सूतक लगे अर्चक द्वारा विश्वनाथ धाम लोकार्पण, पुनः प्रतिष्ठा या संप्रोक्षण विधि द्वारा मिलेगी पाप से मुक्ति

Vishwanath Dham
आरती पांडेय । Dec 27, 2021 5:17PM
महंत जी ने अज्ञानतावस यह पाप हो जाने पर उसके शुद्धि का भी रास्ता बताया, उन्होंने कहा की, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आशौच में भगवान की पूजा और सेवा कार्य अपराध है, और इस पाप से मुक्ति के लिए ब्राह्मणों द्वारा संप्रोक्षण विधि, शांति होम, पुण्याहवाचन का विधान है।

वाराणसी। सनातन धर्म के रीति रिवाजों के अनुसार, परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर व्यक्ति पर दस दिनों का सूतक लग जाता है, और सूतक में कोई भी धार्मिक और मांगलिक कार्य करना अशुभ माना जाता है। लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के महंतो को इससे कोई लेना देना नही है, तभी तो श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर लोकार्पण की पूजा विधि, सूतक लगे हुए अर्चक द्वारा कराए जाने का मामला सुर्खियों में बना हुआ है। 

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13 दिसंबर को महंत श्रीकांत मिश्रा ने पीएम द्वारा लोकार्पण पूजन कराया था। लेकिन बाद में विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व सदस्य प्रदीप बजाज ने खुलासा किया की, महंत श्रीकांत मिश्रा पर उनके भतीजे की मृत्यु हो जाने के कारण सूतक लगा था, फिर भी उन्होंने परिणाम की चिंता न करते हुए पूजा विधि कराई। प्रकरण को लेकर जांच चल रही है, जिसके बाद अर्चक पर कार्यवाई की जाएगी। धर्मार्थ कार्य मंत्री नीलकंठ तिवारी ने भी मंदिर प्रशासन से मामले की रिपोर्ट मांगी है।

इस मामले को लेकर काशी के एक महंत ने सूतक में धर्मार्थ कार्य किए जाने के दुस्परिणामो की जानकारी दी, उन्होंने कहा की धर्मसिंधु ग्रंथ के अनुसार सूतक लगने पर व्यक्ति अस्पृश्य होते है और उन्हें कर्म का अधिकार नहीं होता, उन्होंने आगे बताया की मृतक से संबंध तोड़ लेने या ना रखने पर भी व्यक्ति सूतक से नही बच सकता, मूल व्यक्ति के सात पीढ़ियों तक आशौच बना रहता है, और व्यक्ति को कर्माधिकार नही होता, तो उसे पूजन आदि विधि में सम्मिलित नही होना चाहिए। 

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महंत जी ने अज्ञानतावस यह पाप हो जाने पर उसके शुद्धि का भी रास्ता बताया, उन्होंने कहा की, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आशौच में भगवान की पूजा और सेवा कार्य अपराध है, और इस पाप से मुक्ति के लिए ब्राह्मणों द्वारा संप्रोक्षण विधि, शांति होम, पुण्याहवाचन का विधान है। अगर पूजा न कराई गई तो भगवान के कुपित होने के कारण सभी को इसका परिणाम भोगना पड़ेगा। उन्होंने कहा की, ऐसे में पुनः प्रतिष्ठा भी करनी चाहिए, परंतु ऐसा संभव न होने पर संप्रोक्षण विधि द्वारा शुद्धि करना भी श्रेयस्कर है।

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