार के अब तक के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। और यदि इस तरह दलितों पर अत्याचार पर सरकार मौन रही तो 2019 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनना तय है। उन्होंने कहा कि आज दलितों पर अत्याचार के मामले इतने बढ़ गये हैं कि वे भय के वातावरण में जी रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के शासनकाल में दलित भयमुक्त होकर जीवनयापन कर रहे थे। मुनियप्पा ने इस संदर्भ में गुजरात के उना में दलितों पर अत्याचार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और बिहार में दलित उत्पीड़न की घटनाओं का जिक्र किया। ओडिशा में दलितों की हत्या का जिक्र करते हुए कांग्रेस सदस्य ने आरोप लगाया कि ओडिशा सरकार इस मामले में पूरी तरह से विफल रही है और गृह मंत्री को इस बारे में संज्ञान लेना चाहिए। इसका बीजद सदस्य भर्तृहरि महताब ने विरोध किया और कहा कि दोषियों को नहीं बख्शा जायेगा। कर्नाटक से भाजपा सदस्यों को भी कांग्रेस शासित इस राज्य में दलितों के उत्पीडन के विषय को उठाते सुना गया।

भाजपा के उदित राज ने कहा कि दलितों के उत्पीड़न के मामले में वह भाजपा बनाम कांग्रेस या कांग्रेस बनाम बीजद के जाल में नहीं पड़ना चाहते हैं। आरोप-प्रत्यारोपों से दलितों के उत्पीड़न को कम नहीं किया जा सकता है। आंकड़े कम या अधिक हो सकते हैं लेकिन हमें उत्पीड़न के स्रोत और उत्पीड़न की विचारधारा को तोड़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह केवल कानून एवं व्यवस्था का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक सोच का प्रश्न है। और हमें इस जड़ता को समाप्त करना होगा। ऐसी घटनाएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि दलित आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं और हमें उनके इस प्रयास में सहयोगी बनना होगा। उदित राज ने कहा कि दलित उत्पीड़न के आंकड़ों की बात करें तो आजादी के बाद से कांग्रेसी और गैर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर जघन्य अत्याचार के मामले हुए हैं।

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